इलेस्ट्रेशन: रीतिका बोहरा
इलेस्ट्रेशन: रीतिका बोहरा

बदलते हिंदी समाज के बीच दस साल डाउन टू अर्थ पूरे

दस साल बाद हिंदी डाउन टू अर्थ हमें याद दिलाती है, ज़्यादा सूचनाएं नहीं, ज़्यादा समझ चाहिए
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पिछली सदी के जिस दौर में डाउन टू अर्थ से मेरा परिचय हुआ था, उसी समय एक विज्ञापन हमारे समय की नई भाषा गढ़ रहा था- ‘ये दिल मांगे मोर।’ एक शीतल पेय के लिए बनाई गई यह पंक्ति जल्दी ही विज्ञापन से निकलकर बदलते समय की बोलचाल का हिस्सा बन गई। शीतल पेय से प्यास बुझती नहीं थी, उसकी तलब और बढ़ती थी। बाजार के लिए इससे बेहतर रूपक शायद मुश्किल था।

यह वह दौर था, जब उदारीकरण के बाद का नया उपभोक्ता संसार तेजी से आकार ले रहा था। चीजों की उपलब्धता बढ़ रही थी और उनके साथ इच्छाओं का विस्तार भी। बाजार हमें लगातार बता रहा था कि जो है, वह पर्याप्त क्यों हो- थोड़ा और चाहिए, फिर उससे थोड़ा और।

उसी दौर में डाउन टू अर्थ जैसी पत्रिका का होना अपने आप में महत्वपूर्ण बात थी। वह बाजार के इस ‘मोर’ के सामने किसी नारे के साथ नहीं, बल्कि सवालों के साथ खड़ी थी- इस विकास की कीमत कौन चुका रहा है? जंगल क्यों घट रहे हैं? नदियां क्यों बदल रही हैं? खेती पर इसका क्या असर पड़ रहा है? विज्ञान और तकनीक हमारे समाज और जीवन को किस दिशा में ले जा रहे हैं?

इन सवालों के जवाब तुरंत नहीं मिलते थे। उन्हें समझने के लिए पढ़ना पड़ता था, ठहरना पड़ता था और कई बार अपनी बनी-बनाई धारणाओं पर दोबारा विचार करना पड़ता था।

शायद इसी वजह से हिंदी पट्टी के एक पाठक के तौर पर उन दिनों मन में बार-बार यह इच्छा होती थी कि डाउन टू अर्थ में जो कुछ लिखा जा रहा है, उसका लाभ हिंदी का पाठक भी उठा सके। धीरे-धीरे समझ में आया कि यह सिर्फ एक भाषा से दूसरी भाषा में सामग्री पहुंचाने का सवाल नहीं है। यह हिंदी समाज में उस तरह की गंभीर सार्वजनिक बातचीत के लिए जगह बनाने का सवाल है, जिसमें विज्ञान, पर्यावरण और विकास को केवल खबर की तरह नहीं, बल्कि अपने जीवन और भविष्य के सवालों की तरह देखा जाए।

आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि वह चिंता जितनी सही थी, उतनी ही अधूरी भी। दुनिया तब भी बदल रही थी, लेकिन जिस रफ्तार से आज बदल रही है, उसका अनुमान शायद तब नहीं था।

इसी बदलती दुनिया में हिंदी में डाउन टू अर्थ की शुरुआत हुई और अब उसके दस साल पूरे हो गए हैं।

विडंबना यह है कि जिस समय विज्ञान, पर्यावरण और जलवायु जैसे विषय हमारी जिंदगी में पहले से कहीं अधिक निर्णायक हो गए हैं, उसी समय गंभीर पत्रकारिता के लिए सामाजिक जगह सिकुड़ती जा रही है। इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि हिंदी डाउन टू अर्थ ने दस साल पूरे कर लिए। असली सवाल यह है कि उसने ये दस साल किस तरह के बदलते हिंदी समाज के बीच पूरे किए हैं।

ज्ञान का बड़ा हिस्सा जिस भाषा में उपलब्ध होता है, धीरे-धीरे वही ज्ञान की प्रतिष्ठित भाषा बन जाती है। हिंदी समाज में विज्ञान, पर्यावरण, विकास और सामाजिक विज्ञान की गंभीर सामग्री की कमी का मतलब सिर्फ यह नहीं है कि पाठक कुछ अच्छी किताबों या लेखों से वंचित रह जाता है। इसका मतलब यह भी है कि वह अपने समय की बड़ी प्रक्रियाओं को समझने के लिए लगातार दूसरी भाषाओं पर निर्भर रहता है। ज्ञान का यह असमान वितरण लोकतांत्रिक समाज के लिए मामूली समस्या नहीं है। अपनी भाषा में किसी जटिल सवाल को समझ पाना सिर्फ सुविधा नहीं, बौद्धिक स्वायत्तता भी है।

इसी बीच दुनिया ने सूचना के मामले में अभूतपूर्व छलांग लगाई। इंटरनेट और स्मार्टफोन ने सूचना को हमारी हथेली तक पहुंचा दिया है। लेकिन हमारे समय की एक बड़ी विडंबना यह है कि सूचना और ज्ञान शायद पहले कभी इतने सुलभ नहीं थे और समझ के लिए धैर्य शायद पहले कभी इतना दुर्लभ नहीं था। आज किसी विषय पर हजारों सूचनाएं कुछ सेकेंड में हमारे सामने आ सकती हैं। लेकिन यह पहचानना मुश्किल होता जा रहा है कि इनमें तथ्य क्या है, भ्रम क्या है, प्रचार क्या है और वैज्ञानिक प्रमाण क्या कहते हैं।

हम ऐसे समय में हैं, जब एक मिनट की रील भी कई बार फास्ट-फॉरवर्ड करके देखी जाती है। गंभीर विषयों के लिए पाठक का समय और धैर्य दोनों कम हुए हैं। लेकिन इसे सिर्फ पाठकों की कमजोरी मान लेना आसान और गलत होगा। डिजिटल माध्यमों की पूरी अर्थव्यवस्था ही हमारे ध्यान को ज्यादा से ज्यादा देर तक अपने पास बनाए रखने के लिए बनी है।

छोटे, तीखे और तुरंत समझ में आने वाले कंटेंट को बढ़ावा मिलता है; जटिलता, संदर्भ और अनिश्चितता के लिए जगह बनाना कठिन है। ऐसे समय में हिंदी में डाउन टू अर्थ के दस साल पूरे होना इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह केवल किसी पत्रिका के एक दशक का पड़ाव नहीं है। यह इस संभावना का प्रमाण भी है कि तेज होते मीडिया संसार के बीच हिंदी में गंभीर पत्रकारिता के लिए पाठक मौजूद हैं।

हिंदी समाज को लेकर हमारी चिंता अक्सर उसके पाठक और उसकी भाषा को लेकर रही है। पढ़ने की आदत कमजोर हुई है, गंभीर सार्वजनिक बहस के लिए जगह सिकुड़ी है और सूचना के नाम पर बहुत कुछ ऐसा हमारे सामने है जो ज्ञान के बजाय भ्रम पैदा करता है।

लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। हजारों-लाखों लोग अब भी जानना चाहते हैं कि उनके खेत में बदलाव क्यों आ रहा है, उनके शहर की हवा क्यों खराब है, गर्मी हर साल अधिक क्यों महसूस होती है, पानी का संकट क्यों बढ़ रहा है, किसी बीमारी से बचाव का वैज्ञानिक तरीका क्या है या कोई नई तकनीक उनके जीवन को किस तरह बदलने वाली है। सवाल यह है कि क्या हम उन्हें उनकी भाषा में भरोसेमंद ज्ञान दे पा रहे हैं? यहीं हिंदी में डाउन टू अर्थ की उपयोगिता सबसे ज्यादा दिखाई देती है।

विज्ञान और पर्यावरण पत्रकारिता का काम केवल वैज्ञानिक तथ्यों को सरल भाषा में लिख देना नहीं है। उसका बड़ा काम विज्ञान और समाज के बीच संवाद कायम करना भी है। यह बताना कि किसी वैज्ञानिक खोज का अर्थ क्या है, उसकी सीमाएं क्या हैं, उससे किसका जीवन बदलेगा और उससे जुड़े जोखिम क्या हैं।

इसी तरह पर्यावरण पत्रकारिता सिर्फ पेड़ों, नदियों और जंगलों की कहानी नहीं है। वह समाज, अर्थव्यवस्था, राजनीति और प्रकृति के बीच बदलते रिश्तों की पड़ताल है। हिंदी डाउन टू अर्थ की जरूरत इसलिए है कि वह इन जटिल सवालों को हिंदी के पाठक के सामने उसकी अपनी भाषा में रखती है- सिर्फ सूचना के रूप में नहीं, समझ के लिए।

लेकिन इन दस वर्षों को केवल उपलब्धि की तरह देखना भी इस कहानी का अधूरा हिस्सा होगा। पत्रिकाओं के अर्थशास्त्र से परे का सच यह है कि हिंदी समाज में गंभीर पत्रिकाओं के लिए जगह कम होती जा रही है।

यह कहना आसान है कि पाठक कम हो गए हैं। लेकिन बात शायद इससे अधिक जटिल है। पाठक कहीं गया नहीं है; उसके पढ़ने का समय, उसका ध्यान और उसकी प्राथमिकताएं बदली हैं। गंभीर सामग्री के सामने अब केवल दूसरी पत्रिकाएं या अखबार ही प्रतिस्पर्धी नहीं हैं। सामने सोशल मीडिया की अंतहीन धारा है, छोटे वीडियो हैं, लगातार आती सूचनाएं हैं और वह पूरी डिजिटल अर्थव्यवस्था है जो हमारे ध्यान को कुछ सेकेंड से ज्यादा कहीं टिकने नहीं देना चाहती।

इसका असर सिर्फ पढ़ने की आदत पर नहीं पड़ा है। इसका असर सार्वजनिक जीवन में गंभीर विचार के लिए उपलब्ध जगह पर भी पड़ा है। एक गंभीर पत्रिका पाठक से कुछ मांगती है- समय, धैर्य और थोड़ी बौद्धिक विनम्रता। वह यह मानकर चलती है कि हर सवाल का जवाब 30 सेकेंड में नहीं दिया जा सकता। किसी समस्या को समझने के लिए उसके इतिहास में जाना पड़ सकता है, आंकड़े देखने पड़ सकते हैं, अलग-अलग पक्ष सुनने पड़ सकते हैं और कभी-कभी यह स्वीकार करना पड़ सकता है कि निष्कर्ष उतना सरल नहीं है, जितना पहली

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