चित्र साभार: शान। शान चौथी कक्षा का छात्र है
चित्र साभार: शान। शान चौथी कक्षा का छात्र है

युद्ध के मध्य ग्रामीण-संरचना: ‘रोमांटिसिज्म’ या ‘कॉस्मिक कंसियसनेस’?

कोविड व युद्ध ने दोनों ही संकटों ने गांवों की उपयोगिता और अनिवार्यता को स्थापित किया है, और साथ ही भारतीय शहरों की सीमाओं को भी उजागर किया
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गांवों के विमर्श को अक्सर ‘नोस्टाल्जिया’ या ‘रोमांटिसिज्म’ की तरह देखा जाता है, जबकि हमारे पास ऐसी अनगिनत परिस्थितियां आई हैं जब किसी बड़े संकट के समय बड़े से बड़े शहरों ने दम तोड़ दिया, और गांवों ने अपनी महत्ता हर बार साबित कीI हम दो बड़े उदाहरण लेते हैं- पहला कोविड महामारी के समय; और दूसरा अभी चल रहे ईरान, अमेरिका, और इजराइल युद्ध के समय आया ऊर्जा-संकटI

दोनों ही संकटों ने गांवों की उपयोगिता और अनिवार्यता को स्थापित किया है, और साथ ही भारतीय शहरों की सीमाओं को भी उजागर कियाI कोविड के समय लोगों का पलायन वापस गांवों की तरफ ही शुरू हो गयाI लोग दिल्ली मुंबई, बेंगलूर जैसे बड़े शहरों से एक तरह से उपेक्षित भावों के साथ गांवों की तरफ पलायन किएI

ध्यान से विचारिए तो यह एक आश्चर्यजनक प्रघटना प्रतीत होती है, क्योंकि महामारी के समय लोग शहर छोड़ रहे थे जहाँ चिकित्सा, स्वास्थ्य और अन्य सुविधाओं की भीमकाय नीतियां, सेवाएं और संस्थाएं उपलब्ध थी, जिसकी जरुरत किसी भी महामारी के समय नितांत रूप से होती है; और वे लौट रहे थे उन गांवों की तरफ जहाँ यह माना जाता है कि जीवन जीने की बुनियादी सुविधाएँ और संस्थाएं भी नहीं हैंI आखिर गांवों में ऐसा क्या था कि महामारी के उस वैश्विक संकट में शहरों की तमाम सुविधाएँ उनके लिए महत्वहीन हो गई!

हम लौटते हैं वर्तमान संकट पर जो ईरान, अमेरिका, और इजराइल के युद्ध में जाने से पैदा हुआ हैI इससे जो सबसे बड़ा संकट भारत में आया है वह है ऊर्जा और इंधन काI शहरों का पूरा अस्तित्व ऊर्जा और इंधन के बिना मुंह के बल लुढ़क सकता है, क्योंकि इसकी संरचना ही आधुनिक ऊर्जातंत्र पर निर्भर हैI और आज यही हो रहा हैI

शहर का आम आदमी खाना बनाने के लिए इंधन के अभावों से जूझ रहा हैI वह अपना सारा कार्य छोड़कर सम्पूर्ण शक्ति इस बात में लगाए हुआ है कि कैसे उसे एक रसोई गैस सिलेंडर मिल सकेI स्थिति इतनी जटिल है कि कई ऐसे मामले सामने आए जहाँ गैस सिलेंडर के लिए पंक्ति में लगे कुछ लोगों की मृत्यु तक हो गईI यह आधुनिक शहरों की त्रासदी को बताने के लिए पर्याप्त है कि इंधन का प्रबंध करने में लोगों की जान चली जाती हैI

ऐसा प्रतीत होता है कि संकट के समय शहर गांवों की तुलना में अधिक असुरक्षित हैI वहां सुविधाएँ जितनी अधिक है उसके अभाव में अस्तित्व को बचाए रखना भी उतना ही कठिन हैI एक स्थिति की कल्पना करते हैं- ‘अगर शहरों में बिजली की आपूर्ति एक सप्ताह के लिए बंद कर दी जाए तो क्या होगा, और खासकर तब जब समय भीषण गर्मियों का हो’! यह कल्पना ही डराने के लिए पर्याप्त हैI लेकिन गांवों के पास तो सैकड़ों वर्षों का अनुभव है कि बिना बिजली और आधुनिक ऊर्जा तंत्र के कैसे अपने अस्तित्व को धारणीयता के साथ बचाए रखा जाएI

परंपरागत और आधुनिक विकास से पिछड़े गांवों की संरचना आधुनिक शहरों की संरचना से भिन्न हैI गांवों के पास कुछ विशेष सामर्थ्य है जिसे उसने कुदरत से सैकड़ों वर्षों के साथ संवाद से पाया हैI और वही इसे संकट के समय भी बचे रहने की शक्ति प्रदान करता हैI

शहर के लोग गैस-सिलेंडर के बिना भूखे मर सकते हैं, तो दूसरी तरफ गांवों के लोगों के पास अनगिनत विकल्प है अपने अस्तित्व को निरंतर बनाए रखने काI वे पास के जंगलों से सूखी टहनियां और पत्ते लायेंगे और उससे अपना खाना बना लेंगेI जिनके पास पशुपालन है वे सूखे गोबर से इंधन का प्रबंध कर सकते हैंI लेकिन शहरों में यह सब संभव नहीं हैI

उनके पास न तो पशुपालन है, और न ही पास में कोई जंगल या झाड़ी जहाँ से वे इंधन एकत्र कर सकेI अगर कहिं से वे उपले ले भी आते हैं तो उनके 2 बीएचके फ्लैट में परंपरागत चूल्हे नहीं जलाए जा सकतेI शहरों ने घरों की बनावट भी ऐसी रखी है कि उसमें न तो हवा का प्रवेश आसानी से संभव है और न सूर्य-प्रकास काI घरों में इन दोनों का न आना ही कई बीमारियों के प्रवेश का कारण बनता हैI

गांवों की जो अर्थव्यवस्था है उसे हम नातेदारी की अर्थव्यवस्था कह सकते हैंI समाजशास्त्री कार्ल पोल्यानी अपनी किताब ‘द ग्रेट ट्रांसफॉर्मेशन’ में कहते हैं- ‘कल्चर इज इकॉनमी’; अर्थात परंपरागत समाजों में संस्कृति और अर्थव्यवस्था अलग-अलग नहीं थे, बल्कि एक दूसरे से संयुक्त थेI लेकिन, आधुनिक पूंजीवाद ने जिस सामाजिक-आर्थिक संरचना को निर्मित किया है।

उसमें अर्थतंत्र सामाजिक दुनिया से एकदम अलग हो गएI जैसे पहले कृषि एक सांस्कृतिक क्रिया थी, लेकिन अब यह एक उद्धोग में तब्दील हो चुका हैI परम्परागत कृषि का सम्बन्ध नातेदारी, समाज-सम्बन्ध, लोक-साहित्य, त्योहारों आदि से था, लेकिन अब यह नितांत पूंजी उत्पादन की प्रणाली मात्र हैI आज जब यह संकट आया है तो गांवों में जो एक नातेदारी-अर्थतंत्र है।

वह एक दूसरे के सहयोग से कमोबेश चल रहा हैI वहां पडोसी के प्रति एक चिंता का भाव है, जबकि शहरों में पड़ोस का अस्तित्व ही संकट में हैI वस्तुतः वर्तमान शहरी सभ्यता में यह संकट ‘प्राथमिक-समूह’ के अस्तित्व का भी है जिसे कई सामाजिक चिंतकों ने ‘डेथ ऑफ़ द प्राइमरी ग्रुप’ की संज्ञा भी दी हैI     

ग्रामीण संरचना एक तरह से कुदरती संरचना है, उनका दर्शन ब्रह्मांडीय है, जिसे ब्रिटिश दार्शनिक एडवर्ड कारपेंटर ‘कॉस्मिक कंसियसनेस’ कहते हैंI उल्लेखनीय है कि यह शब्दावली उन्होंने भारतीय दर्शन को पढने के बाद ही प्रयोग किया थाI

गांवों ने प्रकृति, परिवेश और स्वयं को एक भाव से देखा जिस कारण प्रकृति ने भी इसे विशेषाधिकार दिया प्राकृतिक संसाधनों काI शहर के लोग पत्थर और सीमेंट, पलास्टिक और जहरीले रसायनों में मस्त रहें, जबकि गांवों के हिस्से में नदियां, पहाड़, जंगल और आकाश दिए गएI

इनकी पारिस्थिकीय संरचना भी इसे विकल्पों से समृद्ध करती हैI शहरों के पास पारिस्थितिकीय चेतना कम होने के कारण इनके पास विकल्पों का भी अभाव होता हैI विकल्पहीनता की यह स्थिति शहरी जनसंख्या, खासकर आम लोगों को संकट में धकेल देती हैI

गांवों के पास बहुत कुछ है जिससे आधुनिक शहरी सभ्यता को सीखने की जरुरत हैI दुर्भाग्य से हमने विकास का पैमाना ही बनाया है शहरों कोI गांवों का शहरीकरण कर दिया जाना ही विकास का अंतिम लक्ष्य बन चुका है, और यह सब लगातार किया जा रहा हैI गांव निरंतर अपना स्वरूप खो रहें हैंI

यह आत्मघाती प्रवृति हैI आज दुनिया युद्ध में है, कल और युद्ध न हो इस बात को न मानने का कोई ठोस कारण नहीं दिखाई देताI संकट जैसे आज हैं, भविष्य में भी होंगे, और कई प्रकार के होंगेI गांवों की पारम्परिक अर्थव्यवस्था को बचाना ही भारतीयता को बचाना हैI संकट के समय हम गांवों की तरफ ही देखते हैंI समाधान के तत्व वहां आज भी है, क्योंकि उनके मूल में समावेशिता की सोच हैI

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