डाउन टू अर्थ, हिंदी के 10 साल: पर्यावरणीय सरोकार का एक दशक

पिछले एक दशक में डाउन टू अर्थ हिंदी के यह चुनिंदा 10 अंक दरअसल उन बदलावों और संकटों की कहानी हैं, जिन्होंने भारत के वर्तमान को गढ़ा। डाउन टू अर्थ ने इस दशक में आंकड़ों और जमीनी रिपोर्टिंग के जरिए उन सवालों को गहराई से समझने की कोशिश की है। हवा में बढ़ता प्रदूषण हो या कृषि और मॉनसून की अनिश्चितता। इन अंकों में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी जैसी उम्मीदें हैं, तो स्वराज की अवधारणा पर उठते बुनियादी सवाल भी शामिल हैं। कोरोना महामारी ने स्वास्थ्य और सामाजिक व्यवस्था की कमजोरियां उजागर कीं, जबकि भोपाल गैस त्रासदी की विरासत ने याद दिलाया कि विकास की कीमत पीढ़ियों तक चुकानी पड़ सकती है। वहीं, इंसानी व्यवहार के काम, क्रोध, लोभ जैसे विकारों को विज्ञान की कसौटी पर देखने की कोशिश भी इसी पड़ताल का हिस्सा है। ये दस अंक बीते दशक का लेखा-जोखा भर नहीं, बल्कि आने वाले कल के लिए चेतावनी, सवाल और उम्मीद हैं
पर्यावरणीय सरोकार का एक दशक
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पर्यावरणीय सरोकार का एक दशक
दिसंबर 2016

वायु प्रदूषण में घुटती उत्तर भारत की सांसें: अब दिल्ली दूर नहीं

क्या दिल्ली से सबक लेंगे, दिल्ली की तरह प्रदूषित छोटे शहर?

अब वायु प्रदूषण की कई नई राजधानी बनती जा रही हैं। राजधानी दिल्ली में जहां वायु प्रदूषण की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है, वहीं उत्तर वमध्य भारत के कई शहर इस मामले में दिल्ली को भी पीछे छोड़ रहे हैं। एक तरफ दिल्ली 2016 में सबसे भयंकर स्मॉाग झेल रही थी, वहीं लखनऊ, कानपुर जैसे शहर वायु प्रदूषण के पैमानों पर दिल्ली हुएजा रहे हैं। लुधियाना, आगरा, इलाहाबाद, बनारस,पटना जैसे शहरों की हवा भी दिल्ली की तरह ही प्रदूषित...

जलवायु परिवर्तन का नया पड़ावRead full cover story
सितंबर 2017

जलवायु परिवर्तन का नया पड़ाव

पश्चिम राजस्थान के पर्यावरण में पिछले 15 सालों में तेजी से बदलाव देखा गया है

राजस्थान का मरुस्थली इलाका असामान्य बारिश से जूझ रहा है। बाढ़ न केवल नियमित होती जा रही है बल्कि विनाशकारी रूप भी धर रही है। कहीं राजस्थान जलवायु परिवर्तन की कीमत तो नहीं चुका रहा? ध्यान रहे कि राजस्थान के पश्चिमी भाग में जलवायु परिवर्तन का असर गत डेढ़ दशक से दिख रहा है, इसी का नतीजा है कि यहां बारिश के स्वरूप में लगातार बदलाव आ रहा है। एक दिन में बारिश का औसत पश्चिमी राजस्थान में बढ़ा है। पिछले 15 सालों से...

स्वराज की सीखRead full cover story
अप्रैल 2018

स्वराज की सीख

झारखंड सरकार जिस पत्थरगड़ी को साजिश बता रही है, उसकी हकीकत क्या है

झारखंड में इन दिनों आदिवादियों और प्रशासन के बीच शीत युद्ध जैसा माहौल है। एक तरफ गांव स्वशासन की घोषणा करते जा रहे हैं, दूसरी तरफ सरकार इसे गैरकानूनी और सख्ती से कुचलने की बात कह रही है। इस तनावपूर्ण माहौल में किसी भी दिन सरकार और आदिवादियों के बीच संघर्ष छिड़ सकता है। पत्थरगड़ी आदिवासियों की एक सामाजिक परंपरा है और सदियों से चली आ रही है। ध्यान रहे कि इस क्षेत्र में पांचवी अनुसूची लागू है और अगर सरकार इसे नहीं मान रही...

स्त्रीRead full cover story
जनवरी 2019

स्त्री

भारी मतदान के बावजूद महिलाएं राजनीति के शिखर पर क्यों नहीं?

भारतीय राजनीति में मतदाता के रूप में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के बावजूद 29 राज्यों वाले देश में आज सिर्फ एक महिला मुख्यमंत्री है। विधानसभा और संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी बेहद धीमी गति से बढ़ रही है। 2018 के आखिर में संपन्न हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों को 2019 के लोकसभा चुनावों का सेमीफाइनल कहा जा रहा था। इन चुनावों में जो एक चीज अहम रही वो है इन चुनावों का जेंडर असेसमेंट। भारतीय लोकतंत्र में स्त्री शक्ति ने...

अभूतपूर्व संकटRead full cover story
मई 2020

अभूतपूर्व संकट

कोरोनावायरस ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को गंभीर क्षति पहुंचाई है जिससे उबरना आसान नहीं होगा

हर देश ने यह साबित कर दिया है कि संकट की इस घड़ी में कोई किसी का अपना नहीं है। कोविड-19 हमारे जीवनकाल की सबसे घातक एवं विनाशकारी घटना है और यह हमारे समाज की परिभाषा बदलकर रख देने की क्षमता रखता है। हमारी जानकारी में ऐसी कोई दूसरी महामारी नहीं है जो इतनी तेजी से फैली हो। दिसंबर 2019 के अंत में चीन में कोविड-19 का पहला केस पाया गया और अप्रैल 2020 में हालात ऐसे हैं कि दुनिया की आबादी...

चूक गए तो चुक गएRead full cover story
फरवरी 2021

चूक गए तो चुक गए

क्या भारत अब कृषि प्रधान देश नहीं रहा? दुनियाभर में कृषि को कितना सहयोग मिलता है और भारत कहां खड़ा है?

जब आंकड़े बताते हैं कि भारत दुनिया में सबसे तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था है तो हम सब जश्न बनाते हैं, लेकिन इस विकास का हमें कोई फायदा नहीं मिला है। देश में हर दूसरा किसान कर्जदार है। एक भारतीय किसान हर महीने औसतन 6,426 रुपए कमाता है जबकि उसका खर्च 6,223 रुपए है। इसके अलावा केवल 15 प्रतिशत किसान कुल कृषि आय...

माॅनसून विशेषांक: अबूझ चौमासाRead full cover story
अगस्त 2022

माॅनसून विशेषांक: अबूझ चौमासा

अर्थव्यवस्था को चंद दिनों में बनाने और बिगाड़ने वाले माॅनसून के भूत से भविष्य तक का सफर

करीब आठ करोड़ साल पहले माॅनसून अस्तित्व में आया था। लेकिन यह आज भी रहस्यमयी बना हुआ है। चुटकी में करोड़ों संख्यात्मक गणनाओं को हल करने वाला सुपर कंप्यूटर भी माॅनसून के व्यवहार को नहीं पकड़ पा रहा है।जलवायु परिवर्तन ने इसे और अप्रत्याशित बना दिया है। ऐसा क्या है जिससे हर बार माॅनसून...

अबला से सबलाRead full cover story
मार्च 2023

अबला से सबला

भारत में महिलाओं के स्वयं सहायता समूह कामयाबी का परचम लहरा रहे हैं

राजनीतिक और आर्थिक ताकत बन चुके स्वयं सहायता समूह कामयाबी की नई इबारत लिख रहे हैं। ग्रामीण अंचल में स्वयं सहायता समूह की महिलाओं ने न सिर्फ घर-समाज की बांधी हुई दहलीज को लांघा है बल्कि अब वह अधिकारों की वकालत करते हुए अपने सामर्थ्य से शासन में अपना हक-हकूक मांगने लगी हैं। करीब 11 राज्यों के ऐसे स्वयं सहायता समूहों की पड़ताल की गई, जो आजीविका से ऊपर उठकर सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों की वकालत...

40 साल, भोपाल गैस त्रासदीRead full cover story
दिसंबर 2024

40 साल, भोपाल गैस त्रासदी

दुनिया की सबसे वीभत्स औद्योगिक आपदा का आंखों देखा हाल

करीब 144 करोड़ की आबादी वाालेे भाारत की लगभग 65 प्रतिशत आबादी उस वक्त पैैदा भी नहींं हुई थी जब 1984 में दुुनियाा की सबसेे मारक औद्योगिक त्रासदी याानी भोपााल गैैस कांड हुआ। यह त्रासदी जाापाान केे हिरोशिमाा और नागासाकी परमााणुु बम गिरााए जाानेे केे बााद मृृत्युु का तीसरा सबसेे वीभत्स व घृृणित रूप थी। यूनियन कार्बाइड फैैक्ट्री सेे लीक हुई मिथााइल आइसोसााइनेेट यानी एमआईसी नेे 5,000 सेे ज्यादा लोगों की जिंदगी छीन ली...

सप्तविकारRead full cover story
जनवरी 2025

सप्तविकार

अच्छाई और बुराई यानी काम, क्रोध, लोभ, मद, ईर्ष्या, लोलुपता और आलस का तर्क विज्ञान

भाव क्या हैं? मस्तिष्क उन्हेंं कैैसेे नियंंत्रित करता हैै? क्या इन भावों नेे माानव विकास में कोई भूूमिका निभाई हैै या येे माानव विकास केे बाद की उत्पत्ति हैं? सात माानवीय विकारोंं केे विज्ञाान पर दुुनिया भर केे विशेेषज्ञों ने अपनी -अपनी राय रखी है। जैसे कनाडा स्थित ब्रिटिश कोलंबिया विश्व विद्याालय में मनोविज्ञान की प्रोफेेसर ट्रेेसी नैतिक सोच और भावनाओं का अध्ययन करती हैंं। उनकी पुुस्तक “टेेक प्रााइड” इस बाात की पड़तााल करती हैै कि अहंकार...

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