उत्तराखंड के 25 साल: लंबे संघर्षों के बाद मिले राज्य में अभी भी क्यों जारी है संघर्ष
उत्तराखंड अपनी स्थापना के पच्चीस वर्ष पूरे कर चुका है। सरकार इसे रजत जयंती के रूप में विभिन्न आयोजनों के माध्यम से मना रही है। जनता बिजली, पानी,सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, पारिस्थितिकी संकट वव सुरक्षा को लेकर सड़कों पर है।
जब पिछले दिनों रजत जयंती समारोह के तहत देश की महामहिम राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू विधानसभा के विशेष सत्र को संबोधित करने आ रही थी तो ऋषिकेश में चल रहे शराब विरोधी आंदोलन ने उनका स्वागत किया।
चौखुटिया से देहरादून तक 400 किलोमीटर पैदल चलकर लोग स्वास्थ्य सेवाओं की बहाली के लिए मुख्यमंत्री से मिलने देहरादून आये। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देहरादून के एफआरआई मैदान से जनता को संबोधित कर रहे थे तब बड़ी संख्या में आंदोलनकारियों को हाउस अरेस्ट किया गया था।
ये स्थितियां बताती हैं कि उत्तराखंड राज्य की मांग जिन मुद्दों को लेकर हुई थी, उन्हीं सवालों को लेकर जनता आंदोलित है। उत्तराखंड राज्य बनने के 25 साल बाद भी इस तरह का असंतोष चौंकाने वाला नहीं है।
इसके पीछे एक लंबी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है। उत्तराखंड राज्य के निर्माण का आंदोलन भले ही 1994 में बड़े प्रतिकार का स्वर बना हो, लेकिन उसके पीछे अंग्रेजी समय से अपने हक-हकूकों को पाने की उत्कंठा रही है।
विशेषकर हिमालय के हिफाजत और जल,जंगल और जमीन के सवाल ही यहां लोगों को उद्वेलित करते रहे हैं। औपनिवेशिक काल में वह जमीन और जंगलात कानूनों के खिलाफ मुखर हो रहे थे तो आजादी के बाद अपने हकों को पाने के संवैधानिक अधिकारों में तब्दील हुई।
दरअसल, उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था हमेशा कृषि, पशुपालन और वन आधारित रही है। उसे बहुत सुनियोजित तरीके से मनीआर्डर अर्थव्यवस्था बताने की कवायद ने लोगों को उनके स्थानीय संसाधनों से वंचित करने का काम किया।
यह औपनिवेशिक काल से लेकर आजादी के बाद भी बना रहा। राज्य बनने के बाद तो इसमें और तेजी आई। उत्तराखंड में अंग्रेजी शासन की शुरुआत 1815 में हुई। अपने शासन के शुरुआती दौर में ही उन्होंने एक तरह से जमीन और जंगलात पर सरकारी पहरे के लिए कानून बनाने शुरू किए।
अंग्रेजों ने 1816 में ही जमीनों की पहली पैमाइश कर दी थी। 1823 में अस्सी साला बंदोबस्त से लेकर अपने 132 साल के शासन में उन्होंने 11 पैमाइशें कराई। 1865 में वन विभाग की स्थापना के बाद एक तरह से प्राकृतिक संसाधनों विशेषकर जंगलात और भूमि पर लोगों के आधिकार सीमित करने के कानून अस्तित्व में आने लगे।
लोगों ने इसका प्रतिकार किया। औपनिवेशिक सत्ता ने एक शब्द ईजाद किया- 'रिजर्व'। और और स्थानीय संसाधनों पर निर्भर जनता के लिए यह बहुत परेशानी भरा था। लोगों के प्रतिरोध के बीच 1874 में 'शैड्यूल डिस्ट्रिक्ट एक्ट-1874' से नागरिकों को सहुलयतें सरकार ने दी, जिससे वह अपनी कमाई जमीन का स्वामित्व प्राप्त कर सकते थे।
1893 में आए रक्षित भूमि के कानून से भी लोगों को असंतोष हुआ तो 1995 में इसमें कुछ शिथिलता आई। एक तरह से उत्तराखंड में जंगलात और भूमि के सवाल अंग्रेजी कानूनों के साथ ही तल्ख भी होते गये।
उत्तराखंड में हालांकि 1857 की क्रांति की ध्वनियां स्फुटित हो गई थी। चंपावत में कालू महर के नेतृत्व में क्रांति का आगाज हुआ। आनंद सिंह फर्त्याल और बिशन सिंह करायत को अंग्रेजों ने गोली से उड़ा दिया था। देश के अन्य हिस्सों की तरह यहां इसका दमन हुआ। उत्तराखंड में अपने हकों को लेकर प्रतिकार चलता रहा।
1910 के दशक के बाद एक नई चेतना के साथ यहां जंगलात में हकों के लिए जनगोलबंदी हुई। लोगों ने जंगलों को आग के हवाले भी किया। सोमेश्वर में दुर्गा देवी को जंगल में आग लगाने के जुर्म में एक महीने की सजा भी हुई।
एक तरह से 1911 से 1921 तक जंगलात कानूनों के खिलाफ लोग आंदोलित रहे। 'फोरेस्ट ग्रीवेंस कमेटी' के माध्यम से जनता के मांगों पर सुनवाई हुई और 1927 में बने वन कानून में उनके हक शामिल किए गए।
महात्मा गांधी के भारत आने के बाद 1914 के बाद आजादी के आंदोलन को नई दिशा मिली। बड़ी संख्या में लोग इसमें शामिल होने लगे। उत्तराखंड में इसी दौर में 1916 में 'कुमाऊं परिषद' की स्थापना हुई। इसने यहां के जल, जंगल और जमीन के साथ सरकारी लगान के खिलाफ जनचेतना का काम किया।
बागेश्वर में 1921 में कुली बेगार जैसे काले कानून के खिलाफ हुए बड़े आंदोलन ने एक नई चेतना के साथ लोगों को अपने हकों के लिए लड़ने को मुखर किया। यह वह दौर था, जब एक राजनीतिक चेतना भी लोगों में बढने लगी और उन्हें यह भी समझ में आने लगा कि हमारी सारी समस्याओं की जड़ अंग्रेजी शासन है।
अपने हकों को पाने का रास्ता भी आजादी से ही निकलेगा। बागेश्वर में हुए कुली बेगार के खिलाफ आंदोलन को महात्मा गांधी ने'रक्तहीन क्रांति' कहा। 'कुमाऊं परिषद' ने 19926 में अपने को कांग्रेस में विलय कर लिया।
उत्तराखंड के एक हिस्से जहां अंग्रेजी शासन था, वहां के लोग अपने स्थानीय संसाधनों पर हकों के लिए अंग्रेजी हुकूमत से लड़ रहे थे तो दूसरी ओर टिहरी रियासत में राजा ने जंगलात की पैमाइश कर लोगों के घरों तक अपनी सीमा बना दी। उन पर मनमाने कर भी थोपे गये।
जनता ने रियासत के खिलाफ ढडक अर्थात सत्याग्रह शुरू किए। अपने हकों की बहाली और लगानों के खिलाफ लोगों ने बड़ा प्रतिरोध किया। इसी का परिणाम था कि अपने हक-हकूकों को लेकर 30 मई, 1930 को बडकोट के तिलाडी के मैदान में इकट्ठा हुए निहत्थे ग्रामीणों पर राजा की पुलिस ने गोली चलाई, जिसमें दर्जनों लोग मारे गए। इसे लोग आज भी 'उत्तराखंड के जलियांवाला बाग' के नाम से जानते हैं।
कांग्रेस के भीतर जब 1936 के आसपास एक समाजवादी धारा का उदय हुआ तो उससे यहां के युवा काफी प्रभावित थे। जब देश में 1942 में 'भारत छोड़ो आंदोलन' चला तो कुमाऊं क्षेत्र में तीन बड़े गोलीकांड हुए। देघाट, सल्ट और सालम में प्रदर्शन कर रहे आंदोलनकारियों पर गोलियां चलाई। इन गोलीकांडों में आठ लोगों की शहादत हुई।
असल में इन सभी प्रतिकारों मे जल, जंगल, जमीनों पर अपने अधिकार और मनमाने लगान हटाने की मांग प्रमुख थी। उत्तराखंड के लोगों ने अपनी इन मांगों का समाधान आजादी के आंदोलन में देखा तो उन्होंने हपने हक-हकूकों के इन आंदोलनों को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा।
उत्तराखंड के लोगों को लगता था कि आजादी के बाद उनके मुताबिक नीतियां बनेगी तो उनके हक-हकूक उन्हें मिलेंगे, लेकिन आजादी के बाद भी जल,जंगल और जमीन के सवाल सुलझने की बजाय और कठिन होने लगे।
साठ के दशक के बाद जंगलात पर हकों की लड़ाई फिर नये रूप में सामने आने लगी। 'हिमालय बचाओ' आंदोलन एक तरह से इसी का स्फुटन था। सत्तर के दशक में जब सरकार ने छतीस साला एग्रीमेंट पर जंगलों को बड़े इजारेदारों को सौंपने के टेंडर निकाले तो 'वन आंदोलन' का एक बडा दौर शुरू हुआ।
गढ़वाल में कम्युनिस्ट पार्टी और कुमाऊं में समाजवादियों ने इस आंदोलन को गति दी। बाद मे यह आंदोलन व्यापक रूप से पूरे पहाड़ में फैला। वर्ष 1974 आते-आते इसने 'चिपको आंदोलन' रूप में पूरी दुनिया में दस्तक दी।
गौरा देवी के नेतृत्व में 26 मार्च, 1974 को जब जंगलों को बचाने की हुंकार के रूप में "जंगल हमारा मायका है" का विचार गांवों तक पहुंचा तो इसने फिर इसे भावनात्मक और नीतिगत दोनों स्तर पर बहुत मुखर किया।
दरअसल, ये सब आंदोलन उत्तराखंड राज्य आंदोलन की पूर्व पीठिका बना रहे थे।अस्सी के दशक में जब उत्तराखंड राज्य का आंदोलन अपने चरम पर पहुंचने लगा तो उस समय भी उसमें जंगलात और स्थानीय हकों का विचार ही प्रमुख था।
वन अधिनियम-1980 के प्रावधानों से भी लोगों को बहुत एतराज रहा। उस समय राज्य आंदोलन की ध्वजवाहक उत्तराखंड क्रांति दल ने तो वन अधिनियम के खिलाफ बड़ा आंदो 1989 में खड़ा किया। वन अधिनियम के कारण स्कूल, अस्पताल, सडक का निर्माण बाधित हो रहा था।
सरकार ने बाद में इसके निस्तारण के लिए नोडल एजेंसी बनाकर इसमें शिथिलता का रास्ता बनाया। उत्तराखंड राज्य बनने के पच्चीस साल बाद भी जनता अपने हक-हकूकों को लेकर सड़कों पर है।
उत्तराखंड में भूमि सुधार के लिए पिछले तीन साल से लगातार आंदोलन चल रहे हैं। सरकार अभी तक यहां के जमीनों के लिए कोई ठोस रास्ता नहीं निकाल पाई है।
लोगों का कहना है कि जमीनों की पैमाइश कर राज्य में एक ऐसा भू-प्रबंधन होना चाहिए जो लोगों को अपनी खेती और संसाधनों की सुरक्षा की गारंटी दे। सरकारों ने अभी तक जो कानून बनाए हैं, उनसे लगातार लोगों की खेती की जमीन उनके हाथों से जा रही है।
एक आंकड़े के अनुसार अब यहां मात्र 4 प्रतिशत खेती की जमीन बची है। उत्तराखंड राज्य बनते समय जो जंगलात की भूमि 62 प्रतिशत थी वह बढकर 72 प्रतिशत हो गई है। सरकारों ने पिछले दिनों कानूनों में जो संशोधन किए हैं वह लोगों को उनके स्थानीय संसाधनों से अलग करने वाले हैं।
बड़ी परियोजनाओं, सुरंग आधारित विकास, चौड़ी सड़कें, विशालकाय बांध, बेतरतीब टाउनशिप और दैत्याकार परियोजनाओं के लिए पहाड़ को लीलने-छीलने की नीतियों ने फिर लोगों को वहीं खड़ा कर दीया है, जहां से राज्य की मांग शुरू हुई थी।
कह सकते हैं कि औपनिवेशिक काल में 1897 में पहली बार उठी पृथक प्रशासनिक इकाई की मांग 1902, 1923, 1928, 1933, 1938, 1946, 1952, 1957, 1963, 1967, 1968, 1972, 1978, 1979 से लेकर 1994 तक हमेशा अपने स्थानीय संसाधनों पर हकों की मांग रही है। राज्य बनने के पच्चीस साल बाद भी इसका समाधान नहीं हुआ है।

