फिल्म समीक्षा: उजड़ते सपनों की ‘चिता’
कुछ फिल्में मनोरंजन के लिए बनती हैं, कुछ कहानियां सुनाने के लिए, और कुछ ऐसी भी होती हैं जो हमारे भीतर दबे उन सवालों को कुरेद देती हैं जिन्हें हम अक्सर नजरअंदाज करना चुनते हैं। विनोद कापड़ी की फिल्म ‘पायर’ इसी तीसरी श्रेणी में आती है।
मनोरंजन के पारंपरिक ढांचों से परे हटकर, यह सीधे दर्शक की अंतरात्मा से संवाद करती है। यह केवल उत्तराखंड के किसी दूरदराज गांव की दुखद कहानी नहीं है, बल्कि पहाड़ों से हो रहे पलायन की उस त्रासदी का एक संवेदनशील दस्तावेजीकरण है, जिसकी भयावहता को हम अक्सर आंकड़ों और सरकारी रिपोर्टों तक सीमित कर देते हैं।
बेहतर अवसरों, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की तलाश में लोग पहाड़ों को छोड़कर शहरों का रुख कर रहे हैं, पीछे छोड़ जा रहे हैं—बूढ़े माता-पिता, वीरान मकान, सूनी पगडंडियां और उनके लौटने का एक अंतहीन इंतजार।
‘पायर’ का अर्थ है शवदाह की चिता। यह शीर्षक केवल उस लकड़ी के ढांचे का प्रतीक नहीं है जिस पर मृत देह को जलाया जाता है; यह उन पहाड़ी गांवों की प्रतीकात्मक चिता का भी प्रतिनिधित्व करता है जहां पलायन ने सामुदायिक जीवन, सामाजिक संबंधों और सदियों पुरानी लोक संस्कृति को धीरे-धीरे राख में बदल दिया है।
यह फिल्म मुख्य रूप से मृत्यु के भय के बारे में नहीं है, बल्कि जीवन की संध्या में लोगों को घेरने वाले डरावने अकेलेपन और अपनों की मौजूदगी की उनकी तड़प के बारे में है।
एक अंतहीन इंतजार
कहानी उत्तराखंड के एक सुदूर और धीरे-धीरे निर्जन हो रहे गांव में रहने वाले लगभग अस्सी वर्षीय बुजुर्ग दंपती—पदम सिंह और उनकी पत्नी तुलसी—के इर्द-गिर्द घूमती है। ढलती उम्र के साथ उनके शरीर जर्जर हो चुके हैं और वे अपनी दैनिक जरूरतों के लिए भी दूसरों पर आश्रित हैं।
उनका इकलौता बेटा हरिया करीब अट्ठाइस साल पहले रोजी-रोटी की तलाश में शहर गया था और फिर कभी वापस नहीं लौटा। इसके बावजूद, उनकी जिंदगी इसी उम्मीद पर टिकी है कि शायद किसी दिन दरवाजे पर दस्तक होगी और उनके बूढ़े माता-पिता की देखभाल के लिए हरिया आखिरकार लौट आएगा।
गांव से हरिया का जाना केवल एक बेटे का अपने माता-पिता से दूर जाने का किस्सा नहीं है। यह उस वृहद सामाजिक-आर्थिक वास्तविकता का हिस्सा है जिसमें युवाओं को अपने पैतृक गांवों में रोजगार या बेहतर जीवन की कोई संभावना नहीं दिखती।
परिस्थितियों से मजबूर होकर वे शहरों की ओर पलायन करते हैं, और उनके साथ ही गांवों का भविष्य भी गायब होता प्रतीत होता है। पीछे रह जाते हैं वे बुजुर्ग, जिन्होंने अपना पूरा जीवन अपने परिवारों को पालने और गांवों को बनाए रखने में खपा दिया।
गांव खाली हो रहा है, और जो एकाध पड़ोसी बचे हैं, वे भी जाने की तैयारी कर रहे हैं। ऐसे में पदम सिंह की सबसे बड़ी चिंता यह नहीं रह जाती कि उनके पास जीने के कितने दिन बचे हैं, बल्कि अधिक व्यथित करने वाला सवाल यह है कि उनकी मृत्यु के बाद उनका अंतिम संस्कार कौन करेगा?
एक बेहद झकझोर देने वाला दृश्य पदम सिंह को अपने और अपनी पत्नी की चिता के लिए खुद ही लकड़ियों की व्यवस्था करते हुए दिखाता है। यह पलायन के उस भयावह परिणाम को सामने लाता है, जहां गांव में लोगों की अनुपस्थिति अंतिम संस्कार जैसी बुनियादी प्रक्रिया को भी एक बड़ी चुनौती बना देती है।
गांवों का उजाड़ना
पलायन को आमतौर पर आर्थिक प्रगति और बेहतर अवसरों की तलाश के नजरिए से देखा जाता है। हालांकि, ‘पायर’ इसके उस काले पक्ष को उजागर करती है जिसे अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है।
पहाड़ों से पलायन केवल लोगों का एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना भर नहीं है; यह एक पूरी जीवन शैली को धीरे-धीरे नष्ट करने की प्रक्रिया है। जब कोई गांव उजड़ता है, तो केवल उसके घर वीरान नहीं होते। उनके साथ ही वहां की बोलियां, लोकगीत, परंपराएं, खेती-बाड़ी, सामूहिक श्रम और आपसी सहयोग की संस्कृति भी फीकी पड़ने लगती है।
पहाड़ी समाज पारंपरिक रूप से एकजुटता की मजबूत भावना से बंधे रहे हैं। चाहे शादी हो, फसल की कटाई हो या कोई परिवार संकट में हो, पूरा गांव एक-दूसरे के साथ खड़ा होता था। लेकिन पलायन ने इस सामूहिक भावना को कमजोर कर दिया है।
आज मकान तो खड़े हैं, लेकिन उनके भीतर जीवन की चहल-पहल गायब हो चुकी है। खेत अभी भी मौजूद हैं, लेकिन कभी उन्हें सींचने वाले हाथ चले गए हैं। रास्ते वही हैं, लेकिन उन पर पड़ने वाले कदमों की आहट कम होती जा रही है।
एक बेहद भावुक प्रसंग में, पदम सिंह गांव के बचे हुए परिवारों को न जाने के लिए मनाने के लिए अपनी बकरियां तक देने की पेशकश करते हैं। जब गांव वाले उन्हें आश्वासन देते हैं कि वे जल्द लौटेंगे, तो वे कहते हैं, "इन पहाड़ों में एक बार घर में ताला लग जाए, तो फिर कभी नहीं खुलता।"
यह संक्षिप्त लेकिन मार्मिक कथन पहाड़ों से हो रहे पलायन के पूरे दर्द को समेटे हुए है। पदम सिंह जानते हैं कि एक बार जब लोग अपना गांव छोड़ देते हैं, तो उनके लौटने की संभावना न के बराबर होती है। उनके लिए लोगों का जाना केवल कुछ परिवारों का जाना भर नहीं है; यह उस गांव का धीरे-धीरे गायब होना है जिसे वे जीवन भर जानते आए हैं।
यह फिल्म एक महत्वपूर्ण सवाल भी उठाती है: वे कौन सी परिस्थितियां हैं जो लोगों को अपनी जड़ों को काटने और अपने पैतृक घरों को छोड़ने के लिए मजबूर करती हैं? क्या इन गांवों में रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराकर इस बढ़ते पलायन को नहीं रोका जा सकता था? फिल्म सीधे तौर पर कोई उत्तर नहीं देती, लेकिन इसका कथानक हमें इन सवालों पर सोचने के लिए मजबूर जरूर करता है।
स्वाभाविक और जीवंत अभिनय
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसके मुख्य कलाकार पदम सिंह कापड़ी और हीरा देवी हैं। अभिनय का कोई पूर्व अनुभव न होने के बावजूद, दोनों ने इतनी सादगी और स्वाभाविकता के साथ अभिनय किया है कि दर्शक चकित रह जाता है।
पदम सिंह के चेहरे की झुर्रियों में झलकती बेबसी, अपनी जमीन से जुड़े रहने की जिद और बेटे के लिए उनका इंतजार दर्शक को गहराई से छू जाता है। हीरा देवी की उदास आंखें और संयमित अभिव्यक्तियां माहौल में एक अद्भुत प्रामाणिकता भर देती हैं।
दोनों के बीच होने वाली छोटी-छोटी बातें और नोक-झोंक रोजमर्रा की जिंदगी की सादगी के साथ-साथ एक गहरे भावनात्मक दर्द को भी उजागर करती हैं। ऐसा लगता है कि वे अभिनय नहीं कर रहे हैं, बल्कि कैमरे के सामने अपनी ही जिंदगी के पन्नों को दोबारा जी रहे हैं। सुभाष चंद्रा और शुभम चौधरी जैसे सह-कलाकारों ने भी फिल्म के परिवेश और कहानी की प्रामाणिकता को बनाए रखने में अपना योगदान दिया है।
निर्देशन, छायांकन और संगीत
निर्देशक विनोद कापड़ी की फिल्म ‘पायर’ व्यावसायिक सिनेमा की मजबूरियों से मुक्त एक यथार्थवादी कृति है। कहानी को अनावश्यक नाटकीय मोड़ों से उलझाने के बजाय, वे इसे पहाड़ों के जीवन की स्वाभाविक गति से आगे बढ़ने देते हैं, जहां अक्सर खामोशी शब्दों से ज्यादा जोर से बोलती है। वीरान घर, सूनी पगडंडियां और विशाल पहाड़ी परिदृश्यों के बीच अकेले रहते एक बुजुर्ग दंपती का दृश्य किसी विस्तृत व्याख्या के बिना ही पलायन की त्रासदी को बयां कर देता है।
छायाकार मानस भट्टाचार्य का काम विशेष रूप से सराहनीय है। पहाड़ों की नयनाभिराम सुंदरता को कैमरे में कैद करने के साथ-साथ वे इस विशाल प्राकृतिक परिदृश्य में फैले डरावने अकेलेपन को भी दर्शाने में सफल रहे हैं। पहाड़ यहाँ केवल एक पृष्ठभूमि नहीं हैं; वे कहानी में एक सशक्त, मौन पात्र के रूप में उभरते हैं।
पहाड़ों के प्राकृतिक सौंदर्य और वहां के लोगों द्वारा झेली जाने वाली कठिनाइयों के बीच एक चौंकाने वाला विरोधाभास है। जिन पहाड़ों की हम उनकी प्राकृतिक सुंदरता और पर्यटन आकर्षण के लिए प्रशंसा करते हैं, वे ऐसे गांवों का घर हैं जहां बुनियादी सुविधाओं का अभाव लोगों को अपने घर छोड़ने पर मजबूर कर रहा है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसित संगीतकार माइकल डैना का संगीत, स्थानीय लोक धुनों के साथ मिलकर, फिल्म के संवेदनशील और विचारशील मिजाज को और गहरा करता है।
विकास की कीमत
‘पायर’ खत्म होने के बाद भी दर्शक के मन में गहराई तक रची-बसी रहती है। फिल्म आधुनिक विकास की उस प्रचलित धारणा पर सवाल उठाती है, जिसमें शहरों का विस्तार तो लगातार हो रहा है, लेकिन उन्हें श्रम, संसाधन और युवा देने वाले गांवों की चिंताओं को दरकिनार कर दिया जाता है।
पहाड़ों से पलायन को केवल व्यक्तिगत पसंद या बेहतर अवसरों की तलाश के रूप में नहीं समझा जा सकता। यह सीमित रोजगार संभावनाओं, अपर्याप्त शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं, परिवहन की कठिनाइयों और विकास के असमान वितरण सहित कई कारणों से जुड़ा हुआ है।
फिल्म हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि जिन पहाड़ों ने पीढ़ियों से लोगों को अपनी पहचान और आजीविका दी है, क्या वहां उनके बुढ़ापे के लिए कोई प्रावधान नहीं है? क्या विकास का मतलब केवल सड़कों और इमारतों का निर्माण है, या इसमें उन बुजुर्गों की सुरक्षा, गरिमा और सामाजिक कल्याण भी शामिल होना चाहिए जो इन गांवों में रहना जारी रखे हुए हैं?
‘पायर’ बने-बनाए समाधान देने का दावा नहीं करती। इसके बजाय, यह दर्शकों को असहज और कड़वे सवालों की एक श्रृंखला के साथ छोड़ जाती है। इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि पलायन जैसे गंभीर सामाजिक मुद्दे को आंकड़ों और नारों के माध्यम से नहीं, बल्कि आम इंसानों द्वारा झेले जाने वाले अकेलेपन, असुरक्षा और भावनात्मक टूटन के माध्यम से प्रस्तुत करना है।
‘पायर’ केवल उत्तराखंड के एक वीरान गांव की कहानी नहीं है। यह अनगिनत पहाड़ी गांवों की कहानी है जहां बंद पड़े ताले एक गहरे होते सामाजिक संकट के मौन गवाह बनकर खड़े हैं। यह उन बुजुर्गों की पीड़ा को व्यक्त करती है जिनकी आंखें अपने प्रियजनों के लौटने का इंतजार करते-करते थक चुकी हैं।
यह उन गांवों का करुण क्रंदन है जो कभी रोजमर्रा की जिंदगी की आवाजों से गूंजते थे, लेकिन अब सन्नाटे की चादर ओढ़े पड़े हैं। मानवीय संवेदना की इस चिता से उठता धुआं, और पलायन द्वारा पीछे छोड़ा गया बंजर परिदृश्य एक चेतावनी के रूप में कार्य करता है: यदि गांवों से यह पलायन इसी गति से जारी रहा, तो एक दिन हमारी सांस्कृतिक विरासत की नींव ही खतरे में पड़ सकती है।
‘पायर’ एक ऐसी सिनेमाई अभिव्यक्ति है जो केवल देखे जाने योग्य नहीं, बल्कि गहराई से महसूस किए जाने के योग्य है। यह हमें याद दिलाती है कि किसी गांव की असली चिता तब नहीं जलती जब उसका कोई निवासी मरता है, बल्कि तब जलती है जब उसकी आखिरी उम्मीद और उसका आखिरी निवासी भी उसे छोड़कर चला जाता है।


