इलेस्ट्रेशन : विक्रम नायक
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विकास के अधिकार बनाम विकास के अवसर

आइए, हम महात्मा गांधी को विचार और कर्म से आत्मसात करने के लिए समाज और सरकार को फिर तैयार करें
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ग्रामीण भारत: विकास के अधिकार बनाम विकास के अवसर

(आलेख : रमेश शर्मा, राष्ट्रीय समन्वयक – एकता परिषद)

‘विकास के अधिकार’ के बिना ‘विकास के अवसर’, अपूर्ण और आभासी हैं ………..

महात्मा गांधी, गांवों को भारत देश की आत्मा मानते थे। उनका कहना था कि - आर्थिक स्वायत्तता हासिल करने का मुख्य मार्ग 'गांवों के विकास' से आयेगा। लेकिन, भारत देश को राजनैतिक स्वायत्तता मिलने के साथ /बाद जो मार्ग हमने चुना, वह महात्मा गांधी की विचारधारा - कार्यधारा से अलग ही था /है। लगभग सात लाख गांवों के परिसंघ को 'भारत देश' कहने वाले महात्मा गांधी के स्वप्न और उसके संभावित मार्ग से समाज और सरकार - दोनों अलग ही चल पड़े। स्वाधीनता के बाद, यह देश के भीतर ‘भारत और इंडिया’ के मध्य, नया राजनैतिक - आर्थिक सीमांकन था। कालांतर मे इस सीमांकन और उससे उपजी दरारें इतनी गहरी होती गयीं कि, राजनैतिक और आर्थिक स्वायत्तता, दोनों ही सैद्धांतिक रूप से संदेहों के अंधेरों मे धकेल दिये गये। यह राष्ट्रपिता के बिना बनने वाले भारत का नया भूगोल था/है।

छत्तीसगढ़ के धुरली, उड़ीसा के बोरभाठा, महाराष्ट्र के डोमखेड़ी और झारखण्ड के जादूगोड़ा के मध्य अनेक यथार्थपरक समानतायें हैं। जहां पंचायतों के प्रस्ताव पराजित घोषित किये गये - जहां देशप्रेमी नागरिक, अपनी ही जन्मभूमि मे देशद्रोही करार दिये गये - जहां सरकारों ने , संवैधानिक नैतिकताओं के उपर विकास के तर्कों को चुना - और जहां स्वाधीन भारत के लिये महात्मा गांधी का ग्राम स्वराज, एक असंभावित सपना भर मान लिया गया । धुरली, बोरभाठा, डोमखेड़ी और जादूगोड़ा सहित संघर्षों के इतिहास बन चुके अनेक गांव, उस नई इंडिया के उत्पाद हैं - जहां महात्मा गाँधी के ग्राम स्वराज को विस्मृत करते हुये, भारत के ग्रामीण समाज को इक्कीसवीं सदी के इंडिया के ख़ातिर, सर्वस्व त्याग के मार्ग मे धकेल दिया गया।

भारत मे अमूमन इन सभी और इन जैसे लगभग सात लाख से अधिक गांवों के अवाम द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि - इक्कीसवीं सदी के आत्ममुग्ध इंडिया के साथ खड़े हैं, लेकिन गांव मानो बीसवीं सदी के भारत मे ही कहीं खो कर रह गया। एक देश की दो कहानी और दो कहानियों के अनेक पात्रों के आठ दशकों का संक्षिप्त इतिहास यहीं से प्रारंभ होता है, और कहीं समाप्त नहीं होता।

एक अनुमान के मुताबिक, विगत आठ दशकों में – इनमें से प्रत्येक गांवों के मतदाताओं के माध्यम से अब तक लगभग 18-22 संसद सदस्य, लगभग 20-22 विधानसभा सदस्य और अन्य सैकड़ों सदस्य - जिला, जनपद और ग्राम पंचायतों के लिये निर्वाचित हुये हैं। लेकिन, निर्वाचित महानुभावों का यह गणितीय समुच्चय भी गांवों के समाजतंत्र और अर्थतंत्र को 'अधिकार संपन्न' नहीं बना पाया। ये सकल असफलता का, संख्यात्मक पैमाना और गुणात्मक सवाल दोनों ही है।

सवाल तो यह भी है कि - देश के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण ग्रामीण विकास मंत्रालय की अपनी मौलिक 'ग्रामीण विकास नीति' कहां है? क्या ग्रामीण विकास नीति का अभाव महज़ नीतिगत चूक है - या कल्याणकारी राज्य की नयी व्यवस्था के दौर मे यह यथार्थपरक (राज)नैतिक फ़ैसला है? क्या ग्रामीण विकास मंत्रालय वास्तव मे गांधी दर्शन से परे आधे-अधूरे अल्पकालीन योजनाओं को ढोने वाले निकाय तक सीमित रह गया है? या फ़िर, ग्रामीण विकास का राजनैतिक दर्शन ही महात्मा गांधी के हिन्द स्वराज से पीछे कहीं भटक चुका है?

गौरतलब है कि विगत 10 बरसों मे भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा, ग्रामीण भारतीयों के लिये एक भी नया क़ानून पारित नहीं किया गया है – जो 'वैधानिक यथास्थितिवाद' को दर्शाता है। यह यथास्थितिवाद उस सायास बनते इंडिया की समग्र राजनैतिक सोच का प्रथम परिणाम भी/ही है, जहां ग्रामीण विकास और शहरी विकास के मध्य दरारें गहन होती जा रही हैं। इन दरारों के मध्य लगभग 44 करोड़ असंगठित मज़दूरों अथवा/और ग़रीबी रेखा के नीचे कुचले गये 38 करोड़ वंचितों अथवा/और झुग्गी बस्तियों मे रहने वाले करोड़ों गुमनामों का भारत देश क़ैद है। अमृतकाल के दहलीज़ पर लड़खड़ाते खड़े इस भारत और इन गुमनाम भारतीयों के लिए महात्मा गांधी के जो भी विचार, दर्शन, नीतियां और सपने थे - वह समसामयिक राजनैतिक विमर्शों से पूरी तरह खारिज़ किया जा चुका है।

महात्मा गांधी के सबसे बड़े सपने अर्थात जिस 'पंचायती राज क़ानून' के माध्यम से ग्रामीण भारत मे ग्राम स्वराज तथा ग्राम स्वावलंबन का ताना-बाना बुना गया - वह क़ानून तक, ग्रामीण विकास मंत्रालय का अपना नहीं रहा। यही नही, पंचायती राज की लग़ाम उस मंत्रालय को दी गयी जिसका मुख्य ध्येय पंचायतों का प्रशासन है – और जिसका चाबुक, निर्विवाद रूप से जिला के प्रशासनिक प्रमुख के हाथों है। यह स्वाधीन भारत मे वैधानिक और नीतिगत विभाजन का एक ऐसा अबूझ प्रयोग है, जहाँ ग्रामीण विकास मंत्रालय वैधानिक रूप से अपूर्ण – और पंचायती राज मंत्रालय, विरोधाभासी वैधानिकताओं से परिपूर्ण है। कुल मिलाकर, यह महात्मा गांधी के सपनों के शेष अवशेषों पर खड़े ग्रामीण भारत की व्यथा-कथा है।

ग्रामीण विकास मंत्रालय, 'विकास' का झंडाबरदार तो है – लेकिन, विकास के 'अधिकार' का आधा-अधूरा प्रशासन, पंचायती राज मंत्रालय के अधीन है। और फिर, पंचायती राज मंत्रालय के पास सांकेतिक 'अधिकार' तो है – लेकिन, ग्रामीण विकास हेतु अपरिहार्य बुनियादी संसाधनों अर्थात 'जल, जंगल और जमीन' के (औपनिवेशिक) विधान तथा व्यवस्थायें – अन्य नामी-गिरामी मंत्रालयों के अधीन हैं। इसका सापेक्षिक अर्थ यह भी है कि 'जल, जंगल और ज़मीन' के मौजूदा क़ानूनों और ग्राम पंचायतों के मध्य, विगत आधी सदी से जारी टकराहटों का शोर कदाचित अनसुना ही रह जाये।

ग़ौरतलब है कि, भारत के संविधान मे 'विकास के अधिकार' को एक स्वतंत्र, स्पष्ट और सार्थक रूप से लागू किये जा सकने वाले मौलिक अधिकारों के रूप मे मान्यता नहीं दी गयी है। स्वाधीन भारत देश के संविधान मे - यह वास्तव मे न्यायालयीन व्याख्यायों और न्यायाधीशों के विवेकपूर्ण निर्णयों तक लंबित और अनुत्तरित विषय है। इन वैधानिक अराजकताओं का समग्र परिणाम ही है कि विकास के अधिकार और अवसर दोनों इंडिया ने हथिया लिया और ग्रामीण भारत, निहत्था ही रह गया।

ग्रामीण विकास नीति का यह संरचनात्मक अभाव, उस दृश्य-अदृश्य अराजकता को जनम देता है जहां राजनैतिक परमार्थों से आत्ममुग्ध प्रचलित व्यवस्थायें, ग्रामीण जनता को सरकारी योजनाओं के लाभार्थी के रूप मे अपघटित करती चली जा रही हैं। एक तथाकथित कल्याणकारी राज्य के द्वारा देश के ग़रीबों के राजनैतिक परमार्थ के लिये घोषित और पोषित योजनाओं के मायाजाल और अंतर्निहित राजनैतिक समीकरणों ने - उस पूरे ग्रामीण समाज को आर्थिक और मानसिक रूप से गुलाम बना लिया है, जहां अब उसकी राजनैतिक हैसियत, एक मोहताज लाभार्थी की रह गयी है। राजनैतिक आकर लेती हुई ग्रामीण भारतवासियों की यह नयी जनसंख्या और उसकी नयी पहचान – उस इंडिया का राजनैतिक उत्पाद है, जिन्हें शासन-प्रशासन शेष-अशेष राजनैतिक परमार्थों के ख़ातिर, हमेशा के लिये लाभार्थियों के नये वर्गीकरण मे विभाजित कर चुका है।

अमृतकाल की दहलीज पर खड़े भारत और ग्रामीण भारतवासियों के लिये अब यह अपरिहार्य है कि, महात्मा गांधी को महज़ राजनैतिक संकेतों से मुक्त कर के नयी राजनैतिक-नैतिकता को आकर दिया जाये। जहाँ नयी नैतिकताओं के आलोक मे - सात लाख स्वाधीन और स्वायत्त गांवों के परिसंघ के रूप में हम भारत को फिर सशक्त और समृद्ध बना सकें, और जहाँ रहने वाले भारतवासियों की पहचान एक 'अधिकार संपन्न नागरिक' के रूप मे पुनर्स्थापित किया जा सके। यही राजनैतिक-नैतिकता, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की स्मृति, स्वीकार्यता और समसामयिकता को सार्थक करेगी। आइए, हम महात्मा गांधी को विचार और कर्म से आत्मसात करने के लिए समाज और सरकार को फिर तैयार करें।

(लेखक रमेश शर्मा – एकता परिषद के राष्ट्रीय समन्वयक हैं)

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