कंक्रीट की ‘तरक्की’ बनाम 99% आपदाओं का भारत: क्या हम विनाश को ही विकास मान बैठे हैं?
हम एक ऐसे दौर में खड़े हैं जहां विकास की परिभाषा कंक्रीट, चौड़ी सड़कों और ऊंची इमारतों में सिमट कर रह गई है। लेकिन इसी ‘तरक्की’ के समानांतर एक और कहानी चल रही है; वो है टूटते मौसम, बेकाबू आपदाओं और एकदम थक चुकी धरती की। सवाल यह है कि क्या हम जिस रफ्तार को प्रगति समझ रहे हैं, वह दरअसल हमें एक ऐसे भविष्य की ओर नहीं धकेल रही जहां बचाने के लिए बहुत कम बचा होगा?
चरम मौसमी आपदाओं का नया सामान्य
क्या आप जानते हैं कि बीते वर्ष 2025 में हमारे देश भारत ने कितने दिन चरम मौसमी आपदाएं झेली हैं? सरकारी और वैज्ञानिक संस्थाओं द्वारा जारी ताजा ‘स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरमेंट 2026’ रिपोर्ट का आंकड़ा हमारी रीढ़ में सिहरन पैदा करने के लिए काफी है।
इस रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ने साल 2025 के कुल दिनों में से 99 फीसदी दिनों में देश के किसी न किसी हिस्से में कोई न कोई भयंकर प्राकृतिक आपदा दर्ज की है। यानी बीते साल के 365 दिनों में से शायद ही कोई ऐसा दिन था जब देश का कोई न कोई हिस्सा प्रकृति के इस भीषण गुस्से से न प्रभावित हुआ हो।
इस देशव्यापी पर्यावरणीय मार के कारण भारत में 4,419 लोगों की अकाल मृत्यु दर्ज की गई और 1.74 करोड़ हेक्टेयर से अधिक फसलें पूरी तरह तबाह हो गईं। ये आंकड़े गवाह हैं कि जलवायु परिवर्तन अब किसी दूर के भविष्य की अमूर्त समस्या नहीं, बल्कि हमारे आज की दहकती हुई त्रासदी बन चुका है। जिसे हम विकास की गति समझ रहे हैं, वह दरअसल हमारे विनाश की गति साबित हो रही है।
वैश्विक मंचों का पाखंड और ढहती पारिस्थितिक सीमाएं
इस भयावह सच्चाई के बीच जब हम ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ के मंचों पर खड़े होकर “प्रकृति से प्रेरित: जलवायु और हमारे भविष्य के लिए” जैसे अंतरराष्ट्रीय नारों पर लच्छेदार भाषण सुनते हैं, तो यह आत्ममुग्धता और पाखंड के सिवाय कुछ नहीं लगता। हम पर्यावरण संकट को आज भी एक ऐसी दूरगामी समस्या मानते हैं जो शायद हमारे पोते-पोतियों के दौर में आएगी। लेकिन सच यह है कि यह संकट हमारे ड्राइंग रूम के दरवाजे को तोड़कर अंदर दाखिल हो चुका है।
वैश्विक वैज्ञानिक आकलन बताते हैं कि पृथ्वी की नौ ‘प्लैनेटरी बाउंड्रीज’ (पारिस्थितिक सीमाएं) में से सात मुख्य सीमाओं का गंभीर उल्लंघन हो चुका है। इनमें जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का नुकसान और भूमि-प्रणाली में बदलाव सबसे ऊपर हैं। भारत इस वैश्विक आपदा का मुख्य केंद्र बनता जा रहा है, जहां देश का कोई भी राज्य सुरक्षित नहीं है। मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और केरल जैसे राज्य इस मौसमी मार के सबसे बड़े शिकार बनकर उभरे हैं, जहां सामान्य जनजीवन पूरी तरह पटरी से उतर चुका है।
कागजी बजट और बेदम हवा: प्रशासनिक विफलता का कड़वा सच
यह आई-ओपनर सच केवल मौसम का बदलता मिजाज नहीं है, बल्कि हमारा संवेदनहीन और पंगु प्रशासनिक तंत्र भी है। संसदीय समितियों की हालिया रिपोर्टों में सामने आए वित्तीय तथ्य देश को चौंकाने वाले हैं। देश के बड़े शहरों में प्रदूषण को नियंत्रित करने और पर्यावरण क्षमता बढ़ाने के लिए ‘प्रदूषण नियंत्रण योजनाओं’ के तहत आवंटित सैकड़ों करोड़ रुपए का सरकारी तंत्र उपयोग ही नहीं कर पाया।
बजट का एक बड़ा हिस्सा फाइलों के फेर में बिना खर्च हुए वापस लौट गया।जब देश की राजधानी दिल्ली और देश के अन्य बड़े औद्योगिक शहर वायु प्रदूषण के कारण ‘गैस चैंबर’ बन जाते हैं, तब पर्यावरण सुधार के लिए आवंटित फंड का तिजोरियों में बंद रह जाना हमारी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं का असली और क्रूर चेहरा उजागर करता है।
विडंबना यह है कि देश की बड़ी आबादी आज भी ऐसे क्षेत्रों में रहती है जहां वायु गुणवत्ता की नियमित और विश्वसनीय निगरानी का अभाव है। हम बिना यह मापे कि हम कितनी ज़हरीली हवा सांस में ले रहे हैं, तरक्की के हाईवे बनाने में मशगूल हैं।
कंक्रीट की अंधी दौड़: जब बुनियादी ढांचा ही बन जाए आत्मघाती
आज विकास के नाम पर हमारा पूरा ध्यान इस बात पर केंद्रित है कि हमारे एक्सप्रेस-वे कितने चौड़े हो रहे हैं और शहरों में कितनी बहुमंजिला कंक्रीट की इमारतें खड़ी हो रही हैं। प्रगति के इस दोषपूर्ण ‘रोडमैप’ में पेड़ों को केवल ‘सड़क की बाधा’ समझा जाता है और उनको बिना किसी सरकारी सूचना के काट दिया जाता है।
आज बुनियादी ढांचे के नाम पर पहाड़ियों को काटा जा रहा है, आर्द्रभूमियों को पाटकर कंक्रीट की सोसायटियाँ बनाई जा रही हैं और नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को कंक्रीट की दीवारों से बांधा जा रहा है।और उन सबके दुष्परिणाम भी हामी को झेलने पड़ रहे हैं । हमारे इन सभी कुकृत्यों का नतीजा यह है कि जरा सी बारिश आधुनिक शहरों को जलमग्न कर देती है, और गर्मियों का तापमान 47 डिग्री सेल्सियस को पार कर जाता है।
कंक्रीट का यह भारी ढांचा शहरों में ऊष्मा द्वीप (अर्बन हीट आइलैंड) विकसित करता है, जिससे रातें भी ठंडी नहीं हो पातीं। बिना पारिस्थितिक संतुलन के खड़ा किया गया यह भौतिक विकास ताश के पत्तों के महल जैसा है, जो एक ही भीषण बाढ़, चक्रवात या भूस्खलन में पूरी तरह जमींदोज हो जाता है।
आगे की राह: ‘इको-सेंट्रिक’ विकास का अनिवार्य रोडमैप आज पर्यावरण की रक्षा की दिशा में काम कर रही संस्थाओं और नीति निर्माताओं को यह स्पष्ट संदेश देना होगा कि जलवायु परिवर्तन के इस दौर में अब कंक्रीट-आधारित पुराने मॉडल को बदलना अनिवार्य है।
प्रकृति-आधारित समाधान
इस प्रक्रिया को सुधारने के लिए केवल सरकार ही नहीं बल्कि आम नागरिकों को भी अपने क्षेत्र और जीवन में संस्थागत बदलाव लाने की आवश्यकता है । सरकारी तंत्र को बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में कंक्रीट के समानांतर आर्द्रभूमियों का पुनरुद्धार, भूजल पुनर्भरण और वर्षा जल संचयन को कानूनी रूप से अनिवार्य बनाने की दिशा में काम करना होगा ताकि मूलभूत रूप से उत्पन्न समस्याओं का समाधान किया जा सके।
बजटीय जवाबदेही और क्रियान्वयन:
संसद द्वारा स्वीकृत पर्यावरण बजट का शत-प्रतिशत और समयबद्ध उपयोग सुनिश्चित हो, और प्रशासनिक देरी के लिए सख्त जवाबदेही तय की जाए।
हरित गलियारे
राजमार्गों के निर्माण में केवल वनों की अंधाधुंध कटाई न हो, बल्कि व्यापक स्तर पर मूल वृक्षों के गलियारे विकसित किए जाएं, ताकि पारिस्थितिक तंत्र को बचाया जा सके।

