ओडिशा की आधी से अधिक पीवीटीजी आबादी के पास नहीं पहुंचा सरकारी योजनाओं का लाभ: सीएजी

मार्च 2024 तक 1.60 लाख यानी 54 प्रतिशत आबादी कई वर्षों तक पीवीटीजी-विशिष्ट कार्यक्रमों का लाभ उठाने से वंचित रही
फोटो : कुमार संभव श्रीवास्तव/सीएसई
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सारांश

  • ऑडिट रिपोर्ट में पाया गया है कि राज्य की 1,679 गांवों एवं बस्तियों में कुल पीवीटीजी आबादी 2.94 लाख थी

  • ओडिशा पीवीटीजी एंपावरमेंट एंड लाइलीहुड इंप्रूवमेंट प्रोग्राम (ओपीईएलआईपी) को केवल 1.34 लाख लोगों के लिए लागू किया

  • जून 2020 में पीवीजीटी की छूटी हुई आबादी को कवर करने के लिए तीन नए एमपीए बनाए गए थे, लेकिन जनवरी 2025 तक उन्हें चालू नहीं किया जा सका

  • देर से विवाह प्रोत्साहन कार्यक्रम के अंतर्गत केवल 43 प्रतिशत गांवों को ही शामिल किया जा सका

ओडिशा में जनजातीय आबादी के सबसे पिछड़े समूह पीवीजीटी (विशेष रूप से सबसे कमजोर जनजातीय) समुदायों के लिए चलाई रही योजनाओं का लाभ आधी से अधिक आबादी को नहीं मिला है। जुलाई 2024 से जनवरी 2025 के बीच किए गए ऑडिट में सीएजी ने पाया है कि ओडिशा में पीवीटीजी की 54 प्रतिशत आबादी योजनाओं के लाभों से वंचित है।  

ऑडिट रिपोर्ट में पाया गया है कि राज्य की 1,679 गांवों एवं बस्तियों में कुल पीवीटीजी आबादी 2.94 लाख थी। ओडिशा पीवीटीजी एंपावरमेंट एंड लाइलीहुड इंप्रूवमेंट प्रोग्राम (ओपीईएलआईपी) को केवल 1.34 लाख लोगों के लिए लागू किया गया था और नए पहचाने गए 1,138 गांवों में रहने वाले शेष 1.60 लाख लोगों के लिए विकास कार्यक्रम लागू नहीं किए गए थे। इस प्रकार, मार्च 2024 तक 1.60 लाख (54 प्रतिशत) आबादी कई वर्षों तक पीवीटीजी-विशिष्ट कार्यक्रमों का लाभ उठाने से वंचित रही।

सीएजी ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, 5वीं पंचवर्षीय योजना (1974-79) के दौरान, भारत सरकार ने पीवीटीजी के सर्वांगीण विकास पर विशेष जोर देने का फैसला किया और देश में ऐसे 75 समूहों की पहचान की ताकि उनके विकास पर विशेष ध्यान दिया जा सके। देश में पहचाने गए 75 पीवीटीजी समूहों में से 13 ओडिशा के हैं। इनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने के लिए ओडिशा सरकार ने 1976-77 से 2020-21 के दौरान राज्य के 14 जिलों में 20 माइक्रो प्रोजेक्ट एजेंसी ​​(एमपीए) स्थापित कीं। पीवीटीजी के लिए योजनाओं व कार्यक्रमों को लागू करने के लिए ओडिशा सरकार ने 2016-17 में ओपीईएलआईपी शुरू किया। पीवीटीजी के लिए केंद्र और राज्य सरकारों के सभी विकास कार्यक्रमों को ओडिशा में ओपीईएलआईपी के तहत लागू किया जाता है। इस कार्यक्रम के लागू होने की अवधि आठ साल (2016-2024) थी।  

कार्यक्रम के ऑडिट के दौरान सीएजी ने पाया कि एसटी एंड एससी डेवलपमेंट, माइनोरिटी एंड बैकवार्ड क्लासेस वेलफेयर डिपार्टमेंट (एसएसडी विभाग) और उसकी क्षेत्रीय इकाइयों का जून 2020 में नए अधिसूचित 1,138 गांवों में विकास कार्यक्रमों को लागू करने के प्रति उदासीन रवैया रहा जिसके कारण 1.60 लाख पीवीटीजी आबादी कल्याण कार्यक्रमों व योजनाओं के दायरे से बाहर रह गई।

नहीं चालू हुए एमपीए (माइक्रो प्रोजेक्ट एजेंसी)

जून 2020 में पीवीजीटी की छूटी हुई आबादी को कवर करने के लिए तीन नए एमपीए बनाए गए थे, लेकिन जनवरी 2025 तक उन्हें चालू नहीं किया जा सका। इन एमपीए के लिए न तो मैनपावर का इंतजाम किया गया था और न ही कोई फंड आवंटित किया गया था। इन एमपीए के चालू न होने से न केवल पूरी पीवीटीजी आबादी को कवर करने पर असर पड़ा, बल्कि इन कमजोर तबकों को उनके सामाजिक-आर्थिक उत्थान के लिए शुरू की गई योजनाओं के तय फायदों से भी वंचित रहना पड़ा।

रिपोर्ट के अनुसार, बिरहोर समुदाय को 1986-87 में पीवीजीटी के तौर पर पहचाना गया था, लेकिन शुरुआती कल्याण कार्यक्रमों में से किसी के तहत भी उन्हें शामिल नहीं किया गया था। उन्हें 2020-21 के दौरान एक नए बनाए गए एमपीए (बिरहोर और जुआंग विकास एजेंसी, सुकिंदा) के तहत शामिल किया गया था। चूंकि यह एमपीए चालू नहीं किया गया था, इसलिए 87 घरों में रहने वाले 341 लोगों की आबादी वाला यह समुदाय आज तक (जनवरी 2025 तक) पीवीजीटी के फायदों से वंचित ही रहा।

ऑडिट में यह भी पाया गया कि एसएसडी विभाग द्वारा प्रोग्राम मैनेजमेंट यूनिट (पीएमयू) को आवंटित 20.20 करोड़ रुपए की राशि बिना इस्तेमाल के पड़ी थी। पीएमयू ने न तो इसके इस्तेमाल के लिए कोई योजना बनाई थी और न ही विभाग ने इसके बारे में कोई पूछताछ की, जबकि इसे जारी हुए तीन साल से ज्यादा का समय बीत चुका था। इसके अलावा, एमपीए द्वारा लापरवाही के मामले भी सामने आए, जहां इन फील्ड इकाइयों के पास पीवीटीजी के उत्थान के लिए चलाए जा रहे कल्याणकारी कार्यक्रमों के तहत सभी पीवीटीजी को शामिल करने के लिए जरूरी बुनियादी डेटा भी मौजूद नहीं था।

मौजूदा एमपीए यानी एलडीए मोराडा के पास अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले नए पहचाने गए गांवों (18) में बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता के बारे में कोई डेटा नहीं था, जबकि इन गांवों की पहचान (2018-19) और राज्य सरकार द्वारा जून 2020 में इनकी अधिसूचना जारी हुए पांच साल बीत चुके थे। इसी तरह, तीन नए बनाए गए एमपीए में से दो (जेडीए ढेंकनाल और पीबीडीए बंसपाल) सुविधाओं की उपलब्धता के बारे में कोई डेटा उपलब्ध नहीं करा पाए, जबकि इन एमपीए में 12,576 पीवीटीजी परिवार निवास कर रहे थे।

बाल विवाह रोकने का कार्यक्रम सही भावना के अनुरूप नहीं  

पीएमयू ने दिसंबर 2020 में ओपीईएलआईपी के तहत पीवीटीजी परिवारों के लिए देर से शादी करने पर प्रोत्साहन कार्यक्रम शुरू किया था ताकि कम उम्र में शादी रोकने के बारे में जागरुकता फैलाई जा सके। इस कार्यक्रम के तहत 18 साल की उम्र के बाद शादी करने वाली हर लड़की को 2,000 से लेकर 20,000 रुपए तक की आर्थिक मदद दी जानी थी। यह मदद अकाउंट पेई चेक के रूप में गांव वालों की मौजूदगी में एक सामुदायिक बैठक में दी जानी थी, ताकि दूसरी लड़कियों और उनके परिवारों को भी ऐसा ही करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके।

इस कार्यक्रम के लिए 2019-24 के दौरान 17 एमपीए के वार्षिक कार्ययोजना एवं बजट (एडब्लयूपीबी) में 153.26 लाख रुपए का प्रावधान किया गया था, ताकि 1,161 पीवीटीजी लड़कियों को कवर किया जा सके। इसके मुकाबले, एमपीए ने सिर्फ 95.24 लाख रुपए का खर्च किया, जो 677 (58 प्रतिशत) लाभार्थियों को देर से शादी करने पर प्रोत्साहन राशि देने के लिए था। सीएजी ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, बाल विवाह को रोकने के लिए प्रोत्साहन राशि देकर देर से शादी को बढ़ावा देने का यह कमजोर प्रदर्शन दिखाता है कि निगरानी की कमी थी और लाभार्थियों की पहचान ठीक से नहीं की गई थी। सीएजी रिपोर्ट के अनुसार, देर से विवाह प्रोत्साहन कार्यक्रम अपनी सही भावना के अनुरूप लागू नहीं किया गया और वर्ष 2019-24 के दौरान इस कार्यक्रम के अंतर्गत केवल 43 प्रतिशत गांवों को ही शामिल किया जा सका।

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