अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर विशेष: भाषा और प्रकृति, एक का बचाव दूसरे का संरक्षण
प्रकृति का उजड़ना और स्थानीय भाषाओं का लुप्त होना, दो अलग-अलग समस्याएं नहीं हैं, बल्कि एक ही संकट के दो पहलू हैं। असल में हमारी भाषा और पर्यावरण एक-दूसरे का आईना हैं। जब हम मां बोली और उनकी स्मृतियां खो देते हैं, तो न केवल जैव विविधता खतरे में पड़ती हैं, बल्कि हमारे पुरखों का सदियों पुराना विवेक भी मिट जाता है जिसने मानव प्रजाति को इस धरती पर अब तक संभाले रखा है। इसलिए स्थानीय भाषा को बचाना वास्तव में प्रकृति को बचाने की दिशा में एक सशक्त कदम है क्योंकि इन दोनों का भविष्य एक-दूसरे से अटूट रूप से जुड़ा हुआ है।
प्रतिवर्ष 21 फरवरी को दुनिया अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाती है। यह दिन केवल उत्सव का नहीं, बल्कि एक व्यापक संघर्ष और बलिदान की याद दिलाता है। 1952 में ढाका विश्वविद्यालय के छात्रों ने अपनी मातृभाषा 'बांग्ला' को राजकीय दर्जा दिलाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी। 1999 में यूनेस्को द्वारा इस दिन को आधिकारिक मान्यता दी गई, जिसका उद्देश्य भाषाई और सांस्कृतिक विविधता को बढ़ावा देना था।
लेकिन आज 2026 की दहलीज पर खड़े होकर जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो संकट की गहराई कुछ और ही कहानी बयां करती है। आज भाषा का संकट केवल सांस्कृतिक पहचान तक सीमित नहीं है; यह पर्यावरण, पारिस्थितिकी तंत्र और प्रकृति के साथ हमारे रिश्ते के अस्तित्व से गहराई से जुड़ गया है।
जैसा कि यूनेस्को बैंकॉक की निदेशक सुह्यून किम रेखांकित करती हैं - "भाषाएं केवल शब्द नहीं हैं, वे अपने आप में पूरी दुनिया हैं"। जब एक भाषा लुप्त होती है, तो उसके साथ सदियों का वह ज्ञान भी मिट जाता है जो हमें प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जीना सिखाता है।
मातृभाषा और जैव-विविधता: एक ही सिक्के के दो पहलू
दुनिया भर में आज लगभग 7,000 भाषाएं बोली जाती हैं। सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि इनमें से लगभग 4,000 भाषाएँ उन क्षेत्रों में बोली जाती हैं जो पृथ्वी के सबसे समृद्ध जैव-विविधता वाले क्षेत्र है, 'हॉटस्पॉट' हैं, जैसे अमेजन के वर्षावन, मध्य अफ्रीका, दक्षिण-पूर्वी एशिया और भारत के उष्णकटिबंधीय क्षेत्र।
ये सारी स्थानीय भाषाएं समृद्ध पारिस्थितिकी तंत्रों में सदियों से विकसित हुई है जैसे एक-दूसरे का दर्पण हो। अधिकांश भाषाएं बोलियां है जिनका लिखित सन्दर्भ कम ही है, जो अक्सर मौखिक रूप में ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक संप्रेषित होते आई है। पर पिछले 50 वर्षों में जहां वैश्विक वन्यजीव आबादी में लगभग 73% की गिरावट आई है, वहीं इन क्षेत्रों की भाषाएँ भी तेजी से विलुप्त हुई है।
अनुमान है कि इस सदी के अंत तक 50 से 90 प्रतिशत भाषाएं विलुप्त हो सकती हैं; औसतन हर तीन महीने में एक भाषा दम तोड़ रही है। यह केवल शब्दों का अंत नहीं है, बल्कि उस 'पारिस्थितिक स्मृति' का अंत है जिसने हजारों सालों से इन समृद्ध जैव विविधता और जंगलों को बचाए रखा है।
शब्दों में छिपा संरक्षण का विज्ञान
स्थानीय भाषाएं प्रकृति के साथ जीने की एक जीवंत 'निर्देश पुस्तिका' (इंस्ट्रक्शन मैन्युअल) की तरह होती हैं। इसका एक अनुपम उदाहरण न्यूजीलैंड की माओरी संस्कृति में मिलती है।
माओरी विश्वदृष्टि में, हराकेके का पेड़ एक 'व्हानाउ' यानी परिवार का प्रतिनिधित्व करता है। इसके मध्य भाग रीतो को 'बच्चा' और इसके आसपास के पत्तों आवही रीतो को 'माता-पिता' माना जाता है।
स्थानीय नियमों के अनुसार, केवल बाहरी पत्तों, जिन्हें वे 'तूपुना' जिसे ‘दादा-दादी’, माना जाता हैं, की कटाई की जा सकती है। यह भाषाई वर्गीकरण सुनिश्चित करता है कि पौधा स्वस्थ रहे और उसका पुनर्जन्म होता रहे ताकि फूलों के तनों कोरारी की उपलब्धता के साथ स्थानीय पक्षियों के लिए फूलो का रस मिले और परागण फसलों का सुनिश्चित हो।
असल में यह भाषाई विधा स्थानीय खेती और जैव-विविधता को बनाए रखने का दास्तवेज है। यदि यह शब्दावली माओरी भाषा से मिट जाएँ, तो उनके साथ यह कृषि की वैज्ञानिक और सतत पद्धति भी मिट जाएगी।
इसी तरह, जैव-विविधता वाले क्षेत्रों में 75% से अधिक औषधीय पौधों का ज्ञान; जैसे नाम, उपयोग, केवल स्थानीय भाषाओं में ही उपलब्ध है। आधुनिक दवाओं में से लगभग आधी पौधों से ही आती हैं; ऐसे में एक भाषा का मरना भविष्य की जीवन रक्षक दवाओं की संभावना को स्थायी रूप से समाप्त कर सकता है।
भाषाई सपाटीकरण: भारतीय तटों का संकट
जब कोई समुदाय अपनी क्षेत्रीय बोली छोड़कर किसी प्रभुत्वशाली भाषा (जैसे अंग्रेजी) को अपनाता है, तो उसके शब्दों की सूक्ष्मता (शब्दों में समाहित स्थानीय गूढ़ सूचनाये) और सम्बंधित पारिस्थितिक ज्ञान धीरे धीरे विलुप्त हो जाते हैं।
इसका सबसे बड़ा उदाहरण भारत के पश्चिम में गुजरात से पूरब के बंगाल तक में तटीय क्षेत्रों में पाए जाने वाले जंगलों ले लिए 'मैंग्रोव' शब्द का बढ़ता उपयोग है। आज इसं वनों के लिए प्रशासन, शिक्षा और पर्यटन में एक ही अंग्रेजी शब्द 'मैंग्रोव' का उपयोग किया जाता है, जिसने स्थानीय भाषाओं की समृद्ध शब्दावली को निगल लिया है।
बंगाल के सुंदरबन का अर्थ केवल 'खूबसूरत वन' नहीं, बल्कि 'सुंदरी' के पेड़ों और जीवन रक्षक ज्वारीय जंगलों का प्रतीक है। वहीं आंध्र प्रदेश का तेलगु शब्द मडा वनलु केवल दलदल नहीं, बल्कि उन खारे जल क्षेत्रों को दर्शाता है जो परम्परागत रूप से मछलियों की नर्सरी और अक्सर आने वाले चक्रवातीय तूफान से बचाव का काम करते हैं।
तमिल, मलयालम यहाँ तक मराठी में उपयोग होने वाला कंदल मिट्टी की गहराई, खारेपन और उपयोग के आधार पर पेड़ों के बीच सूक्ष्म अंतर बताता है।
जब इन सभी को एक ही शब्द 'मैंग्रोव' में समेट दिया जाता है, तो वह विशिष्ट ज्ञान मिट जाता है कि कौन सा क्षेत्र मछली पकड़ने के लिए है, कौन सा तूफान रोकने के लिए और कहाँ से शहद एकत्र करना है।
यह भाषाई नुकसान लोगों के जीवन यापन से जुड़े जोखिमों को समझने और संसाधनों के बेहतरीन उपयोग करने की हजारों साल में विकसित समझ को कम कर देता है। इस प्रकार भाषाई सपाटीकरण, हमें हमारे ही जमीन और भूगोल से अलग करने की प्रक्रिया को तेज कर दे रहा हैं।
'पारिस्थितिक बुनियादी ढांचा' हमारी भाषाए
आज लगभग 43% भाषाएँ लुप्तप्राय हैं। वैश्वीकरण और रोजगार की होड़ में लोग विदेशी भाषाओं की ओर भाग रहे हैं, जिससे मातृभाषाओं का उपयोग घरों और स्कूलों में कम हो गया है।
यूनेस्को के अनुसार, दुनिया की 40% आबादी को ऐसी भाषा में शिक्षा नहीं मिलती जिसे वे अच्छी तरह और आसानी से समझ सकते हैं। यह न केवल सीखने की प्रक्रिया को धीमा करता है, बल्कि आने वाली पीढ़ी को उनके प्राकृतिक परिवेश से भी काट देता है।
डिजिटल दुनिया में भी स्थिति गंभीर है; 7,000 में से 100 से भी कम भाषाएँ इंटरनेट पर प्रभावी रूप से उपयोग की जा रही हैं। जब कोई भाषा डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध नहीं होती, तो वह आधुनिक ज्ञान प्रणालियों से बाहर हो जाती है और विलुप्ति की ओर बढ़ जाती है।
ऐसे में ये जरुरी है की हमें अपनी सोच में एक बुनियादी बदलाव लाना होगा और भाषाओं को केवल 'सांस्कृतिक जरुरत' के रूप में नहीं, बल्कि 'पारिस्थितिक बुनियादी ढांचे' के रूप में देखना आवश्यक है। भाषा और प्रकृति का संरक्षण कोई प्रतीकात्मक कार्य नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व के लिए एक अनिवार्य आवश्यकता है।
यदि इसी तरह अपनी भाषाओं को खोते रहे तो हम वास्तव में उस मानचित्र को खो देंगे जो अब तक हमें प्रकृति के साथ ताल मेल बिठा कर अनेक संकटों से बचाव का राह दिखाता रहा है
यदि हम इसी तरह अपनी भाषाओं को खोते रहे, तो हम वास्तव में उस 'मानचित्र' को खो देंगे जो हमें संकटों से उबरने और प्रकृति के साथ तालमेल बिठाने में हमें राह दिखाता है। पर्यावरणीय संरक्षण की बड़ी योजनाएं तब तक सफल नहीं हो सकतीं जब तक उनमें स्थानीय भाषाओं और संस्कृतियों को एकीकृत न किया जाए। किसी जंगल को बचाने का सबसे अच्छा तरीका उस जंगल को समझने वाली भाषा को बचाना है।
भाषा और प्रकृति का भविष्य एक-दूसरे से गुंथा हुआ है; एक की सुरक्षा दूसरे के संरक्षण की संभावनाओं को प्रबल करती है।

