हमारी शक्ति, हमारा ग्रह : लेकिन बड़ी जिम्मेदारी किसकी ?
आज पृथ्वी दिवस है। हर साल पृथ्वी दिवस पर हमसे कहा जाता है कि हर व्यक्ति कुछ अपनी आदत बदले तभी पर्यावरणीय संकट से निज़ात मिल सकती है; लाइट बंद कीजिए, पानी बचाइए, कचरा अलग कीजिए, कपड़े सोच‑समझकर खरीदिए, कार की जगह बस और मेट्रो का इस्तेमाल कीजिए आदि-आदि। इस साल तो पृथ्वी दिवस का वैश्विक आह्वान “हमारी शक्ति, हमारा ग्रह” जो स्पष्ट रूप से कहता है कि धरती को बचाने की असली शक्ति तो आम लोगों और समुदायों के पास है, ग्रह को बचाने की असली ताक़त हमारे हाथों में है। पूरा तंत्र, सोशल मीडिया, पोस्टर, नेताओं, शिक्षाविदों के भाषणों और अभियानों में तीव्र गर्मी में पौधरोपण साइकिलें, कपड़े के थैले और स्टील की बोतलें से पटा पड़ा है, जैसे पर्यावरणीय संकट का हल मुख्यतः व्यक्तिगत आदतों में छिपा हो।
आम लोगों से छोटी‑छोटी कुर्बानियाँ मांगी जा रही हैं, जबकि नीतियाँ, बाज़ार और बुनियादी ढाँचे अब भी उसी पुराने रास्ते पर भाग रहे हैं जो ज़्यादा खपत, ज़्यादा मुनाफ़ा और ज़्यादा बर्बादी को “सामान्य” मानता है। इसी समय दूसरी तरफ, सरकारें और वाणिज्यिक ईकाइयाँ नए जीवाश्म ईंधन प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दे रही हैं, पर्यावरणीय मानकों को हल्का कर रही हैं, और ऐसे उत्पाद और शहर डिज़ाइन कर रही हैं जिनमें संसाधनों की बर्बादी और प्रदूषण पहले से ही इनबिल्ट है। सवाल यह नहीं है कि व्यक्तिगत प्रयास महत्वपूर्ण हैं या नहीं; सवाल यह है कि क्या हम व्यक्तियों पर वह नैतिक और व्यावहारिक बोझ डाल रहे हैं जिसे वास्तव में नीति, बाज़ार और बुनियादी ढांचा व्यवस्थाओं को उठाना चाहिए। सवाल यह भी है कि ज़िम्मेदारी सच में किसकी ज़्यादा है; एक आम व्यक्ति की, या उन सारी व्यवस्थाओं की जो आम लोगो की आदतें, उनका रहन-सहन, उपभोक्ता प्रवृतियों तय करती हैं?
उपभोग सामान का टिकाऊ ना होना ही डिज़ाइन का हिस्सा हो
हमसे कहा जाता है कि कम खरीदिए, सोच‑समझकर खरीदिए, चीज़ों को ज़्यादा समय तक चलाइए। लेकिन जो चीज़ें बाज़ार में हैं, वे खुद कितनी “चलने वाली” हैं? इस विरोधाभास को समझने का एक सीधा तरीका है कि अपने आसपास की चीज़ों को ध्यान से देखिए। आज के ज़्यादातर उपभोक्ता उत्पाद जैसे मोबाइल फोन, लैपटॉप, वाशिंग मशीन, प्रिंटर, गैजेट सब के सब बड़े पैमाने में प्लांड ऑब्सोलेसेंस के सिद्धांत पर बनाये जाते हैं। मतलब, इन्हें इस तरह बनाया जाता है कि इनकी उम्र कम हो, बैटरी और पार्ट्स (सील्ड बैटरी, ना खुलने वाले ना बदल सकने वाले स्क्रू), सॉफ़्टवेयर अपडेट कुछ साल बाद बंद हो जाएं और थोड़ी‑सी खराबी पर इन्हें रीसाइकल या कबाड़ में भेजने के अलावा दूसरा विकल्प न बचे।
यह सिर्फ़ तकनीकी मजबूरी नहीं, एक सोची समझी और तैयार की गयी आर्थिक मॉडल है, “जितनी जल्दी ख़राब हो, उतनी जल्दी नया बिके” जिसमें कंपनियों की कमाई “बार‑बार बेचने” पर टिकी है, “टिकाऊ सामान बनाने” पर नहीं। कंपनी सालों‑साल चलने वाली चीज़ बनाएगी तो उसकी बिक्री धीमी पड़ेगी, शेयर बाज़ार भी उसे “कमज़ोर” कहेगा। फल यह है कि दुनिया भर में इलेक्ट्रॉनिक और प्लास्टिक कचरा पहाड़ की तरह बढ़ रहा है।
लेकिन इसके बावजूद जागरूकता अभियान या विज्ञापन अक्सर वहीं से शुरू होते हैं जहां सबसे कम प्रभाव संभव है, व्यक्तिगत नैतिकता से: “ग्रीन” प्रोडक्ट खरीदिए, जिम्मेदारी से खरीदिए, सही ढंग से फेंकिए, कम चीजें लीजिए, ई-वेस्ट सही जगह जमा कराइए। पृथ्वी दिवस के अभियान हमें बताते हैं कि अगर हम मोबाइल या कपड़े सोच-समझकर खरीदें, तो कचरा कम होगा। यह बात आंशिक रूप से सही भी है, पर सवाल यह है कि उपभोक्ता के पास वास्तव में विकल्प कितना है? अगर बाज़ार ही ऐसे उत्पादों से भरा हो जिनका खराब होना और न-मरम्मत योग्य होना पहले से तय है, तो “जिम्मेदार उपभोग" की नैतिकता वर्तमान आर्थिक ढांचे को बचाने का ज़रिया प्रतीत होती है।
जब तक ढांचा ही एक बार इस्तेमाल और जल्दी खराब होने वाली चीज़ों पर टिका रहेगा, तब तक आम आदमी की “अच्छी आदतें” सिर्फ़ लक्ष्ण का इलाज है, आसन्न पर्यावरणीय संकट का इलाज नहीं।
घर का नल, खेत की नहर या फ़ैक्टरी की नाली
पानी बचाने की बात आए तो ज़्यादातर उदाहरण हमारे बाथरूम और रसोई से शुरू होते हैं ब्रश करते समय नल मत चलने दीजिए, बाल्टी से नहाइए, पाइप से गाड़ी मत धोइए। यह सब ठीक है, लेकिन पूरी तस्वीर इससे कहीं बड़ी है। दुनिया का मोटे तौर पर ज़्यादा हिस्सा खेती किसानी में खेती में खर्चता है, दूसरा बड़ा हिस्सा उद्योग में, और घरेलू इस्तेमाल का हिस्सा कुल मिलाकर एक दशांश है। घर का फिज़ूल बहाया पानी निश्चित रूप से बचना चाहिए, पर अगर पूरी दुनिया के हर घर का नल तुरंत अनुशासित भी हो जाए, तो भी कुल पानी की खपत में जो बदलाव आएगा, वह शायद प्रतिशत से ज्यादा ना हो।
इसके उलट, जिन नहरों से सिंचाई होती है, वे ही लीकेज से भरी हों; जिन शहरों की पाइपलाइनें दशकों पुरानी हों; जिन कारखानों का गंदा पानी बिना ठीक से साफ किए नदी में डाला जाता हो, वहाँ जो बर्बादी और प्रदूषण होता है, उसका पैमाना घरेलू स्तर की तुलना में कई गुना बड़ा है। लेकिन टीवी पर जो चित्र उभरते हैं, वे प्रायः टूथब्रश करते बच्चे और टपकते नल हैं, न कि लीकेज से भरी नहरें या रात के अंधेरे में बहते फ़ैक्टरी के नाले।
ऊर्जा के मामले में भी यही कहानी दोहराई जाती है। हमसे कहा जाता है कि पंखा‑लाइट कमरे से निकलते समय बंद करिए, एसी का तापमान थोड़ा बढ़ाइए, बेकार चार्जर न लगे रहने दीजिए। सब सही सलाहें हैं, पर यह भी तथ्य है कि घरों की हिस्सेदारी वैश्विक ऊर्जा खपत में और बर्बादी में नगण्य है; बड़ा हिस्सा उद्योगों, परिवहन और बड़े वाणिज्यिक ढांचों का है। शहरों में अनगिनत बड़े-बड़े विज्ञापन में रात भर जगमगाते बिल बोर्ड याद तो है ना! अगर दुनिया का हर घर एकदम आदर्श बन जाए, तो कुल ऊर्जा खपत में 5-8 प्रतिशत का सुधार तो ज़रूर होगा, लेकिन पूरी तस्वीर नहीं पलटेगी। असली कहानी वहाँ चल रही है जहाँ स्टील, सीमेंट, केमिकल, डेटा सेंटर, विमान और मालवाहक जहाज़ 90 प्रतिशत तक ऊर्जा गटक रहे हैं और वहाँ अक्सर बात व्यवहारिक सुधार से ज़्यादा मुनाफ़े और “प्रतिस्पर्धा” की भाषा में होती है। यहां तक जलवायु और पर्यावरण संरक्षण की बहस हमेशा एक आम आदमी की नैतिकता और गैरजिम्मेदारी पर ही होती है।
1969 में बिसलेरी जैसी बोतलबंद पानी की कंपनी ने कैसे 4 लाख रुपये के निवेश से आज 7000 करोड़ रुपये का साम्राज्य खड़ा लिया है। नब्बे के दशक के पहले भारत जैसे देश की जनता अपनी यात्राओं में पीने के लिए घरों से पानी ले जाती थी लेकिन उसके बाद डिस्पोजेबल संस्कृति ने ऐसी धूम मचाई कि आज हम 200 मिलीलीटर के पानी के प्लास्टिक बोतलों का अंबार खड़ा कर दे रहे हैं। बाजार ने हमारी आदतों को अपनी तरफ़ मोड़ लिया जहां हम सिर्फ़ बोतलबंद पानी देखते हैं शुद्धता लगभग अनदेखा ही है। इस्तेमाल करो और फेंको संस्कृति की वजह से नीब वाली कलम लोग भूल गये और दो अरब से ज्यादा प्लास्टिक के पेन रोज फेंक दिए जाते हैं। इसमें कोई दोराय नहीं कि बाजार ने चीजें सुलभ की लेकिन हमारी आदतों को अपने कब्जे में कर लिया।
“सार्वजनिक परिवहन अपनाइए” पर है कहाँ?
हमारे शहर कोयला आधारित बिजली तंत्र, ऊर्जा‑भूखी आपूर्ति श्रंखलाएँ, कार आधारित परिवहन और अनियोजित-अनियंत्रित विकास की छाया में फल फूल रही है। आज की शहरों की बनावट में सार्वजनिक परिवहन का विरोधाभास और साफ़ दिखता है। हम सब सार्वजनिक आह्वान से दो चार है “कार कम चलाइए”, “बस‑मेट्रो का इस्तेमाल बढ़ाइए”, “साइक्लिंग को अपनाइए”। मगर जैसे ही आप नक्शे पर नज़र दौड़ाते हैं, पता चलता है कि नई कॉलोनियाँ और टाउनशिप क्लस्टर अक्सर वहाँ बनते हैं जहाँ न बस की उचित सुविधा है, न मेट्रो की, न ढंग का फुटपाथ न ही असल उपयोग वाली साइक्लिंग ट्रैक, असल में सार्वजनिक परिवहन वाला पन्ना शहर नियोजन से गायब ही दिखता हैं। जिस रूट पर लोगों की ज़रूरत है, वहाँ कभी‑कभार चलने वाली बसों को “विकल्प” कह देना ज़मीनी हकीकत से नज़र चुराना है।
ऐसे हालात में निजी वाहन का इस्तेमाल अक्सर सुविधा नहीं, मजबूरी होता है। कुछ लोग इस मजबूरी का खर्च उठा पाते हैं, कुछ नहीं उठा पाते और यही असमानता बढ़ती जाती है। इसके बाद अगर ये सवाल उठाए कि “आप क्यों कार लेकर निकल पड़े, आप क्यों भीड़ बढ़ा रहे हैं,” तो यह आधा सच होगा। असली सवाल यह है कि शहरों को इस तरह बनाया और बढ़ाया ही क्यों गया, जहाँ बिना निजी वाहन के रोज़मर्रा की ज़िंदगी चलाना लगभग असंभव हो गया है।
कार्बन फ़ुटप्रिंट का व्यापक संदर्भ
आजकल “कार्बन फ़ुटप्रिंट” का कॉन्सेप्ट खूब लोकप्रिय हुआ। वेबसाइटें और ऐप्स बताते हैं कि आपके खान‑पान, यात्रा और खरीदारी से कितना कार्बन निकल रहा है। यह जानकारी उपयोगी है, लोगों को सोचने पर मजबूर करती है। पर इसके साथ‑साथ एक और प्रक्रिया भी चलती रहती है, सारा नैतिक फ़ोकस धीरे‑धीरे व्यक्ति पर टिक जाता है।
अगर कोई उड़ान भरता है, तो उसे खुद से सवाल करना चाहिए, इसमें दो राय नहीं। लेकिन इसके साथ यह सवाल भी उतना ही ज़रूरी है कि हवाई यात्रा का विकल्प क्या है, शहरों के बीच रेल या बस नेटवर्क की हालत क्या है, और कंपनियाँ तथा नीतियाँ किस तरह सस्ते तेल‑आधारित विकल्पों को बढ़ावा दे रही हैं। अगर बिजली उसी ग्रिड से आ रही है जो मुख्य रूप से कोयले पर चलता है, तो अकेले उपभोक्ता की “ग्रीन चॉइस” की क्षमता काफी सीमित हो जाती है।
जब हर पर्यावरणीय मुद्दा “आपका फुटप्रिंट” और “आपकी लाइफस्टाइल” के फ़्रेम में सिमट जाता है, तो बड़े उपभोक्ता आधारित ढांचे जो मूल रूप से मौजूदा संकट के लिए जिम्मेदार है।
केवल यह कहते रहना कि “आपको अपना फ़ुटप्रिंट कम करना चाहिए,” काफी नहीं है, अब यह भी पूछा जाना चाहिए कि “ऊर्जा‑प्रणाली, उद्योग, आर्थिकी, कृषि और शहरी ढांचे किस दिशा में बढ़ रहे हैं।
ऑनलाइन बाज़ार इसका भी योगदान कम नहीं
ऑनलाइन बाज़ार ने जहाँ एक ओर खरीदारी को आसान बनाया है, वहीं दूसरी ओर लोगों की आदतें और पर्यावरण दोनों को गहरी चोट पहुँचाई है। असल में यह बाज़ार हमें "ग्राहक" नहीं, बल्कि एक ऐसी कठपुतली बना चुका है जिसकी डोर एल्गोरिदम के हाथ में है। "आपके लिए सुझाव", "सीमित समय की छूट", "केवल 2 आइटम बचे हैं" ये सब मनोवैज्ञानिक चालें हैं जो हमें बिना सोचे-समझे खरीदारी करने पर मजबूर करती हैं। बाज़ार ने हमारी स्वाभाविक संतोष की भावना को धीरे-धीरे नष्ट कर दिया है और उसकी जगह एक कभी न बुझने वाली चाहत भर दी है। फ़ास्ट फैशन के ज़रिए यह बाज़ार हमें यह भी बताता है कि पुराना पहनना "शर्म की बात" है, नया खरीदना "आत्मसम्मान" की निशानी है यानी खरीदारी न करना सामाजिक रूप से पिछड़ा होना है। यही नैतिक दबाव सबसे खतरनाक है और इस सबका खामियाज़ा भुगत रही है हमारी पृथ्वी हर ऑर्डर की अलग डिलीवरी के लिए दौड़ते वाहन, प्लास्टिक और थर्मोकोल का अंबार, एक-दिन डिलीवरी की होड़ में जलने वाला ईंधन और विशाल डेटा सेंटरों से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसें मिलकर वायुमंडल को ज़हरीला बना रही हैं। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यही बाज़ार अब "ग्रीन पैकेजिंग" और "इको-फ्रेंडली डिलीवरी" के नारे लगाकर पर्यावरण का रक्षक भी बनने का नाटक करता है ताकि हमारा अपराधबोध शांत हो और हम फिर से खरीदते रहें।
व्यवस्था जनित संकट” का समाधान “व्यवस्था बदलाव”
जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण समेत तमाम पर्यावरणीय संकट व्यवस्था जनित हैं। ये केवल कुछ लोगों की गलत आदतों से नहीं, बल्कि उन आर्थिक विकास की नीतियों और बाजारवाद से जन्मी हैं जो आम आदमी के रोज़मर्रा की ज़िंदगी की रूपरेखा तय करती हैं। शहर दूर‑दूर तक फैला दिया गया हो तो लंबी यात्रा करनी ही पड़ेगी; सस्ते और सुरक्षित ताज़ा खाने की बजाय पैक्ड फूड ही उपलब्ध हो तो प्लास्टिक भी बढ़ेगा और कार्बन भी; बाज़ार में वही वस्तुएँ सस्ती मिलें जो जल्दी टूटती हों और मरम्मत कठिन हो, तो “कम खपत” की नैतिकता कितनी भी मजबूत हो, व्यवहारिक सीमा वहीं टकरा जाएगी।
इसका मतलब यह नहीं कि व्यक्ति की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है। हममें से हर किसी के पास कुछ न कुछ विकल्प हैं कम‑ज़्यादा ही सही। हम अपने जीवन को थोड़ा‑थोड़ा बदल सकते हैं, और यह करना भी चाहिए। लेकिन साथ‑साथ यह स्वीकार करना भी ज़रूरी है कि असली लड़ाई अकेले रसोई, बाथरूम और ड्राइंग रूम में नहीं, बल्कि संसद, मंत्रालयों, बोर्डरूम, नगर योजनाओं और वैश्विक समझौतों के स्तर पर भी लड़ी जानी है।
“हमारी शक्ति, हमारा ग्रह” का असल संदेश
तो फिर पृथ्वी दिवस के इस साल के नारे “हमारी शक्ति, हमारा ग्रह” का असल संदेश क्या है? शायद इस तरह कि “हमारी शक्ति” का मतलब सिर्फ़ “हमारी खरीद‑फरोख़्त” पर नियंत्रण नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक राजनीतिक‑सामाजिक शक्ति भी है। यह शक्ति हमें यह कहने का साहस देती है किउत्पाद इस तरह बनाइए कि वे आसानी से मरम्मत हो सकें और लंबे समय तक चलें। उद्योगों और ऊर्जा संयंत्रों के उत्सर्जन और गंदे पानी पर समझौता नहीं, सख्त नियमन हो। शहरों में पैदल चलना, साइकिल चलाना और सार्वजनिक परिवहन कोई साहसिक काम नहीं, बल्कि सबसे सहज विकल्प हो। कृषि, उद्योग और सेवाओं का ढांचा इस तरह बदले कि पानी और ऊर्जा की बर्बादी जड़ से कम हो, सिर्फ़ दिखावे के लिए नहीं।
जब तक हम केवल आम लोगों की आदतों पर डंडा चलाते रहेंगे और बड़े ढांचों को अपेक्षाकृत बख्शते रहेंगे, तब तक पृथ्वी दिवस का उत्सव थोड़ा असंतुलित, और थोड़ा बनावटी भी लगेगा।
असली चुनौती यह है कि व्यक्तिगत नैतिकता और व्यवस्थागत सुधार दोनों को एक साथ देखा जाए। हम बत्ती भी बुझाएँ, नल भी बंद करें, और साथ‑साथ यह भी मांग उठाएँ कि जो सिस्टम हमारे चारों तरफ़ बुना जा रहा है, वह भी उतना ही जिम्मेदार और संयमी हो, जितना हमसे अपेक्षित है। जब “हमारी शक्ति” इस दोहरे स्तर पर काम करने लगेगी जीवनशैली में भी, और व्यवस्था में भी तभी “हमारा ग्रह” सचमुच सुरक्षित होने की दिशा में बढ़ सकेगा।

