संकेत बादलों के समझे कौन?
इलस्ट्रेशन: योगेंद्र आनंद / सीएसई

संकेत बादलों के समझे कौन?

बारिश के प्रति बुजुर्गों की लोकसमझ न कोई अंधविश्वास है, न महज अनुमान। यह भारत की उस पारम्परिक पर्यावरणीय बुद्धिमत्ता का एक छोटा अंश है जिसे भारतीय ज्ञान परंपरा कहते हैं
Published on

बसंत के बाद संपूर्ण उत्तर भारत गर्मी की चपेट में आने लगता है और बढ़ती गर्मी के साथ आमजन आकाश को निहारते हुए बारिश का इंतजार करते हैं। मई-जून की तपती गर्मी में आज भी बिहार-उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में बुजुर्ग अक्सर पेड़-पौधों, पक्षियों, आकाश की स्थिति, हवा की गति और दिशा के आधार पर बारिश का पूर्वानुमान करते दिख जाएंगे। उन्हें अक्सर यह कहते सुना जा सकता है, “इस बार बारिश थोड़ी देर से आएगी, क्योंकि अमलतास पर फूल पूरी तरह खिले नहीं हैं और चातक की आवाज भी अभी कमजोर है।” इस तरह भारत के हजारों बुजुर्गों की लोकसमझ न कोई अंधविश्वास है, न महज अनुमान। यह भारत की उस पारम्परिक पर्यावरणीय बुद्धिमत्ता का एक छोटा-सा अंश है जिसे हम भारतीय ज्ञान परंपरा कहते हैं।

भारत एक कृषि-प्रधान देश है और यहां का किसान सदियों से आसमान, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों और तारों की चाल पढ़कर मौसम का अनुमान लगाता रहा है। यह ज्ञान संस्कृत ग्रन्थों में सूत्रों के रूप में, लोकोक्तियों में और पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक परम्परा में जीवित रहा, जिसमें उत्तर भारत में घाघ-भड्डरी की लोकोक्तियां प्रमुख हैं। लेकिन आज, जब एक क्लिक में सात दिन का मौसम-पूर्वानुमान उपलब्ध है, यह ज्ञान-परम्परा तेजी से लुप्त हो रही है।

यह परम्परा केवल लोकविश्वास नहीं बल्कि इसके पीछे हजारों साल का प्रेक्षण और अनुभव है, जिसे हम लोक-मौसम विज्ञान कह सकते हैं। भारतीय बौद्धिक और लोक परम्परा दोनों में वर्षा को “पूर्वचित्ती” मतलब बरसात के मौसम का अनुमान उसके ठीक पहले के मौसम में होने वाली परिवर्तन के आधार पर किया जा सकता है। छठी शताब्दी में वराहमिहिर ने “बृहत्संहिता” में मॉनसून पूर्वानुमान पर पूरा एक अध्याय “मेघाध्याय” लिखा है। इसमें बादलों के रंग, दिशा, गर्जन और वर्षा की मात्रा का विस्तृत विश्लेषण है। अच्छी वर्षा के मौसम के सन्दर्भ में “गर्भोत्तम” की परिकल्पना करते हैं जिसमे मेघ की तुलना स्त्री के पेट में पलने वाले भ्रूण से करते हैं। जैसे स्त्री गर्भ में जन्म के पहले सब कुछ अच्छा रहा तो स्वस्थ बच्चा जन्म लेता है उसी तरह अगर बरसात के पहले के तीन महीने खूब गर्मी रहती है, बारिश नहीं होती है तो झमाझम बारिश होगी। इससे भी पहले, ऋग्वेद के पर्जन्य सूक्त में वर्षा और मेघ की प्रकृति का अध्ययन मिलता है।

भारत में मौसम पूर्वानुमान की बौद्धिक परम्परा के आधार पर एक समृद्ध लोक परम्परा भी विकसित हुई। उत्तर भारत के किसानों के लिए घाघ और भड्डरी की कहावतें उतनी ही प्रामाणिक हैं जितना आज का आईएमडी बुलेटिन है। अनुमान है कि घाघ 14वीं-17वीं शताब्दी के एक कृषि-ऋषि थे जिन्होंने जीवन-भर के प्रेक्षण को दोहों में पिरोया, जो मानते थे -

“अद्रा बरसे पुनर्वसु जाय, किसान खेलें मेले बांह उठाय।”

“घाघ कहे सुन भड्डरी, जेठ बदे तो असाढ़ रही”

“सावन मेह न भादों धाम, तो किसान करे आराम।”

कवि घाघ ने अपनी कहावतों में उन मौसम पैटर्नों को दर्ज किया, जिन्हें आज विज्ञान अल-नीनो ला-नीना के दीर्घकालीन प्रभाव के रूप में समझाता है। उनकी पंक्तियां “एक बून्द चैत में परे, सहस बून्द सावन की हरे” मूल रूप से “गर्भोत्तम” पर आधारित है जो बारिश के गर्भपात की तरफ इशारा करती है, वहीं “माघ में गर्मी जेठ में जाड़…” इस बात की तरफ इशारा करती हैं कि असामान्य मौसम अंततः फसलों और मॉनसून दोनों को बिगाड़ देता है।

मॉनसून के सटीक दूत

चातक और मॉनसून का रिश्ता भारतीय साहित्य में अमर है। कालिदास से मीराबाई तक सभी ने इसे स्वाति नक्षत्र की प्रतीक्षा का प्रतीक माना। वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो चातक एक प्रवासी पक्षी है जो दक्षिण से उत्तर की तरफ ठीक उसी समय प्रवास करता है जब दक्षिण-पश्चिम मॉनसून केरल तट से टकराकर उत्तर की तरफ बढ़ता है। इसी कारण इसे “मॉनसून बर्ड” भी कहते हैं। बया पक्षी का घोंसला भी एक अद्भुत बायोइंडिकेटर है। लोक-मान्यता है कि घोंसला जितनी ऊंचाई पर और पूर्व दिशा में हो, उतनी अच्छी वर्षा होगी। हाल के शोध बताते हैं कि बया अपने घोंसले की स्थिति स्थानीय वायु-प्रवाह और आर्द्रता के अनुसार तय करती है, वही कारक जो मॉनसून की तीव्रता से जुड़े हैं। मोर का नृत्य शायद मॉनसून का सबसे लोकप्रिय प्रतीक है और यह केवल काव्य-कल्पना नहीं। मोर वायुमण्डलीय दबाव में बदलावों के प्रति अत्यन्त संवेदनशील होते हैं। जब निम्न-दाब क्षेत्र बनता है और आर्द्रता बढ़ती है, जो वर्षा के लिए जरूरी बदलाव है तो वे नृत्य करने लगते हैं। यह व्यवहार वर्षा से 24-48 घंटे पहले दिखता है।

कौवे के बारे में किसान कहते हैं कि मई में यदि बबूल या सावर जैसे कंटीले पेड़ों पर घोंसला बनाए तो कम वर्षा और आम या करंज पर बनाए तो अच्छी वर्षा का सूचक है। इसके पीछे यह तर्क है कि कौवा मिट्टी की नमी और वायु-प्रवाह के अनुसार घोंसले की जगह चुनता है। इन सबमें सबसे अचूक मानी जाती है “टिटिहरी।” इसी कारण किसान कहते हैं, “टिटिहरी ने दिए चार अण्डे, होगी वर्षा खूब अखण्डे।”

टिटिहरी जमीन पर घोंसला बनाती है और चार अण्डे देती है। अण्डों की दिशा और घोंसले की ऊंचाई से मॉनसून का अनुमान लगाया जाता है। अंडों का मुंह पूर्व की ओर हो तो अच्छी वर्षा, यदि घोंसला ऊंचे स्थान पर हो तो भारी वर्षा और बाढ़ की आशंका। राजस्थान, मध्य प्रदेश और बुन्देलखंड के किसान आज भी बुवाई का फैसला टिटिहरी के घोंसले की दिशा देखकर करते हैं। इसकी वैज्ञानिक व्याख्या यह है कि टिटिहरी जमीन पर रहने वाला पक्षी है इसलिए मिट्टी की नमी, भूजल-स्तर और वायु-प्रवाह की दिशा के प्रति उसकी संवेदनशीलता असाधारण है और ये तीनों कारक मानसून की तीव्रता से सीधे जुड़े हैं।

अमलतास भारतीय लोक-मौसम विज्ञान की सबसे विश्वसनीय “पुष्प-घड़ियों” में माना गया है। किसानों का पारम्परिक अनुभव कहता है कि अमलतास के फूलों से लद जाने के लगभग 40–45 दिन बाद मॉनसून का आगमन होता है। हाल के दशकों में पुणे तथा जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय के मौसम-वैज्ञानिकों ने अमलतास के पूर्ण पुष्पन और दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के बीच संबंध का वैज्ञानिक विश्लेषण किया। अध्ययनों में पाया गया कि विभिन्न क्षेत्रों में पूर्ण पुष्पन और मॉनसून आगमन के बीच का अंतर प्रायः 40 से 50 दिनों के भीतर रहता है, जिसका औसत लगभग 45 दिन है। जूनागढ़ के दीर्घकालिक विश्लेषण में अमलतास-आधारित अनुमान और वास्तविक मॉनसून तिथि के बीच अधिकांश वर्षों में केवल 3 से 9 दिन का अंतर मिला जो पारम्परिक किसान-ज्ञान की उल्लेखनीय सटीकता को दर्शाता है। मेघों के इन जैव-संकेतकों की परम्परा में नीम भी अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। आमजन में प्रचलित है-

कवि घाघ ने अपनी कहावतों में उन मौसम‑पैटर्नों को दर्ज किया, जिन्हें आज विज्ञान अल नीनो, ला नीना के दीर्घकालीन प्रभाव के रूप में समझाता है

“नीम फूले भरपूर, पानी पड़े जरूर”

“नीम निबौरी अधिक होय, बरखा पानी खूब संजोय।”

गुजरात और दक्षिण भारत के अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों के अध्ययनों ने भी संकेत दिया है कि गर्मियों में नीम पर अत्यधिक फूल-फल अच्छे मॉनसून का सूचक हो सकते हैं। इसी प्रकार किसान दीमक के टीलों के अचानक उभरने को भूमिगत नमी और निकट आती वर्षा की आहट मानते हैं। आधुनिक शोध भी दीमक-माउंड्स, मिट्टी की नमी और भूजल स्तर के बीच गहरे संबंध की पुष्टि करते हैं।

27 नक्षत्रों पर आधारित भारतीय कृषि कैलेंडर मूलतः एक अनुभवजन्य चन्द्र कैलेंडर है, जिसमें बुआई, रोपाई और कटाई जैसी गतिविधियां चन्द्रमा के 27 नक्षत्रों से गुजरने की लय के साथ जोड़ी गई हैं। रोहिणी नक्षत्र के दौरान होने वाली वर्षा को ग्रामीण समाज में अत्यंत शुभ माना जाता है, जबकि आर्द्रा नक्षत्र का आरम्भ परंपरागत रूप से दक्षिण पश्चिम मॉनसून के औपचारिक आगमन के रूप में देखा जाता है। भौतिकी और हाल के उपग्रह आधारित अध्ययनों से यह तो स्पष्ट है कि चन्द्रमा का गुरुत्वाकर्षण समुद्र की ज्वार भाटा के साथ साथ वायुमण्डलीय दाब, नमी और वर्षा दर में भी सूक्ष्म पर मापने योग्य उतार चढ़ाव पैदा करता है।

संकट में परम्परा

आज पारम्परिक लोक मौसम-ज्ञान तीन गहरे संकटों से जूझ रहा है। पहला संकट पीढ़ियों के बीच बढ़ती दूरी का है। गांवों के वे बुजुर्ग किसान, जो बादलों के रंग, पक्षियों की आवाज और हवाओं की दिशा देखकर वर्षा का अनुमान लगा लेते थे, अब जीवन की अंतिम दहलीज पर हैं, जबकि नई पीढ़ी रोजगार और आधुनिक जीवन की तलाश में व्यस्त है। परिणामस्वरूप अनुभव और स्मृति पर आधारित यह ज्ञान-परम्परा धीरे-धीरे मौन होती जा रही है।

दूसरा संकट जलवायु परिवर्तन का है। जिन प्राकृतिक संकेतों पर लोक-मौसम विज्ञान टिका था, वे स्वयं बदलने लगे हैं। बढ़ते तापमान से अमलतास समय से पहले खिल रहा है, चातक की मौसमी यात्राएं प्रभावित हुई हैं और टिटिहरी के घोंसलों की पारम्परिक दिशाएं भी अब स्थिर नहीं रहीं। प्रकृति का वह संतुलन डगमगा रहा है, जिस पर यह लोकज्ञान विकसित हुआ था। तीसरा और सबसे गहरा संकट मानसिकता का है। आधुनिक विकास-दृष्टि ने वैज्ञानिक और पारम्परिक ज्ञान को आमने-सामने खड़ा कर दिया। खेतों और गांवों में संचित पर्यावरणीय अनुभव को अंधविश्वास मानकर उपेक्षित कर दिया गया। अमलतास अभी भी खिलता है। चातक अभी भी आता है। टिटिहरी अभी भी अपने चार अण्डों के साथ जमीन पर बैठती है। लेकिन उसे पढ़ने वाली पीढ़ी अगली पीढ़ी तक ये विधा बिना दिए जा रही है। यदि हम अभी नहीं चेते, तो यह ज्ञान-परम्परा उन बुजुर्गों के साथ ही विदा हो जाएगी जो आज भी आसमान की ओर देखकर बता देते हैं, “इस बार बारिश देर से आएगी।”

Down to Earth- Hindi
hindi.downtoearth.org.in