इलेस्ट्रेशन: सोरित गुप्तो
इलेस्ट्रेशन: सोरित गुप्तो

एक जिद के दस साल

देश और समाज के इस अति-उत्साहजनक वातावरण में हिंदी ‘डाउन टू अर्थ’ आया और जिस बात का डर था वही हुआ
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सृष्टि में किसी भी जीव की उत्पत्ति यूं ही नहीं होती कि वह बस यूं ही वेला इधर-उधर टहलता फिरे. प्रकृति में हर सृष्टि का अपना एक मोटिव या कहें तो औचित्य होता है। अब ‘डायनासोर-समाज’ की  ही बात ले लीजिए।

कहते हैं, हजारों करोड़ों वर्ष पहले दुनिया पर डायनासोर नामक किसी जीव का राज हुआ करता था कि कालांतर  में किसी मनुष्य नामक प्राणी को जुरेसिक-पार्क नाम की ब्लॉक-बस्टर फिल्म बनाने की प्रेरणा मिले और आगे चलकर जम्बुद्वीप के नव-धनाड्य अर्बन -मिडिल-क्लास के अंग्रेजीदां बच्चों के लिए एम्यूजमेंट-पार्कों की स्थापना हो।

ठीक इसी प्रकार हजारों साल पहले एक जमाना था, जब डायनासोर की तरह हिंदी पत्रिकाओं का वर्चस्व था। इतिहासकार बताते हैं कि वह एक निहायत ही बुरा दौर था और इस बात का पता इसी से चलता है कि लोग हिंदी पत्रिकाएं पढ़ते थे। आखिर लोगों के पास इतना वेला वक्त कैसे था कि वे पत्रिकाएं पढ़ें ? वह भी हिंदी में?

फिर आया वैश्वीकरण का दौर। यह वो वक्त था, जब रास्ते के सभी स्पीड-ब्रेकर और ट्रेफिक-सिग्नल को  तोड़ कर देश तरक्की की राह पर  यूं दौड़ पड़ा कि मत पूछिए। ऐसे में अखबार समूहों के मालिकानों ने अपनी दूरदृष्टि का सही उपयोग करते हुए झट से पता लगा लिया कि  पढ़ने और खास तौर पर हिंदी में कुछ पढ़ने से देश के विकास में रूकावट आ सकती है।

अखबार समूहों के मालिकानों को न केवल देश की, बल्कि अपने पाठकों की भी चिंता थी। कोई दौड़ते हुए आखिर पढ़ कैसे सकता है?  इससे  गिरने और चोट लगने कि सम्भावना बनी रहती है।

अतः देश और हिंदी पाठकों के हित को देखते हुए अपने सीने पर हिंदी विरोध के भारी पत्थर को रख कर बड़े अखबार समूहों ने अपनी हिंदी पत्रिकाओं को एक के बाद एक बंद करना शुरू कर  दिया। पढ़ना और खासकर हिंदी पत्रिकाओं का पढ़ना अब बैक डेटेड और विकास विरोधी था।

कल तक आम घरों के स्टडी टेबल से लेकर नाई की दुकान और रेलवे स्टेशन के स्टाल से लेकर किसी छत पर अलसाई सी पड़ी खाट पर दिख जाने वाली  रविवारों, कादाम्बिनियों, साप्ताहिक  हिन्दुस्तानों , सारिकाओं और धर्मयुगों  का युग यकायक खत्म हो गया और किसी डायनासोर की तरह उनपर साल-दर-साल उपेक्षा की बर्फ की मोटी चादर चढ़ती चली गयी।

विदेशों में बीते कुछ समय में वैज्ञानिकों ने डायनासोर को पुनर्जीवित करने पर काम शुरू किया।

उधर दूसरी और देश में आज से दस साल पहले एक नई पत्रिका को शुरू करने पर बात शुरू हुई। पत्रिका हिंदी में निकलनी थी। और तो और, उस  पत्रिका का जनसरोकार से जुड़े विषयों पर केन्द्रित होना  था।

यह तो हम हिंदी-भाषियों के लिए खतरे की घंटी थी और हमारी बौद्धिक अस्मिता पर सीधा हमला था। हम हिन्दीभाषी लोगों की  परेशानी भला क्यों कोई नहीं समझता?

बम्बइया हिंदी फिल्म तक ठीक है पर  हम हिंदी-भाषी ‘हिन्डी न्यूज पेपर’  आज अंग्रेजी में रीड करना  चाहते हैं। केवल यही नहीं  हमारे पास करने को कितना काम है!

हम ‘अपनी’ हिंदी को दूसरी अहिन्दी  भाषाई लोगों पर थोपने में इतना बीजी रहते हैं कि हिंदी में कुछ पढ़ने/लिखने के लिए हमारे पास अब वक्त ही नहीं रहता।

रही बात पत्रिका निकलने की  तो किसी फिल्म या लाइफ-स्टाइल से जुड़ी पत्रिका हो तो कोई  सोच भी सकता है पर जनसरोकार से जुड़ी  पत्रिका!

यह तो बात किसी के भी समझ से बाहर  है। तुर्रा तो यह कि यह भी तय किया गया कि उस पत्रिका में पर्यावरण और विकास के मुद्दों से जुड़ा एक व्यंग्य का नियमित कालम जाएगा!

अब बात कुछ आसान लगने लगी थी, क्योंकि पिछले कुछेक वर्षों से हिंदी में व्यंग्य  लिखना काफी आसान हो चला था। हिंदी में लिखा कुछ भी अपने आप में व्यंग्य ही माना जाने लगा था।

पाठक/पाठिकाओं में अब पढ़ने के अलावा हर चीज में रूचि थी। पढ़ने के नाम पर अब लोग केवल अपना पास बुक और बैंक स्टेटमेंट ही चाव से पढ़ते थे।

रही बात व्यंग्य लेखन की तो पाठक/पाठिकाओं की बात कौन करे। अक्सर व्यंग्यकार भी कुछ लिख भले ही लें पर उसे पढ़ने से कतराते थे।

देश और समाज के इस अति-उत्साहजनक वातावरण में हिंदी ‘डाउन टू अर्थ’ आया और जिस बात का डर था वही हुआ। लोगों ने इसे एकदम आड़े हाथों लिया और देखते ही देखते हिन्दीभाषी प्रदेश के लोग इस नई पत्रिका को देखने और पढ़ने के लिए टूट पड़े।

दस साल पहले बोये एक नन्हे से बीज ने देखते ही देखते  एक विशाल महीरूह की शक्ल ले ली।

कहते हैं- सरकारी-गैरसरकारी गोदी न्यूज चैनलों के कुकुर भौं- भौं और बेसिरपैर की नूरा -कुश्ती के शोरगुल से निजात पाने के लिए लोग इसी वृक्ष की  ठंडी छांव में आकर बैठते हैं और अपनी सोच पर  सूचनाओं की सान चढाते हैं।

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