स्ट्रीट स्कूल: पढ़ाई से नजदीकी, नशे से दूरी

युवाओं का एक समूह जबलपुर के पनागर कस्बे में वंचित तबके के बच्चों को पढ़ाने के लिए हर रविवार को चलाता है स्ट्रीट स्कूल
फोटो: भागीरथ
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दद्दू का असली नाम कोई नहीं जानता। पांच साल का वह बच्चा 2020 में चाय की टपरी पर काम कर रहा था। मां की मौत के बाद नशे के आदि पिता ने उसे अपने पास नहीं रखा था। पिता और अपने आसपास के माहौल में रहकर दद्दू भी नशे में डूब गया था। चाय की टपरी में उसके काम करने की वजह भी उसकी नशे की लत थी। 

मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर से करीब 22 किलोमीटर दूर पनागर कस्बे में रहने वाले अनुराग मिश्रा के जेहन में दद्दू की यही तस्वीर है। उस रोज अनुराग अपने दोस्तों के साथ टपरी में चाय पीने आए थे, तभी उनकी नजर दद्दू पर पड़ी। फटेहाल दद्दू एक कोने में बैठकर गांजा पी रहा था। 

दद्दू को देखकर अनुराग का मन बहुत व्यथित हुआ और उन्होंने ऐसे बच्चों को पढ़ाने और नशे की लत से दूर करने के लिए पनागर में ही एक सड़क किनारे एक पेड़ के नीचे अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया। नॉन बैंकिंग फाइनैंस कारपोरेशन में नौकरी करने वाले अनुराग और उनके दोस्तों ने अपना रविवार का दिन इन बच्चों की पढ़ाई के लिए पूरी तरह समर्पित कर दिया।    

उन्होंने हर रविवार सुबह 9 से 12 बजे तक लगने वाले इस स्कूल का नाम स्ट्रीट स्कूल रखा है। पनागर की आदिवासी बस्तियों विवेकानंद वार्ड, जनप्रकाश वार्ड, सुभाष वार्ड और बिसेंदी गांव से आने करीब 100 बच्चे यहां नियमित कक्षाएं ले रहे हैं। कुछ बच्चे तीन किलोमीटर दूर से पैदल चलकर यहां पहुंचते हैं।  

अनुराग ने स्ट्रीट स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षकों का एक वाट्सऐप ग्रुप बनाया है जिसमें अलग-अलग विषयों के 114 शिक्षक हैं। ये सभी शिक्षक एक दिन पहले अपनी उपलब्धता सुनिश्चित कर देते हैं और स्कूल पहुंच जाते हैं। इन शिक्षकों में कुछ इंजीनियरिंग, कुछ कानून और कुछ फार्मसी की पढ़ाई कर रहे हैं।  

अनुराग के अनुसार, स्ट्रीट स्कूल में आने वाले 80 प्रतिशत बच्चे कोल आदिवासी हैं जिनके परिवार वाले मुख्यत: मछली मारने और मजदूरी करते हैं। इन बच्चों के अधिकांश परिजन नशे की गिरफ्त में हैं। इतना ही नहीं करीब 50 प्रतिशत घर ऐसे हैं जहां सिंगल मदर पैरेंटिंग कर रही है क्योंकि बहुत से परिवारों के पुरुष नशे की लत के कारण अकाल मृत्यु को प्राप्त कर चुके हैं। ऐसे परिवारों में बच्चे कमाई की जरिया हैं।  

अनुराग और उनके साथियों ने घर-घर जाकर ऐसे बच्चों की पहचान की और उनके परिजनों को शिक्षा की अहमियत समझाई। उनके समझाने से बहुत से परिजन अपने बच्चों को स्ट्रीट स्कूल में भेजने को राजी हो गए। अनुराग और उनके युवा साथियों ने बस्तियों के ज्यादातर बच्चों को नियमित स्कूल में भी दाखिला करवाया। वर्तमान में स्ट्रीट स्कूल में पढ़ने वाले शत प्रतिशत बच्चे नियमित स्कूल जा रहे हैं, जबकि 2020 में जब स्ट्रीट स्कूल शुरू हुआ था, तब 10-15 प्रतिशत बच्चे की स्कूल जाते थे। अनुराग कहते हैं कि उनकी इस पहल के बाद कुछ बस्तियों से पहली बार दसवीं कक्षा पास की।  

विवेकानंद वार्ड में रहने वाले आशीष कुशवाहा की 10 साल की बेटी सुनैना और 7 साल का बेटा रुद्र स्ट्रीट स्कूल जाता है। उनका कहना है कि स्कूल में बहुत सी चीजें सिखाई जाती हैं। उनके बच्चे खासकर कला और डांस को पसंद करते हैं। स्कूल में बच्चों की छिपी प्रतिभा बाहर आती है, इसलिए बच्चे रविवार को स्कूल आने का बेसब्री से इंतजार करते हैं। उनका कहना है कि स्कूल साल में बच्चों को एक ट्रिप पर भी ले जाता और हर रविवार को क्लास के अंत बच्चों को पौष्टिक नाश्ता भी मिलता है।  

स्कूल में गणित और विज्ञान पढ़ाने वाले बीटेक के छात्र पीयूष पटेल कहते हैं कि वह रविवार को कहीं नहीं जाते। उनका आधा दिन क्लास के लिए रिजर्व है। आईटी में डिप्लोमा कर रही पायल स्कूल में 14 महीने से गणित पढ़ा रही हैं। उनका कहना है कि उन्हें सोशल मीडिया से पता चला कि स्कूल में गणित की शिक्षक की जरूरत है तो वह फौरन बच्चों को पढ़ाने पहुंच गईं। 

विवेकानंद वार्ड में रहने वाली और इस साल 12वीं कर रही वंशिका ने 11वीं क्लास तक स्ट्रीट स्कूल में पढ़ाई की है। 12वीं करने के बाद वह स्कूल में पढ़ाने की इच्छुक हैं। वंशिका अपने वार्ड में 10वीं पास करने वाली दो छात्राओं में शामिल हैं। 

अनुराग यह दावा नहीं करते कि स्ट्रीट स्कूल में पढ़कर बच्चे आगे चलकर अफसर बन जाएंगे। उसका उद्देश्य केवल इतना है कि बच्चे कम से कम शिक्षित को जाएं और जीवन बर्बाद करने वाले नशे से दूर रहें। वह बताते हैं कि शुरुआत में स्ट्रीट स्कूल में आने वाले बहुत से बच्चे बीड़ी, गांजा, सुलोचन और शराब आदि का सेवन करते थे, लेकिन समझाने पर कुछ बच्चे नशे से दूर हो गए। ऐसे बच्चों को ध्यान उन्होंने आर्ट एंड क्राफ्ट की ओर मोड़कर उनकी रचनात्मकता को दिशा दिखाई। अनुराग कहते हैं कि उन्होंने स्ट्रीट स्कूल की वजह बने दद्दू को बाद में बहुत खोजा, लेकिन वह नहीं मिला।  

अनुराग के अनुसार, उनके काम से खुश होकर एक दंपति ने स्कूल के लिए 40 लाख की करीब 7,000 वर्गमीटर जमीन दान की है। भविष्य में उनकी योजना इस जमीन पर एक स्थायी बिल्डिंग बनाकर बच्चों को पढ़ाने की है। साथ ही वह मानसिक रूप से विक्षिप्त लोगों को भी यहां रखेंगे।

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