जब लोकरीतियां थीं भारतीय समाज का हीट प्लान
आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, हीट वेव, सूखा, पानी के संकट और अनियमित वर्षा जैसी समस्याओं से जूझ रही है। इस समस्याओ का समाधान ढूंढने में लगे वैज्ञानिक और पर्यावरणविद क्लाइमेट एडाप्टेशन, नेचर बेस्ड सॉल्यूशन और सस्टेनेबल लिविंग जैसे नए सिद्धांत गढ़ रहे हैं। लेकिन जब हम थोड़ा पीछे मुड़कर देखते हैं तो भारत का लोकजीवन इन सिद्धांतों को सदियों पहले अपने त्योहारों, व्रतों, भोजन, खेती और सामाजिक व्यवहार आदि की परम्पराओं में प्रकृति के प्रति गहरे जुडाव को अपना हिस्सा बना चुका था।
हमारे लोक जीवन ने प्रकृति के चक्र को गहरे से समझा और मौसम को जीतने के बजाय ताल मेल के साथ जीना सीखा और व्यहार में उतारा। यही कारण है कि भारतीय पंचांग का प्रत्येक पर्व किसी न किसी ऋतु परिवर्तन से जुड़ा हुआ है, प्रत्येक रीति रिवाज प्रकृति के प्रति आस्था को समर्पित है।
भारत में धर्म और प्रकृति कभी अलग-अलग नहीं रहे, प्रकृति की समझ ही धर्म का स्वरुप लेती गयी। सूर्य, चंद्रमा, नदियां पोखर, पर्वत, पेड़ पौधे, वर्षा, आग और हवा यहां तक की धरती सभी पूजनीय रहे हैं। यह पूजा किसी अलौकिक भय से नहीं, बल्कि इस गहरे अनुभव से उपजी थी कि मनुष्य का अस्तित्व प्रकृति पर निर्भर है।
गर्मी की तपती दोपहर में जब धरती आग उगलने लगती है, लू के थपेड़े शरीर की नमी सोख लेते हैं और मानसून की पहली बूंदों की प्रतीक्षा में खेत, जंगल और मनुष्य समान रूप से व्याकुल हो उठते हैं, तब भारतीय लोकजीवन केवल मौसम को सहन नहीं करता, बल्कि उसके साथ संवाद करता है। यही संवाद हमारी लोक परंपराओं, व्रतों, पर्वों और रीति-रिवाजों में आधुनिकता के प्रचंड प्रवाह के बाबजूद आज भी दिखाई देता है।
पहली नजर में ये केवल धार्मिक आस्थाएं लग सकती हैं, किंतु इनके भीतर मौसम, स्वास्थ्य, जल संरक्षण, खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण के गहरे वैज्ञानिक संकेत छिपे हुए हैं। आज जब जलवायु परिवर्तन के कारण गर्मी की अवधि लंबी होती जा रही है, हीट वेव सामान्य घटना बन चुकी है और वर्षा का चक्र अनिश्चित हो रहा है, तब इन परंपराओं को नए दृष्टिकोण से समझना समय की मांग है।
वैशाख और ज्येष्ठ की प्रचंड गर्मी के दौरान देश के अनेक हिस्सों में शिवलिंग पर निरंतर जल टपकता रहे इसके लिए मिट्टी का घड़ा (जलधारा) रखा जाता है। धार्मिक दृष्टि से इसे भगवान शिव का शीतल अभिषेक माना जाता है, लेकिन इसके पीछे प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता भी निहित है। मिट्टी के घड़े से बूंद-बूंद गिरता जल कहीं-न-कहीं हमारा ध्यान पानी का उपयोग संयम से किया जाए इस ओर ले जाता है। मिट्टी का घड़ा स्वयं जल को ठंडा रखता है और जल संरक्षण का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। यह परंपरा उस समय विकसित हुई होगी जब लोग जल के प्रत्येक कण का महत्व जानते थे।
इसी प्रकार निर्जला एकादशी के अवसर पर बास या ताड़ के पत्ते का पंखा, मिटटी का घड़ा या गिलास, चीनी या गुड शर्बत, चना सहित अन्य अनाज का मिला हुआ सत्तू, खीरा, आम, जल और अन्य शीतल वस्तुओं का दान करने की परंपरा आज भी जीवित है।
ध्यान से देखे तो ये सारी वस्तुएं प्रचंड गर्मी से बचाव की तैयारी का हिस्सा है, जो गर्मी में किसी जरूरतमंद को दिए जाने की परम्परा के रूप में विकसित हुई होगी। निर्जला एकादशी हीट एक्शन प्लान का लोक संस्करण है। यह परंपरा केवल पुण्य कमाने का माध्यम नहीं थी यह समाज में यह संदेश देने का तरीका था कि भीषण गर्मी में शरीर को ठंडा रखने वाले खाद्य पदार्थ सभी तक पहुंचने चाहिए। जिन लोगों के पास संसाधन नहीं थे, वे भी इस सामुदायिक व्यवस्था से राहत पाते थे। आज जिसे हम "हीट एक्शन प्लान" कहते हैं, उसका सामाजिक स्वरूप हमारे गांवों में सदियों पहले मौजूद था।
बिहार, झारखंड और पूर्वी भारत में मनाया जाने वाला जुड़ शीतल या शीतल पूजा भी इसी वैज्ञानिक सोच का विस्तार है। इस दिन रात में बना ठंडा भोजन, दही-चूड़ा, मीठा भात, आम, सत्तू और अन्य ठंढे तासीर वाला खाना खाया जाता हैं। घरों में पानी का छिड़काव किया जाता है, पेड़ों को सींचा जाता है और प्रकृति को शीतलता प्रदान करने का संदेश दिया जाता है। यह भोजन केवल स्वाद के लिए नहीं, बल्कि गर्मी में शरीर को संतुलित रखने वाला पारंपरिक पोषण विज्ञान है। दही शरीर में लाभकारी जीवाणुओं को बढ़ाता है, चूड़ा आसानी से पचता है, गुड़ खनिजों की पूर्ति करता है और आम त्वरित ऊर्जा का स्रोत है।
यह उत्सवधर्मिता केवल आध्यात्मिक संतोष तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बदलते मौसम के प्रति सामूहिक अनुकूलन का एक तरीका है। इसका सबसे सटीक प्रमाण चैत्र मास की समाप्ति पर मनाया जाने वाला 'सतुआनी' पर्व है, जो सीधे तौर पर शरीर को प्रचंड गर्मी के लिए तैयार करने का त्यौहार है। इस दिन सामूहिक रूप से सत्तू, आम के टिकोले (कच्ची अमिया) की चटनी और घड़े के पानी का पिया जाता है। इसके ठीक बाद आने वाली 'अक्षय तृतीया' (आखा तीज) पर मिट्टी के घड़े, सत्तू, जौ और खरबूजे के दान की परंपरा है। यह परंपरा केवल धार्मिक पुण्य कमाने का जरिया नहीं है, बल्कि समाज के हर वर्ग तक गर्मी से राहत देने वाले प्राकृतिक संसाधनों और शीतल भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित करने का एक अनूठा सामाजिक ढांचा है।
वट सावित्री व्रत के अवसर पर वटवृक्ष के नीचे पूजा करना और हाथ से पंखा झलना भी केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है। वटवृक्ष विशाल छाया देता है, आसपास का तापमान कम करता है और बड़ी मात्रा में नमी बनाए रखता है। पेड़ के नीचे बैठना स्वयं एक प्राकृतिक शीतलन प्रणाली है। पंखा झलने की परंपरा बताती है कि बिना ऊर्जा खर्च किए भी शरीर को ठंडक पहुंचाई जा सकती है। आज जब एयर कंडीशनर शहरों की गर्मी और बढ़ा रहे हैं, तब हाथ का पंखा और वृक्षों की छाया कहीं अधिक टिकाऊ समाधान प्रतीत होते हैं।
भारतीय समाज में मिट्टी के घड़े का पानी, सत्तू, बेल का शर्बत, आम का पना, दही, मट्ठा, लस्सी, जौ और चावल जैसे खाद्य पदार्थों का मौसमानुसार उपयोग भी इसी पर्यावरणीय समझ का परिणाम है। मौसम के अनुसार खान-पान की एक समृद्ध परम्परा की लोक समझ सम्पूर्ण भारत में किसी ना किसी रूप में अब भी देखने को मिल जाती हैं। इसी कड़ी में घाघ और भड्डरी की ये लोकोक्ति पोषण की आम समझ का आइना है और स्थानीय जलवायु के अनुरूप विकसित पोषण प्रणाली हैं।
चैते गुड़, बैसाखे तेल, जेठे पन्थ असाढ़े बेल।
सावन साग न भादों दही, क्वार करेला न कातिक मही।।
अगहन जीरा पूसे धना, माघे मिश्री फागुन चना।
ई बारह जो देय बचाय, वहि घर बैद कबौं न जाय।।
लोक परंपराओं का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामुदायिक सहभागिता भी है। सामूहिक रूप में गर्मी के दिनों में राहगीरों के लिए प्याऊ लगाना, पक्षियों के लिए पानी रखना, चीटियों के लिए गुड डालना, पशुओं के लिए अलग से पानी की व्यवस्था और वृक्षों की सिंचाई करना धार्मिक कर्तव्य माने जाते थे।आज जब जलवायु परिवर्तन के कारण पक्षियों और वन्यजीवों का अस्तित्व संकट में है, तब ये परंपराएं और भी प्रासंगिक हो जाती हैं।
इस लोक-परंपराओं का सबसे महत्वपूर्ण आयाम इसकी 'जीरो कार्बन' और पूरी तरह स्थानीय जीवनशैली है। इन त्योहारों में उपयोग होने वाले सभी खाद्य पदार्थ जैसे—सत्तू, आम पन्ना, बेल का शरबत, जौ और मट्ठा—पूरी तरह स्थानीय होते हैं। इनके रख-रखाव या ठंडा रखने के लिए किसी रेफ्रिजरेटर या भारी बिजली की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि मिट्टी के घड़े और सुराही के पारंपरिक विज्ञान का उपयोग किया जाता है। आज जब पूरी दुनिया 'क्लाइमेट चेंज' और ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए महंगे और कृत्रिम तरीके ढूंढ रही है, तब हमारी ये सदियों पुरानी ग्रीष्मकालीन परंपराएं बिना पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए, न्यूनतम संसाधनों में शरीर को भीतर से ठंडा रखने का एक बेहद व्यावहारिक और प्रकृति-अनुकूल मार्ग दिखाती हैं।
आज जब पूरी दुनिया टिकाऊ विकास का मार्ग खोज रही है, तब भारत की धार्मिकता से ओत-प्रोत ऋतु-आधारित लोक परंपराएँ केवल सांस्कृतिक धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान की पर्यावरणीय नीति की प्रेरणा बन सकती हैं। हमारे पूर्वजों ने प्रकृति पर विजय पाने का स्वप्न नहीं देखा था; उन्होंने उसके साथ चलना सीखा था। शायद इसी कारण उन्होंने त्योहारों को कैलेंडर की तिथियों से नहीं, बल्कि ऋतुओं की धड़कनों से जोड़ा, उसे किस्सों कहानियो में पिरोया, धार्मिकता का रंग दे पुण्य पाप से जोड़ा ताकि सम्पूर्ण समाज प्रकृति के साथ के ताने बाने में सुचारू रूप से जुड़ सके।
यदि हम इन परंपराओं को अतीत का अवशेष मानकर भूल जाएँगे, तो केवल अपनी संस्कृति ही नहीं खोएँगे, बल्कि उस जीवन-दर्शन को भी खो देंगे, जो भारतीय सभ्यता ने हजारो साल की अपनी यात्रा में प्रकृति के साथ असाधारण रूप से तालमेल के साथ जीना सिखा है। प्रकृति के साथ इस कठिन दौर में भारतीय लोकजीवन का यही संदेश सबसे अधिक प्रासंगिक है-प्रकृति के साथ संघर्ष नहीं, सहजीवन ही भविष्य का मार्ग है।
दुर्भाग्य से आधुनिक जीवनशैली में इन परंपराओं को केवल कर्मकांड मानकर छोड़ दिया गया है। परिणामस्वरूप हम उनके भीतर छिपे पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान से भी दूर होते जा रहे हैं। यदि हम इन परंपराओं को वैज्ञानिक दृष्टि से समझें तो स्पष्ट होगा कि ये मौसम के अनुरूप जीवन जीने की संपूर्ण जीवन-पद्धति प्रस्तुत करती हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि इन लोक परंपराओं को अंधविश्वास या रूढ़ि के रूप में नहीं, बल्कि जलवायु अनुकूलन के भारतीय मॉडल के रूप में देखा जाए। विद्यालयों में इनके वैज्ञानिक पक्ष को पढ़ाया जाए, स्थानीय समुदायों के अनुभवों का दस्तावेजीकरण किया जाए और आधुनिक जलवायु नीतियों में पारंपरिक ज्ञान को उचित स्थान दिया जाए।
यदि हम इन लोक परंपराओं को केवल धार्मिक कर्मकांड न मानकर पारंपरिक जलवायु ज्ञान के रूप में पुनः समझें, तो वे आज की जलवायु चुनौतियों से निपटने के लिए प्रेरक और व्यवहारिक दोनों सिद्ध हो सकती हैं।
भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता यही रही है कि उसने ऋतुओं को केवल कैलेंडर का हिस्सा नहीं माना, बल्कि जीवन जीने की संपूर्ण पद्धति का आधार बनाया। पिछले पांच दशको के वैश्विक प्रयासों से इतना तो मान लिया गया है कि जलवायु चुनौतियों का समाधान केवल अत्याधुनिक तकनीकों से संभव नहीं है, बल्कि हमाररी उन साधारण-सी दिखने वाली परंपराओं में भी छिपा हो सकता है, जो सदियों से मानव, प्रकृति और ऋतुओं के बीच संतुलन बनाए रखने का कार्य करती रही हैं। भारतीय लोकजीवन हरकदम पर हमें एक रास्ता दिखाता कि प्रकृति पर विजय नहीं, बल्कि उसके साथ सामंजस्य ही स्थायी विकास और सुरक्षित भविष्य का वास्तविक मार्ग है।


