“नि:संतान का फैसला क्यों”
दो साल पहले हमने एक दंपती के रूप में यह तय किया कि हम संतान को जन्म नहीं देंगे। इस फैसले को लेकर न सिर्फ हमारे परिवारों, बल्कि पड़ोसियों, सहकर्मियों और दोस्तों ने भी कड़ा विरोध और हमसे कई सवाल किए गए। यह लेख, एक तरह से उसी गलतफहमी को दूर करने की हमारी कोशिश है।
सबसे पहले यह साफ करना जरूरी है कि यह फैसला न तो हल्के में लिया गया है और न ही किसी भावुक या अचानक प्रतिक्रिया का नतीजा है। यह बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी से बचने की कोशिश भी नहीं है। सच तो यह है कि हमारा यह रुख पर्यावरण के प्रति गहरी चिंता से उपजा है, जो हर गुजरते साल के साथ और गहराता जा रहा है। यह उस बढ़ते पारिस्थितिक संकट के प्रति हमारी सोच-समझकर दी गई प्रतिक्रिया है, जिसे हम अपने चारों ओर महसूस कर रहे हैं।
हर साल जैसे ही सर्दियां आती हैं, आसमान धुंध से भर जाता है और सांस लेना मुश्किल होने लगता है। यह लेख लिखते समय ही दिल्ली के कई इलाकों में वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 600 के पार पहुंच चुका है और कुछ जगहों पर 999 दर्ज किया गया है, जो मॉनिटर की अधिकतम सीमा है। फिर गर्मियां आती हैं और हम शिकायत करते हैं कि इस बार गर्मी पहले से कहीं ज्यादा है।
जो पहाड़ कभी हमारी गर्मियों की शरणस्थली हुआ करते थे, वहां अब हर साल विनाशकारी बाढ़ देखने को मिलती है। बहुत कम लोग यह समझते हैं कि मौसम के ये चरम रूप लगभग अपरिवर्तनीय जलवायु परिवर्तन के ठोस सबूत हैं। इसके साथ ही जिन दृश्यों को देखकर हमें चौंक जाना चाहिए, जैसे कचरे के खतरनाक पहाड़, जो छोटे ज्वालामुखी की तरह सुलगते रहते हैं, वे अब सामान्य व लगभग रोजमर्रा की चीज बन चुके हैं।
हमारे इस फैसले के पीछे तीन दृष्टिकोण हैं। पहला यह कि निजी स्तर पर महसूस होने वाले पर्यावरणीय संकट अचानक पैदा नहीं होते, बल्कि वर्षों के योजनाबद्ध और लगातार पर्यावरणीय शोषण का नतीजा होते हैं। इसमें हमारी भी उतनी ही भागीदारी है, जितनी किसी और की। निःसंतान रहने का हमारा निर्णय उस अपराधबोध को कम करने की कोशिश है, जो हमने अपनी जीवनशैली की वजह से पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया है।
दूसरी बात यह है कि ऐसी दुनिया में, जो असहनीय गर्मी, सूखे, बार-बार आने वाली आकस्मिक बाढ़ व अन्य चरम मौसम की घटनाओं की ओर बढ़ रही है, किसी मासूम जीवन को जन्म देना हमें अनुचित लगता है। इस असंतुलित होती दुनिया में हमारी प्राथमिकता उन लोगों और जीवों की देखभाल और सुरक्षा करना है, जो पहले से यहां मौजूद हैं, बजाय इसके कि किसी बच्चे को ऐसे भविष्य का सामना करना पड़े जो अनिश्चित और कठिन हो सकता है।
तीसरी और सबसे अहम बात यह है कि हम मानते हैं कि जनसंख्या वृद्धि का सीधा संबंध पर्यावरण पर बढ़ते दबाव से है। हर नया इंसानी जीवन अपने साथ बड़ा कार्बन फुटप्रिंट लाता है। हर नया इंसानी जीवन बड़ा कार्बन फुटप्रिंट बढ़ाता है। सीमित संसाधनों का ज्यादा इस्तेमाल करता है। कचरा पैदा करता है और ऐसी मांगें करता है, जिन्हें अब धरती पूरा नहीं कर पा रही है। हम यह नहीं कहना चाहते कि हमारा यह फैसला पर्यावरण पर कोई बड़ा या स्थायी असर डालेगा। वैसे भी, सतत और निरंतर बदलाव की जिम्मेदारी केवल व्यक्तियों पर नहीं डाली जा सकती। फिर भी हमारा मानना है कि व्यक्तिगत फैसले, चाहे वे कितने ही छोटे या महत्वहीन क्यों न लगें, उनका एक प्रतीकात्मक महत्व होता है।
हमारा यह निर्णय हमें अपनी वजह से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान को कुछ हद तक कम करने की एक ठोस कोशिश जैसा लगता है। पर्यावरण के शोषण का सबसे ज्यादा बोझ कमजोर समुदायों पर पड़ता है, खासकर बच्चों पर और उन बेजुबान प्रजातियों पर, जिनका बस इतना ही दोष है कि वे इंसानों के साथ इस दुनिया में रहती हैं। इसीलिए, अपनी वंश परंपरा बढ़ाने के बजाय हम गोद लेने, देखभाल करने और जागरुकता फैलाने में अपने संसाधन और ऊर्जा लगाना चाहते हैं, इस उम्मीद के साथ कि शायद हम इस टूटती हुई दुनिया को थोड़ा संभालने में मदद कर सकें। ऐसे में, हमने नि:संतान रहने का फैसला किया, ताकि किसी मासूम इंसान को पूरी जिंदगी चरम मौसम से जूझने, सांस लेने के लिए नेब्युलाइजर पर निर्भर रहने या साफ पानी के लिए चिंता करने को मजबूर न होना पड़े।
सारदा बिस्वास नोएडा में कंटेंट इंजीनियर और लेक्सिकोग्राफर हैं, जबकि शुभम कुमार श्रीवास्तव एमिटी यूनिवर्सिटी, नोएडा में - प्राध्यापक हैं


