फोटो: दिलीप बिदावत
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अकाल की मार: थार में जल संकट और महंगे चारे से पशुपालकों की बढ़ती मुश्किलें

इस साल थार रेगिस्तान में अकाल की स्थिति है। नाडी, तालाब सूख गए हैं, जो सामान्य समय में औसत 6 से 7 माह पेयजल उपलब्ध कराते हैं।
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थार रेगिस्तान में एक बार फिर अकाल ने अपने पांव पसार लिए हैं। बाड़मेर, जैसलमेर, बीकानेर में इस बार सामान्य से कम वर्षा हुई। जैसलमेर जिले की स्थिति ज्यादा गंभीर है। जैसलमेर के सम, फतेहगढ़ ब्लॉक जिसमें सबसे कम वर्षा होती है, दो सालों से सूखे जैसी स्थिति का सामना कर रहा है।

गत वर्ष भी इन क्षेत्रों में सामान्य से कम वर्षा हुई थी या यूं कहें, खरीफ सीजन की खेती के अनुकूल नहीं हुई। पारंपरिक जल स्त्रोत सूख चुके हैं। जल जीवन मिशन की प्रगति धीमी है। कुछ गांवों में ढांचागत व्यवस्थाएं हुई है, लेकिन पानी की सप्लाई चालू नहीं हुई। भू-जल पीने लायक नहीं है।

अधिकांश गांवों में भू-जल का टीडीएस बीआइएस के प्रमिसिबल मानकों की सीमा से अधिक है। लेकिन मजबूरी में पी रहे हैं। सामान्य समय में प्रति परिवार पानी पर सालाना 15 से 20 हजार रुपए खर्च करता है, वह बढ़कर दो गुना हो चुका है। इसी प्रकार चारे का संकट है। चारे के दाम काफी बढ़ गए। कहीं-कहीं जो चारा 500 से 800 रु. प्रति क्विंटल मिल रहा था, 2 हजार रु. प्रति क्विंटल हो गया।

पानी और चारे के संकट के कारण पशु पालकों की चिंता बढ़ गई है। छोटे पशुपालक पलायन की तैयारी कर रहे हैं, वहीं बड़े पशुओं को बचाना मुश्किल है। शायद निकट समय में आवारा पशुओं की संख्या में इजाफा हो और मृत्यु का आंकड़ा भी बढ़ जाए।

खरीफ सीजन में लोगों ने खेती पर पैसा खर्च किया। लेकिन पर्याप्त व समय पर बरसात नहीं होने के कारण फसले नष्ट हो गई। खेती में जो खर्च लगा था, वह वापस मिलने जितना भी उत्पादन नहीं हुआ। बरसात नहीं होने के कारण खड़ीनों में भी पानी नहीं आया। इस वर्ष खड़ीनों में भी खेती नहीं होगी। लोगों की अर्थिक स्थिति काफी खराब हो चुकी है।

फोटो: दिलीप बिदावत
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पानी का संकट

वैसे तो थार में पानी का संकट नया नहीं है। देश में उपलब्ध पीने योग्य तीन प्रतिशत पानी में से थार को मात्र एक प्रतिशत पानी मिलता है और वह भी बरसात से। इसीलिए यहां वर्षा जल संग्रहण की संस्कृति विकसित हुई। आधुनिक विकास के साथ-साथ यह जल संकट कम होने बजाय और बढ़ा है।

भू-जल खारा एवं अन्य घुलनशील लवणों के मिश्रण के कारण पीने लायक नहीं है, लेकिन संकट के समय लोग पीते हैं। बोरवैल जैसी तकनीक उपलब्ध होने के बाद भू-जल का दोहन बढ़ा है तथा यह समाप्त होने के निकट है।

अकेले जैसलमेर में आज से 20 वर्ष पहले जहां 1200 के लगभग सरकारी, गैरसरकारी ट्यूबवैल थे, आज 9 हजार से ज्यादा हो गए। भू-जल बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार 1 प्रतिशत पानी रिचार्ज होता है, 3.5 प्रतिशत निकाला जा रहा है। थार आज जल अतिदोहन की श्रेणी में है। आने वाले समय में केवल वर्षा जल संग्रहण जैसा विकल्प ही बचेगा। 

ट्रैक्टर से पानी परिवहन की सुविधा बढ़ने के कारण पारंपरिक जल स्त्रोतों की समुदाय आधारित प्रबंधन व्यवस्था धीरे-धीरे समाप्त हो रही है। हालांकि महात्मा गांधी नरेगा और विबी-जीराम-जी के तहत जल स्त्रोतों के जीर्णोद्धार पर पिछले दो दशकों में काफी धनराशि खर्च हुई है। लेकिन भ्रष्टाचार और समुदाय की भागीदारी के बिना अपेक्षित परिणाम नहीं मिले। बहुत से तालाबों, नाडियों का कैचमेंट राजस्व रिकाॅर्ड में दर्ज नहीं होने के कारण अतिक्रमण की भेंट चढ़ रहे हैं।

दूसरी तरफ जल जीवन मिशन की प्रगति भी मानसून की तरह थार में आते-आते थक जाती है।  जल शक्ति मंत्रालय की बेबसाइट पर जल जीवन मिशन डेस बोर्ड की मासिक प्रगति रिपोर्ट को देखें तो, राज्य में घरों में कनेक्शन तक पहुंच 59.27 प्रतिशत है।

जैसलमेर जिले में घरों तक नल कनेक्शन की पहुंच 54.09, बीकानेर में 58.43, फलौदी 37.02, बाड़मेर, 21.39 और बालोतरा 64.52 प्रतिशत है। नियमित सप्लाई कहीं भी नहीं होे रही है। इस साल अकाल की स्थिति है। नाडी, तालाब सूख गए हैं, जो सामान्य समय में औसत 6 से 7 माह पेयजल उपलब्ध कराते हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी लोगों की निर्भरता तालाबों, नाडियों, बेरियों और टांकों पर है। 60 से 70 प्रतिशत आपूर्ति इन्हीं से होती है। यही कारण है कि इस साल अकाल में पानी का संकट सबसे बड़ा हो गया है। कुछ घरों तक नल तो पहुंचे हैं, लेकिन पानी नहीं।

ऐसा नहीं है कि अकाल सभी के लिए कष्टदाई है। कुछ लोगों के लिए यह कमाई का अवसर भी है। टेंकर माफियाओं की चांदी बन गई है। गांव के नाडी तालाबों से पानी उठाकर बेच चुके। अब ट्यूबवैल और जेजेएम के तहत आने वाली सप्लाई का पानी भी उठा कर बेच रहे हैं।

टेंकर माफियों के नियंत्रण के लिए किसी प्रकार के नियम नहीं बने हैं। जैसलमेर सम ब्लोक के सिपला गांव की मिश्रों देवी ने बताया कि जब तालाब में पानी था, टेंकर वालों को मना करने के बाद जबरन पानी उठा कर ले गए। अब गांव के जीएलआर में पानी आता है, वहां से भी जबरन टेंकर भर ले जाते हैं।

सियांबर की ओमादेवी बताती हैं कि उनके गांव के तालाब में साल भर उपयोग जितना पानी रहता है, लेकिन सम रिसोर्ट वालों को पानी बेचने के लिए टेंकर वाले तीन महीने पानी में खत्म कर देते हैं। शिकायत करें, तो किसको करें। सम व आस-पास के गांव दामोदरा, कनोई आदि गांवों की यही स्थिति है।

चारे की कमी

ग्रामीण इलाकों में लोगों का कहना है कि चारे और पानी के अभाव में बड़े पशुओं विषेषतः गायों की मृत्यु होगी। केसुओं की बस्ती के जमाल खां, कोहरियों के गांव के आदत खान बताते हैं कि पशुओं को बचाना मुश्किल हो गया। चारा और पानी दोनों खरीद कर पशुओं को बचाना भारी पड़ रहा है। चारा महंगा हो गया और आसानी से उपलब्ध भी नहीं है। चारागाहों की हालत बेहद दयनीय है।

जैसलमेर जो सेवण घास के लिए प्रसिद्ध था, आज बहुत कम बची है। चारागाहों का विकास जिस गति सेे होना चाहिए, नहीं हो रहा है। पश्चिमी राजस्थान की मुख्य आजीविका आज भी पशुपालन आधारित है।

बीसवीं पशु गणना 2019 के अनुसार बीकानेर, बाड़मेर और जैसलमेर में भेड़-बकरियों की संख्या 71 लाख नब्बे हजार 240 तथा गाय, भैंस की संख्या 29 लाख, 42 हजार, 592 है। चारे के अभाव में इनको भूख और भूख से जनित रोगों से बचाना पशुपालकों के लिए बड़ी चुनौती है। फिलहाल लोग अकाल राहत के तहत पशु शिविर और अनुदानित चारे की आश लगाए बैठे हैं।

यही स्थिति रोजगार को लेकर है। मनरेगा से विबी-जीराम-जी नाम बदला गया। लेकिन लोगों को जरूरत के अनुसार रोजगार नहीं मिल रहा। कार्य की स्वीकृतियां बहुत कम गांवों में हुई है। नियम-कानून बदले, लेकिन बिचैलियों का हस्तक्षेप अभी भी जारी है। अधिकांश काम स्वीकृति के बाद बंद पड़े हैं, जिसका मुख्य कारण योजना में व्याप्त भ्रष्टाचार है। कुल मिलाकर इस बार के अकाल में ग्रामीण क्षेत्र में निवास करने वाले आर्थिक और सामाजिक रूप से निःसहाय लोगों की स्थिति अधिक खराब होने वाली है।  

फिलहाल राज्य में पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव चल रहे हैं। सरकार द्वारा अभी तक किसी प्रकार के राहत की घोषणा नहीं की गई है। समय रहते इस पर गौर नहीं किया गया, तो ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ेगा।

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