सियांग घाटी का द्वंद्व: विकास, लोकतंत्र और सांस्कृतिक अस्तित्व की लड़ाई
अरुणाचल प्रदेश भारत के पूर्वोत्तर का एक अद्वितीय और बहुरंगी राज्य है, जिसे ‘सूर्योदय का राज्य’ कहा जाता है। हिमालय की तलहटी में स्थित यह प्रदेश उत्तर में चीन (तिब्बत), पूर्व में म्यांमार, पश्चिम में भूटान और दक्षिण में असम से घिरा है। लगभग 83,743 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला यह राज्य भौगोलिक दृष्टि से जितना विशाल है, जनसंख्या की दृष्टि से उतना ही विरल—जिससे इसकी प्राकृतिक समृद्धि अपेक्षाकृत अक्षुण्ण बनी रही है। घने वन, बर्फाच्छादित पर्वत, वेगवान नदियां और विविध जलवायु-क्षेत्र मिलकर इसे एक असाधारण पारिस्थितिक क्षेत्र बनाते हैं। उष्णकटिबंधीय से लेकर अल्पाइन तक फैले विभिन्न पारितंत्रों के कारण यह क्षेत्र जैव-विविधता का एक महत्वपूर्ण हॉटस्पॉट है।
अरुणाचल प्रदेश की सबसे बड़ी विशेषता इसकी जनजातीय विविधता है। यहां 26 प्रमुख जनजातियां और 100 से अधिक उपजनजातियां निवास करती हैं, जिनमें न्यीशी, आदि, अपातानी, गालो, मोनपा, मिश्मी, तागिन, नोक्टे, वांचो और तांगसा प्रमुख हैं। राज्य की लगभग दो-तिहाई आबादी अनुसूचित जनजातियों से संबंधित है। प्रत्येक जनजाति की अपनी भाषा, वेशभूषा, जीवन-पद्धति और सांस्कृतिक परंपराएं हैं, जो इस प्रदेश को एक जीवंत सांस्कृतिक मोज़ेक का रूप देती हैं।
अपातानी जनजाति, जो जीरो घाटी में निवास करती है, अपनी अद्वितीय धान–मछली एकीकृत खेती प्रणाली के लिए विश्वभर में जानी जाती है। वहीं, तवांग क्षेत्र में रहने वाली मोनपा जनजाति तिब्बती बौद्ध धर्म से गहरे रूप में प्रभावित है, जो उनके सामाजिक और धार्मिक जीवन को आकार देता है।
राज्य की अधिकांश जनजातियां, विशेषकर तानी समूह (आदि, न्यीशी, गालो, अपातानी, तागिन), ‘दोनी–पोलो’ आस्था प्रणाली का पालन करती हैं। ‘दोनी’ (सूर्य) और ‘पोलो’ (चंद्रमा) को केंद्र में रखने वाली यह परंपरा प्रकृति-आधारित जीववाद और ओझावाद पर टिकी है। इस आस्था में प्रकृति के प्रत्येक तत्व—नदी, पर्वत, वन और जीव—को जीवित और आध्यात्मिक सत्ता के रूप में देखा जाता है। सूर्य और चंद्रमा केवल खगोलीय पिंड नहीं, बल्कि नैतिकता, संतुलन और जीवन-ऊर्जा के प्रतीक हैं।
मिथुन को विशेष पवित्रता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, जो सामाजिक प्रतिष्ठा और आर्थिक स्थिरता से जुड़ा है। विभिन्न जनजातियों के अपने-अपने त्योहार हैं—जैसे आदि का ‘सोलुंग’ और गालो का ‘मोपिन’—जो कृषि चक्र, प्रकृति और सामुदायिक जीवन से गहराई से जुड़े होते हैं। इन अवसरों पर लोकनृत्य, गीत, अनुष्ठान और सामूहिक उत्सव सांस्कृतिक निरंतरता को बनाए रखते हैं।
राज्य में 50 से अधिक भाषाएं और बोलियां प्रचलित हैं, जिनके बीच हिंदी और अंग्रेजी संपर्क भाषा (लिंक लेंग्वेज ) का कार्य करती हैं। पारंपरिक समाज में विवाह, संपत्ति और सामाजिक संबंध मुख्यतः समुदाय के भीतर ही संरचित होते हैं। महिलाओं की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, वे पारंपरिक बुनाई और बांस-बेंत की हस्तकला में दक्ष होती हैं, जो न केवल सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है, बल्कि आजीविका का साधन भी है।
सियांग नदी: जीवन और संस्कृति की धुरी- अरुणाचल प्रदेश की सियांग नदी इस क्षेत्र की जीवनरेखा मानी जाती है। तिब्बत में ‘यारलुंग त्सांगपो’ के नाम से प्रवाहित यह नदी अरुणाचल से होकर असम में ब्रह्मपुत्र में विलीन हो जाती है। स्थानीय आदि जनजाति इसे ‘आने सियांग’ (मां सियांग) के रूप में श्रद्धा देती है। यह नदी केवल जल-स्रोत नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जीवन का केंद्र है।
मानवशास्त्री क्लिफर्ड गीर्ट्ज के अनुसार संस्कृति ‘अर्थों की एक जटिल प्रणाली’ है। इसी दृष्टि से देखें तो सियांग नदी आदि समाज के लिए जीवन, पहचान और आध्यात्मिक संबंध का प्रतीक है। इसके किनारे बसने वाले समुदायों का दैनिक जीवन—खेती, मछली पकड़ना, परिवहन और अनुष्ठान—सभी इस नदी से गहराई से जुड़े हैं।
आदि जनजाति, जो तानी समूह का हिस्सा है, सियांग घाटी में प्रमुख रूप से निवास करती है। इनका जीवन प्रकृति के साथ संतुलन पर आधारित है। पारंपरिक सीढ़ीदार खेती, वन संसाधनों का सतत उपयोग और मत्स्य पालन उनकी अर्थव्यवस्था के आधार हैं। अपातानी जनजाति जीरो घाटी में रहती है और अपनी विश्व प्रसिद्ध धान-मछली एकीकृत खेती के लिए जानी जाती है। इस पद्धति में धान के खेतों में ही मछली पालन किया जाता है, जिससे मिट्टी की उर्वरता स्वाभाविक रूप से बढ़ती है और रासायनिक उर्वरकों या कीटनाशकों की आवश्यकता नहीं पड़ती।
यह प्रणाली केवल कृषि तकनीक नहीं, बल्कि एक गहन पारिस्थितिक ज्ञान का प्रतीक है। यह दर्शाती है कि स्थानीय समुदाय किस प्रकार प्रकृति के साथ संतुलित संबंध स्थापित करते हुए सतत विकास का मार्ग अपनाते हैं।
इनकी सामाजिक व्यवस्था का केंद्र ‘केबांग’ नामक पारंपरिक ग्राम परिषद है, जो सामूहिक निर्णय-प्रक्रिया, विवाद-निपटान और सामाजिक संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भूमि का स्वामित्व मुख्यतः सामुदायिक और वंशानुगत अधिकारों पर आधारित होता है, जो निजी स्वामित्व की आधुनिक अवधारणा से भिन्न है।
यह प्रदेश केवल भौगोलिक रूप से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और पारिस्थितिक दृष्टि से भी अत्यंत समृद्ध प्रदेश है। यहां की जनजातीय परंपराएं, प्रकृति के साथ गहरा संबंध और विविध सांस्कृतिक अभिव्यक्तियां इसे भारत की बहुलतावादी पहचान का सशक्त उदाहरण बनाती हैं। यह प्रदेश हमें यह सिखाता है कि विकास और परंपरा के बीच संतुलन स्थापित करते हुए भी प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन संभव है।
प्रदेश की सियांग घाटी, जो अपनी जैव-सांस्कृतिक समृद्धि और जनजातीय जीवन-पद्धति के लिए जानी जाती है, आज एक बड़े विकासात्मक द्वंद्ध के केंद्र में है। प्रस्तावित अपर सियांग मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट इस द्वंद्ध का सबसे प्रमुख उदाहरण बनकर उभरा है, जहां एक ओर ऊर्जा सुरक्षा, बाढ़ नियंत्रण और सामरिक हितों की दलील दी जा रही है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय समुदाय अपने सांस्कृतिक अस्तित्व, पारिस्थितिक संतुलन और पारंपरिक जीवन के संरक्षण को लेकर चिंतित हैं।
प्रस्तावित अपर सियांग मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट: विकास बनाम सांस्कृतिक अस्तित्व भारत सरकार ने 2008-09 में सियांग नदी पर विशाल डैम की योजना बनाई। 2010 तक क्षमता 10,000-11,000 मेगावाट घोषित की गई। 2013-17 में तकनीकी सर्वेक्षण और प्री-फीजिबिलिटी रिपोर्ट की तैयारी हुई।
2017-18 से स्थानीय समुदायों ने विरोध शुरू किया। 2020 में चीन द्वारा यारलुंग त्सांगपो पर डैम की खबरों के बाद 2021-22 में मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बनाया — चीन के ‘वॉटर बम’ के जवाब के रूप में।
2022 में परियोजना को वापस लिया गया, लेकिन 2024 में इसे पुनर्जीवित किया गया। 2025-26 में स्थिति जटिल हो गई। विरोध तेज हुआ — हैंगिंग ब्रिज जला दिया गया, सर्वेक्षण मशीनरी क्षतिग्रस्त हुई और कई गांवों ने एमओयू का विरोध किया।
कुछ गांवों (जैसे रिगा, पारोंग, रियू, पंगकांग आदि) में एमओयू साइन हुए और लगभग 70% हितधारकों ने PFR के लिए सहमति दी। सरकार ने इसे ‘राष्ट्रीय हित का प्रोजेक्ट’ घोषित किया और एनएचपीसी को जिम्मेदारी सौंपी। 13 अगस्त 2025 को 350 करोड़ रुपये का स्पेशल डेवलपमेंट पैकेज स्वीकृत हुआ।
हालिया रिपोर्ट्स (अप्रैल 2026) में PFR सर्वेक्षण शुरू होने की बात है। हैंगिंग ब्रिज जलाना (23 मई 2025), मशीनरी क्षति (28 मई 2025), डीसी को घेरना — विरोध की तीव्रता दिखाती हैं। नारे — “नो डैम, गो अवे”, “नो डैम, नो सर्वे”, “एनएचपीसी गो बैक”, “सेव सियांग” — सांस्कृतिक अस्तित्व की लड़ाई को व्यक्त करते हैं।
राज्य में लगातार विरोध और आंदोलन हो रहे हैं। लोगों के बीच असुरक्षा और अशान्ति बढ़ रही है। राज्य और केंद्र सरकार की तरफ से इनकी बातचीत को नजरंदाज किया जा रहा है। स्थानीय मीडिया उनकी बातों को गलत तरह से पेश कर रहा है और मुख्य मीडिया से तो वो गायब ही हैं।
प्रस्तावित अपर सियांग मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट 11,000-11,200 मेगावाट क्षमता वाला भारत का सबसे बड़ा प्रस्तावित जलविद्युत प्रोजेक्ट है। करीब 300 मीटर ऊंचा डैम और 9.2 बिलियन क्यूबिक मीटर जलाशय के साथ यह विद्युत उत्पादन, बाढ़ नियंत्रण, जल भंडारण और चीन की गतिविधियों के खिलाफ रणनीतिक संतुलन का लक्ष्य रखता है।
अनुमानित लागत 1.13 लाख करोड़ रुपये से अधिक है। लोगों का कहना है कि चीन 60 हजार मेगावाट का डैम बना रहा है तो उसके जवाब में 10, 11 या 12 हजार मेगावाट के डैम को बनाने का क्या औचित्य है?
यह जवाबी कार्यवाही नहीं बल्कि मूर्खता है। इससे फायदा तो कुछ नहीं होगा उलटे हजारों जिंदगियां तबाह हो जाएगी।
सांस्कृतिक विस्थापन और पहचान का संकट: मानवशास्त्र में संस्कृति को समग्र जीवन व्यवस्था माना जाता है — जिसमें ज्ञान, विश्वास, सामाजिक संबंध, पर्यावरण और अर्थ प्रणाली शामिल हैं। आदि जनजाति के लिए सियांग घाटी मात्र भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि पवित्र सांस्कृतिक स्थान है।
डैम और विशाल जलाशय से अपर सियांग जिले में कम से कम 20 गांव और सियांग जिले में 7 गांव पूरी तरह डूब जाएंगे, जबकि 52 गांव अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होंगे। प्रमुख गांव — यिंगकियोंग, गेकू, कोमकार, सिमोंग, गेते, कारको, रामसिन, रिगा, पारोंग, रियू, बेगिंग आदि — डूबने की कगार पर हैं। हजारों हेक्टेयर सीढ़ीदार खेत, जंगल संसाधन, जंगली उत्पाद और सांस्कृतिक-धार्मिक स्थल पानी में समा जाएंगे।
माइकल सेर्निया के इंप्रूवमेंट रिस्क एंड रिकंस्ट्रक्शन मॉडल के अनुसार विकासजनित विस्थापन से आठ प्रकार की गरीबी पैदा होती है: भूमि हानि, आजीविका क्षरण, सामाजिक विघटन, सांस्कृतिक क्षरण, स्वास्थ्य हानि, सामुदायिक एकता का नुकसान आदि। आदि समाज में यह सांस्कृतिक विस्थापन होगा।
केबांग की लोकतांत्रिक प्रक्रिया प्रभावित होगी। दोनी-पोलो अनुष्ठान, मौखिक परंपराएं, पूर्वजों की भूमि और नदी से जुड़े मिथक नष्ट हो जाएंगे। न्यिबु की भूमिका और सामुदायिक बंधन कमजोर पड़ेंगे।
संयुक्त राष्ट्र के आदिवासी अधिकारों पर घोषणा-पत्र (यूएन डीआरआईपी) फ्री, प्रायर और इंफॉर्म्ड कंसेंट (एफपीआईसी) तथा भारत के कानूनों के तहत अनिवार्य है, लेकिन पीएफआर चरण में ही दबाव, प्रलोभन और सुरक्षा बलों की तैनाती की शिकायतें हैं। कुछ गांव (जैसे गेकू) 100% असहमति पर अडिग हैं, जबकि अन्य में समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए जा रहे हैं। सियांग इंडिजिनस फार्मर्स फोरम और सियांग इंडिजिनस फार्मर्स फोरम युवा विंग ‘बिना सहमति, कोई परियोजना नहीं’ का नारा दे रहे हैं।
अपर सियांग जिले के गेकू गांव के 300 परिवार पूरी तरह एकजुट हैं। एक निवासी ने कहा, “जब गांव डूब जाएगा, संस्कृति खत्म हो जाएगी। हम कैसे जीएंगे? जब मरना ही है तो लड़ते हुए मरना बेहतर है।” एक बुजुर्ग ने कहा, “भारत का सबसे बड़ा डैम बन रहा है और हमारी आवाज कोई नहीं सुन रहा।” एक किसान ने कहा, “सियांग हमारी मां है। भूमि चली गई तो दोबारा नहीं बन सकती। आने वाली पीढ़ियां बर्बाद होंगी।”
एनएचपीसी, सीएसआर और सहमति की प्रक्रिया: पीएफआर चरण में ही एनएचपीसी सीएसआर के तहत कार्य कर रही है — बोलेंग में आदि बाने, केबांग कार्यालय, स्कूल गोद लेना, मोबाइल मेडिकल यूनिट, वाहन, स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स, सिंचाई आदि। 350 करोड़ रुपये का पैकेज आजीविका और इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च होने वाला है। कुछ गांवों में 5 करोड़ रुपये का एमओयू पैकेज चर्चा में है। 10 मई 2023 को स्थानीय नेता द्वारा 20 लाख रुपये का “सीक्रेट फंड” की मांग भी गई है। इस तरह के फंड और वाहनों की मांग लोगों के बीच संदेह बढ़ा रहा है। लोग पूछ रहे हैं — बुनियादी सुविधाएं सरकार की जिम्मेदारी है इसे कंपनी पर क्यों डाली जा रही हैं?
लोगों का स्पष्ट कहना है कि “जब सब डूबने वाला है, तो यहां विकास कार्यों की क्या जरूरत?” एमओयू साइन करने वाले गांवों को पैकेज मिल रहे हैं, जबकि विरोध करने वाले गांवों में विभाजन पैदा किया जा रहा है। सियांग इंडिजिनस फार्मर्स फोरम युवा विंग ने 5 सितंबर 2025 को परिपत्र जारी कर तानाशाही रवैये की आलोचना की।
पर्यावरणीय और पारिस्थितिक प्रभाव: यह क्षेत्र सीस्मिक जोन V में है। डैम निर्माण और जलाशय भरने से प्रेरित भूकंप की आशंका है। पूर्वी हिमालय 82-84% वन कवर, 12 प्रकार के जंगलों और दुर्लभ प्रजातियों (लाल पांडा, बादलदार तेंदुआ, हॉर्नबिल, नई खोजी गई तितलियां और चींटियां) का घर है। माउलिंग नेशनल पार्क और डायिंग एरिंग वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी जैसे क्षेत्र प्रभावित होंगे।
टॉपसॉइल (5-10 इंच मोटाई) की हानि अपरिवर्तनीय है — इसे बनने में 100-1000 वर्ष लगते हैं। जैव विविधता हॉटस्पॉट और प्रवासी मार्ग नष्ट होंगे। डैम नदी की स्व-शुद्धिकरण क्षमता, मिट्टी जमा और मत्स्य पालन को प्रभावित करेगा। जलवायु चरम स्थितियां (अचानक वर्षा, सूखा) बढ़ेंगी। सीमांत किसान सबसे अधिक प्रभावित होंगे, जो धान-मछली जैसी पारंपरिक प्रणालियों पर निर्भर हैं।
जलविद्युत को ‘ग्रीन एनर्जी’ कहना आंशिक सत्य है। निर्माण, वनों की कटाई और उपकरणों से कार्बन उत्सर्जन बढ़ता है। विकसित देश पुराने डैम तोड़ रहे हैं क्योंकि नदी की प्राकृतिक धारा बहाल करना जरूरी है।
भारत में एंटी-डैम आंदोलनों में से नर्मदा बचाओ आंदोलन ने विस्थापन, आजीविका हानि और सांस्कृतिक क्षरण को राष्ट्रीय चर्चा में लाया। टिहरी डैम आंदोलन ने भूकंप संवेदनशील क्षेत्रों में जोखिमों पर जोर दिया। प्रो. जी.डी. अग्रवाल (स्वामी ज्ञान स्वरूप सनंद) ने गंगा परियोजनाओं के खिलाफ उपवास कर नदियों को जीवित इकाई मानने की वकालत की। विश्व आयोग ऑन डैम्स (2000) ने FPIC, विकल्पों का मूल्यांकन और सतत विकास पर जोर दिया। ये आंदोलन दिखाते हैं कि विकास केवल तकनीकी या आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिस्थितिक संदर्भों से जुड़ा है।
अरुणाचल में सियांग संघर्ष इनकी निरंतरता है, जहां राज्य शक्ति और राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर स्थानीय ज्ञान प्रणालियां और अधिकार हाशिए पर धकेले जा रहे हैं। सही विकास वह है जो स्थानीय समुदायों की सांस्कृतिक तर्कसंगति (cultural logic) का सम्मान करे। विकल्प जैसे विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा, सामुदायिक जल प्रबंधन, धान-मछली जैसी पारंपरिक प्रणालियों का विस्तार और इको-टूरिज्म ऊर्जा-जल सुरक्षा दे सकते हैं बिना जीवन व्यवस्था नष्ट किए।
सियांग को बचाना केवल एक नदी या जनजाति की लड़ाई नहीं है। यह भारत में जनजातीय अधिकारों, सांस्कृतिक विविधता, पर्यावरण न्याय और सतत विकास की व्यापक बहस है। यदि अनदेखा किया गया तो अनुपम जैव-सांस्कृतिक विरासत नष्ट हो सकती है और क्षेत्रीय सामाजिक सद्भाव प्रभावित होगा।
स्थानीय समुदायों की मांग है कि फ्री, प्रायर एंड इनफॉर्म्ड कंसेंट, पारदर्शी संवाद, पूर्ण पर्यावरण-सामाजिक प्रभाव आकलन और सांस्कृतिक-मानवशास्त्रीय आयामों को प्राथमिकता दे। सरकार और एनएचपीसी को सहमति निर्माण की बजाय सच्चे संवाद की ओर बढ़ना चाहिए। सियांग घाटी की रक्षा और आदि जनजाति की सांस्कृतिक निरंतरता विकास का सही मापदंड होना चाहिए।
जलवायु परिवर्तन के खतरों को जानते हुए भी यदि सरकार सियांग घाटी में इतने बड़े पैमाने पर प्रकृति के साथ खिलवाड़ करने को तैयार हैं, तो किसी भी संभावित आपदा के लिए हमें तैयार रहना होगा। चीनी नीतियों की मूर्खता का जवाब अपनी ओर से मूर्खता नहीं हो सकता। हम एक लोकतंत्र हैं—ऐसी स्थिति में प्रभावित लोगों की सहमति के बिना इतना विशाल बांध कैसे बनाया जा सकता है? यदि स्थानीय लोग इस परियोजना को नहीं चाहते, तो नदी को स्वाभाविक रूप से बहने दिया जाना चाहिए।
स्वीकारोक्ति: हम दुबित सिराम और टापो निय्या का आभार व्यक्त करते हैं, जिन्होंने फरवरी 2026 में अरुणाचल प्रदेश के प्रभावित क्षेत्र में हमारी तीन दिवसीय यात्रा संभव बनाई और सियांग तथा अपर सियांग जिलों के विभिन्न गांवों में स्थानीय समुदायों के साथ बातचीत आयोजित की। यह रिपोर्ट उनके, उनके परिवारों तथा सियांग इंडिजिनस फार्मर्स फोरम और उसके यूथ विंग के सदस्यों के बिना संभव नहीं होती, जिन्होंने यात्रा के दौरान हमें गर्मजोशी से आतिथ्य प्रदान किया।

