

छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के लोग जंगल से माहुल पत्ता और अन्य वनोपज बीनकर पत्तल व जड़ी-बूटी बेचते हैं
परंंतु उनकी आधी कमाई हर साल काजल नदी पर कच्चा रप्टा बनाने और दूर बाजार तक पहुंचने के किराये में चली जाती है।
महिलाएं दिन-रात मेहनत और 15-20 दिन श्रमदान करती हैं, फिर भी पक्का रप्टा न होने से उनकी आय, समय और श्रम लगातार नष्ट हो रहा है।
“हाड़तोड़ दिनरात मेहनत कर जंगलों से माहुल का पत्ता (छत्तीसगढ़ की 67 लघु वनोपज में से एक) बीनते हैं और इससे पत्तल बनाकर हाट में जाकर जैसे-तैसे बेचकर दो पैसा कमाते हैं और हमारी इस गाढ़ी कमाई का पैसा हर साल गांव की काजल नदी पर रप्टा (कच्चा पुल) बनाने में खर्च हो जाता है।” यह बात छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 133 किलोमीटर दूर बसे जबर्रा गांव (धमतरी जिला) में अपने घर पर पत्तल बना रही कौशल्य बाई ने डाउन टू अर्थ से कही। वह बताती हैं कि मैं तो अनपढ़ हूं ज्यादा हिसाब-किताब नहीं जानती लेकिन मुझे अच्छे से याद है कि जब से मैं इस गांव में शादी के बाद आई हूं तब से हर साल हमारी कमाई का एक बड़ा हिस्सा नदी पर रप्टा बनाने पर खर्च हो जाता है।
वह बताती हैं कि हम केवल पैसा ही नहीं देते बल्कि हमें बारी-बारी से इस रप्टे के निर्माण के दौरान लगभग 15 से 20 दिनों तक श्रमदान भी करना पड़ता है, कभी-कभी श्रमदान के दिन बढ़ भी जाते हैं। उनके पास ही पत्तल बनाने में जुटी उनकी बुजुर्ग सास कुमारी बाई निराशा भरे स्वर में कहती हैं, “कायदे से देखा जाए तो यह काम सरकार का है लेकिन न जाने कितने साल हो गए हम गांव वाले ही इस रप्टे को बनाते आ रहे हैं और न मालूम कब कौन सी सरकार आएगी जब यहां एक पक्का रप्टा बनाएगी।”
पिछले 24 सालों से इस नदी पर ग्रामीण राज्य सरकार से बस एक पक्का रप्टा बनाने की मांग कर रहे हैं लेकिन सरकार के कानों में अब तक जूं नहीं रेंगी।
जबर्रा ग्राम वन प्रबंधन समिति के अध्यक्ष माधव सिंह मकराम कहते हैं कि हम तो बस एक पक्के रप्टे की मांग कर रहे हैं, कोई पक्के पुल के निर्माण की बात आज तक हमने नहीं की है लेकिन हम ग्रामीणों की अब तक कोई सुनवाई नहीं हुई है। वहीं, मकराम के पास ही खड़े कृपा नेताम ने कहा कि बताइए हमारी घर की महिलाएं अपने जीवन यापन के लिए चौबीसों घंटे जंगलों की खाक छानते फिरती हैं, तब जाकर हम जड़ी-बूटी या कुछ दूसरे जंगली उपज ला पाते हैं, फिर हमें अपनी इस खून पसीने की कमाई का एक हिस्सा हर साल नदी के रप्टे के निर्माण पर खरचना पड़ जाता है, यह कहां का न्याय है?
मकराम ने डाउन टू अर्थ को बताया कि सरकारी उदासीनता के कारण ही हम ग्रामीण पिछले लगभग ढाई दशक से आपस में ही पैसा एकत्रित कर नदी पर कच्चा रप्टा बनाते आ रहे हैं। ध्यान रहे कि जबर्रा गांव अपने ग्राम वन प्रबंधन समिति के सदस्यों से नदी पर बनाए जाने वाले कच्चे रप्टा के निर्माण के लिए अपनी लघु वनोपज की कमाई से आए पैसे आपस में एकत्रित करते हैं और इस धनराशि से नदी पर रप्टा का निर्माण किया जाता है। इसके बाद नदी पार कर नगरी ब्लॉक और गरियाबंद जिले के हाट में पहुंचकर जंगलों से एकत्रित अपनी लघु वनोपज बेच पाते हैं।
यह गांव भौगोलिक तौर पर धमतरी जिले में आता है लेकिन यहां के ग्रामीणों के लिए जिले का बाजार यहां से 61 किलोमीटर दूर पड़ता है जबकि नदी पार करने पर यह दूरी सिमट कर 12 से 13 किलोमीटर रह जाती है। यही कारण है कि गांव के सैकड़ों लोग पिछले सालों में अनगिनत बार जिला कलेक्टर कार्यालय से लेकर कई संबंधित सरकारी कार्यालयों के सामने धरना-प्रदर्शन करते आ रहे हैं लेकिन कहीं उनकी सुनवाई नहीं हुई है। ग्रामीण हर साल स्वयं के पैसों से कच्चा रप्टा बनाते हैं और यह कच्चा रप्टा जून से शुरू होने वाली बारिश में हर साल बह जाता है। इस बार भी बीते जून बह गया था और इसका निर्माण कार्य ग्रामीणों द्वारा किया जा रहा है। पिछले छह माह से आदिवासियों को यानी जून से लेकर अक्टूबर तक अपनी लघु वनोपज को दूर के बाजार में बेचने पर मजबूर होना पड़ता है। इससे उनकी आय पर सीधा असर पड़ता है। कारण कि उन्हें अपनी लघु वनोपज को बाजार तक पहुंचाने के लिए परिवहन साधनों की मदद लेनी पड़ती है। मकराम बताते हैं, “ऐसे में हमारी 50 फीसदी कमाई किराया-भाड़ा में ही खर्च हो जाती है।”
काजल नदी पर बनाए जाने वाले कच्चे रप्टे पर ग्रामीण पैसा तो आपस में एकत्रित करते ही हैं, साथ ही प्रतिदिन हर एक घर से एक व्यक्ति श्रमदान भी करता है। यह कार्य अक्टूबर के तीसरे हफ्ते में शुरू होता है और नवंबर के दूसरे हफ्ते तक चलता है। प्रतिवर्ष इस रप्टे के निर्माण पर 40 से 50 हजार रुपए खर्च आता है। कभी-कभी निर्माण के लिए बुलाई जाने वाली जेसीबी मशीन का किराया अधिक होता है तो ग्रामीणों को कई बार आपस में दोबारा पैसे एकत्रित करना पड़ता है। गांव के मुहाने पर बहने वाली काजल नदी पर निर्माणाधीन रप्टे का निर्माण कार्य चल रहा है। ग्रामीण बड़ी मात्रा में जंगली घासों को नदी पर डाल रहे हैं और जेसीबी मशीन इस पर मिट्टी का डाल रही है।
इस बीच निर्माण स्थल पर जंगली घासों का एक बड़ा बोझा सिर से उतारकर उसे पैरों से बिछा रही 60 वर्षीय बीरझा सोरी ने डाउन टू अर्थ से कहा, यह काम तो हम हर बरस करते हैं, तभी जाकर दो पैसे की बचत हो पाती है नहीं तो दूसरी ओर अपनी जंगल की उपज बेचने जाते हैं तो हमारा आधा पैसा तो गाड़ी पर खर्च हो जाता है। बीरझा के घर की तरफ से उसका आज श्रमदान का दिन है। इसलिए वह सुबह से ही आ गईं हैं ताकि अधिक से अधिक काम निपटाया जा सके। वह बताती हैं कि हमारी आधी उमर तो इस रप्टा बनाने में खर्च हो गई है। सुबह से लगातार काम करने के कारण वह थक चुकी हैं और अपना चेहरा पसीने से पोंछते हुए कहती हैं कि अब तो मैं पूरा दिन काम भी नहीं कर पाती, बताइए अभी दोपहर के एक बजे रहे हैं और मैं थक के चूर हो चुकी हैं। ध्यान रहे कि ऐसे में उनके घर से दूसरे सदस्य को श्रमदान के लिए आना पड़ता है।
रप्टा के निर्माण के शुरू होने से लेकर इसके पूरे होने तक गांव के हर घर से एक सदस्य प्रतिदिन श्रमदान के लिए आते हैं। मकराम ने बताया कि कभी-कभी अधिक लोगों की जरूरत पड़ने पर हम ग्राम वन प्रबंधन समिति में इस बात का भी निर्णय ले लेते हैं कि कुछ दिनों के लिए हर घर से दो सदस्य श्रमदान के लिए आएंगे। ग्राम वन प्रबंधन समिति इस बात का विशेष ख्याल रखती है कि श्रमदान के लिए गांव से पुरुष और महिलाओें की संख्या आधी-आधी ही होनी चाहिए। इसमें किसी प्रकार की घटबढ़ स्वीकार्य नहीं है।
जहां तक कितना पैसा एक घर को देना है, यह निर्णय ग्राम वन प्रबंधन समिति खर्च के हिसाब से प्रति घर पैसा निर्धारित करती है। जैसे इस बार प्रति घर 500 रुपए निर्धारित किया गया है। यदि इस राशि को सौ घरों से गुणा कर दें तो यह राशि 50 हजार रुपए हो जाती है। हालांकि रप्टा पर श्रमदान के लिए अपने घर से निकल रही धमशिला कहती हैं कि कभी तो हमें अधिक धनराशि भी खर्च करनी पड़ जाती है, क्योंकि कई बार मशीनरी का किराया बढ़ जाता है।
नदी पर बन रहे रप्टा के लिए गांव वाले किसी इंजीनियर को कभी नहीं बुलाते हैं। ग्रामीण अपने पारंपरिक ज्ञान के दम पर इस रप्टे का निर्माण पिछले 24 सालों से करते आ रहे हैं। अपने घर की देहरी पर पत्तल बना रहे रामबाहू नेताम ने डाउन टू अर्थ को बताया कि हमारे दादा-परदादाओं ने हमारे पिता को सिखाया कि कैसे बहती नदी को नुकसान के बिना ही रप्टा बनाना है और हम उनसे धीरे-धीरे सीख गए। वह बताते हैं कि रप्टा हम इसलिए बनाते हैं कि ताकि नदी का पानी रप्टा के ऊपर से आसानी से निकल सके। ध्यान रहे कि जहां भी कच्चा या पक्का रप्टा बनाया जाता है, वह इस तरह से बनाया जाता है कि नदी में अधिक पानी आने की स्थिति में वह आसानी से रप्टा के ऊपर से निकल सके।
काजल नदी पर जबर्रा गांव के आदिवासियों द्वारा बनाए गए पुल के कारण आसपास के 15 ग्राम पंचायतों को गरियाबंद जिला और नगरी ब्लॉक के हाट पहुंचने में आसानी होती है। ग्रामीणों को इस रप्टा के निर्माण के बाद औसतन 36 से 40 किलीमीटर दूरी कम हो जाती है। क्योंकि जबर्रा गांव से धमतरी मुख्यालय की दूरी 61 किलोमीटर है और नगरी व गरियाबंद की दूरी 10 से 12 किलोमीटर पड़ती है।
रामबाहू ने बताया कि गांव में छह माह का खर्चा जंगल की उपज से चलता है। यहां कोई भी आदमी निजी क्षेत्र में काम नहीं करता है। जबर्रा जैसे बड़े गांव में केवल एक आदमी को सरकारी नौकरी मिली है, वह भी चपरासी की। अन्य सभी ग्रामीणों की आजीविका जंगल पर ही पूरी तरह से निर्भर है। ग्रामीण जंगल की उपज अक्टूबर से लेकर मार्च तक एकत्रित करते हैं। रामबाहू ने बताया कि हम अपनी जंगल की उपज का केवल 20 प्रतिशत ही सरकार को बेचते हैं बाकी 80 फीसदी उपज हाट बाजार में जाकर बेचते हैं।
इसका कारण बताते हुए बेंदापानी गांव की मीना नेताम ने डाउन टू अर्थ को बताया कि सरकार जो खरीद करती है, वह हमारे खाते में डालती है और यह बहुत देर से आता है। साथ ही हमारे गांव में कोई पढ़ा लिखा नहीं है, ऐसे में हमारे लोगों को खाताबही न तो देखना आता है और न पढ़ना। कई ग्रामीणें ने शिकायत की है कि ऐसे में खाते में आए पैसे को वे ठीक से गिन नहीं पाते हैं, जो बैंक वाले ने दिया, वहीं लेकर आ गए। उनको मालूम ही नहीं कि उनके खाते में कितने पैसे आए और कितना उन्हें मिला। सड़क किनारे वनोपज बेच रही मीना कहती हैं कि ऐसे विपरीत हालात में हमें अपनी जीविका चलाने के लिए तुरंत कैश की जरूरत होती है, इसलिए हम हाट में जाकर अपनी उपज बेचते हैं। मीना गांव में सड़क किनारे कपड़े फैलाकर जंगल से खोदकर लाए गए दो प्रकार के जिमीकंद बेच रही हैं, एक का भाव 40 रुपए है और यह आसानी से मिल जाता है जबकि दूसरे का नाम करुकांदा है, वह इसे 60 रुपए किलाे बेच रही हैं, क्योंकि यह मुश्किल से मिलता है। वह कहती हैं कि हमारे लिए कैश जरूरी है, सरकार भी यदि हमारी उपज का कैश दे तो हम उसी को देंगे।
गांव की अधिकांश महिलाएं ही जंगलों में जाकर जंगली उपज एकत्रित करने का काम करती हैं और वे ही उसे बेचने लायक बनाती हैं। इसके बाद ही पुरुषों का काम शुरू होता है कि उसे निजी बाजार में जाकर बेचना है या ग्राम वन प्रबंधन समिति को बेचना है। ध्यान देने की बात है कि खुले बाजार में बेचने से आदिवासियों का अपनी उपज का अधिक पैसे मिलने की संभावना होती है जबकि सरकारी समर्थन मूल्य निश्चित होता है। इस संबंध में जबर्रा गांव के कृष्णा नेताम ने बताया कि सरकार जब हमारी उपज की खरीद करती है तो उसके कई चोंचले होते हैं, कभी तो कह देगी तुम्हारे बनाए गए पत्तल पूरी तरह से सूखे नहीं हैं इसलिए बड़ी मात्रा में हमारे बनाए गए पत्तल रद्द कर देती है। इसके अलावा अन्य वनोपज में वह मीनमेख निकालकर बड़ी मात्रा में उपज को रद्दी बना देती है। यही कारण कि अधिकांश ग्रामीण खुले बाजार में जाकर अपनी उपज बेचना पसंद करते हैं और इससे उनको तुरंत नकदी मिल जाती है।
छत्तीसगढ़ सरकार 2024-25 के दौरान राज्य में भर में 67 प्रकार की वनोपज खरीद रही है। जब यह 2000 में राज्य बना था, तब सरकारी खरीद के तौर पर सरकार केवल 7 प्रकार की वनोपज ही लेती थी। जबर्रा गांव में वर्तमान में 2024-25 के दौरान इस क्षेत्र में पाई जाने वाली 19 प्रकार की वनोपज की सरकार खरीद करती है।