“खेल की तरह करें, प्रकृति का सम्मान”

अप्रैल 2024 में 12 साल के घरेलू करियर के बाद सजना सजीवन को राष्ट्रीय महिला क्रिकेट टीम में पहली बार बुलावा मिला था। उनका घरेलू करियर केरल के वायनाड के धान के खेतों में शुरू हुआ। जिले के मनंथावडी शहर में बड़ी हुई सजीवन ने अपना ज्यादातर समय बाहर बिताया। यह संबंध उन्हें पर्यावरणीय बदलावों के प्रति जागरूक बनाने में मदद करता रहा है। खासतौर से जब 2018 में बाढ़ ने उनका घर, सामान और क्रिकेट किट बहा दिया। दाक्षीआणी पलीचा के साथ एक साक्षात्कार में सजीवन ने प्रकृति के साथ अपने संबंध और खेल पर अप्रत्यक्ष जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के बारे में बाते साझा कीं
सजना सजीवन
फोटो सौजन्य: द राइट प्लेयर
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Q

वायनाड में बड़े होने के नाते आप प्रकृति के करीब रही हैं। क्या इससे आपके खेल में कोई फायदा हुआ या ट्रेनिंग के अलावा यह आपको दूसरों से थोड़ा आगे रखता है?

A

वायनाड एक हिल स्टेशन है और प्राकृतिक रूप से बहुत सुंदर है। यह केरल के सबसे अच्छे पर्यटन स्थलों में से एक हो सकता है। यहां बड़े होना मतलब हर तरफ हरियाली, साफ हवा और खुली जगह के बीच रहना। यह स्वाभाविक रूप से मुझे सक्रिय और पर्यावरण से जुड़ा रहने के लिए प्रेरित करती है। मैंने अपना अधिकांश बचपन बाहर बिताया, दौड़ते हुए, खेलते हुए या पेड़ों पर चढ़ते हुए। इससे मेरी फिटनेस में सुधार हुआ। मैंने क्रिकेट भी अपनी दादी की फार्म में खेलना शुरू किया। प्रकृति के इतने करीब होने से अनुशासन, संतुलन और अपने आसपास के वातावरण के प्रति सम्मान में भी मदद मिलती है। यह वो मूल्य हैं जो मैंने एक क्रिकेट खिलाड़ी के रूप में अपने खेल में अपनाए हैं।

Q

वायनाड अक्सर जलवायु की अनियमितताओं से प्रभावित होता है, खासकर हाल के वर्षों में ऐसा देखा गया। आपने 2018 की बाढ़ के बारे में बताया था जिसने आपके जिले में आपका घर और सामान बहा दिया। क्या आप उस विनाश के बारे में विस्तार से बता सकती हैं जिसे आपने देखा?

A

2018 की बाढ़ मेरे लिए एक क्रिकेट खिलाड़ी और इंसान दोनों के रूप में सबसे कठिन समयों में से एक थी। हमारा घर आंशिक रूप से टूट गया और हमने लगभग सब कुछ खो दिया। उस समय मैं पेशेवर क्रिकेटर नहीं थी लेकिन अपने जुनून को आगे बढ़ाने के बारे में सोच रही थी। अपने निजी सामान और खेल सामग्री का नुकसान बहुत दुखद था लेकिन इसने मुझे और मजबूत भी बनाया। बाढ़ से ठीक पहले मैंने 2018 में तमिल फिल्म कना में बतौर निर्माता और अभिनेता शिवकार्तिकेयन के साथ अभिनय किया था। बाढ़ के बाद जब मैं अपने घर और आसपास की सफाई कर रही थी तो इस बीच उन्होंने मुझे कई बार फोन किया। उन्होंने मेरा हालचाल पूछा और यह भी देखा कि क्या मुझे किसी चीज की जरूरत है। मैं क्रिकेट से जुड़े नए सामान मांगने में हिचकिचा रही थी, इसलिए मैंने केवल जूते मांगे, जिन्हें हम स्पाइक्स कहते हैं। एक सप्ताह के भीतर मेरे पास स्पाइक्स पहुंच गए। यह ऐसी अकेली बाढ़ थी, जिसमें मैंने लोगों और समुदायों को एक साथ आते हुए और एक-दूसरे का समर्थन व उत्साह बढ़ाते हुए देखा। जब बाढ़ के बाद लोग अपने घरों को कचरे और कीचड़ से साफ कर रहे थे तो उस वक्त पूरा जिला एकजुट हो गया था। वह एकजुटता की भावना मेरे साथ हमेशा रही है। यह मुझे याद दिलाती है कि चाहे कुछ भी हो जाए, आप फिर से शुरुआत कर सकते हैं और जो कुछ खो गया है उसे फिर से बना सकते हैं।

Q

आप आपदाओं के बाद सामुदायिक कार्रवाई की शक्ति की बात करती हैं। क्या आपको लगता है कि लोगों को जलवायु की अनियमितताओं से पहले चेतावनी देने और तैयार करने के लिए पर्याप्त कदम उठाए जा रहे हैं? आपदाओं की बढ़ती तीव्रता और प्रभाव के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है?

A

मैं मानती हूं कि ज्यादातर आपदाएं प्राकृतिक घटनाएं हैं। लेकिन यह भी सच है कि कई मामलों में हम प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने पर ध्यान नहीं देते। हम बिना संतुलन के निर्माण करते रहते हैं। हाल के वर्षों में हमने वर्षा के पैटर्न में बड़े बदलाव देखे हैं, जो अब अनुमानित नहीं रह गए हैं। दस साल पहले भी हम छह महीने की बारिश का मौसम का अंदाजा लगा सकते थे, उसके बाद गर्मी आ जाती थी। अब हम जलवायु का बिल्कुल अनुमान नहीं लगा सकते। अब या तो तेज बारिश अचानक होती है या लंबी शुष्क अवधि आती है। गर्मियां भी ज्यादा तपिश वाली हो गई हैं। दिन-ब-दिन यह और अधिक अनियमित और खतरनाक होती जा रही है। लेकिन मेरा मानना है कि इसका दोष किसी एक व्यक्ति या समूह पर नहीं डाला जा सकता। यह इस बात से जुड़ा है कि हम सभी ने प्रकृति का उपयोग संतुलन के बिना किया है। अब ध्यान जागरुकता और सामूहिक जिम्मेदारी पर होना चाहिए।

Q

क्रिकेट ऐसा खेल नहीं है जिसे कोई सीधे पर्यावरण या जलवायु मुद्दों से जोड़े। क्या आपको लगता है कि ये बदलाव खेल पर ऐसे प्रभाव डाल रहे हैं जिन्हें हम सीधे नहीं देख पाते या महसूस नहीं कर पाते?

A

हम क्रिकेट खिलाड़ी ज्यादातर खेल दिन की धूप में खेलते हैं, आमतौर पर सुबह नौ से शाम पांच बजे तक। महिलाओं की प्रीमियर लीग जैसी श्रृंखलाओं के दौरान दिन लंबा हो जाता है और हम स्टेडियम की रोशनी में खेलते हैं। इसलिए हमारे लिए गर्मी एक असली चुनौती बन गई है।

अब हम अधिक चरम तापमान में मैच खेल रहे हैं। बहु-दिवसीय मैच और भी कठिन हैं। हर दिन के बाद हमें सोचने में कठिनाई होती है कि हम कैसे आगे बढ़ सकते हैं। गर्मी हमारी सहनशीलता और पानी की कमी को प्रभावित करती है। हमारी पिच और मैदान भी सूख रहे हैं, जिससे चोटों का खतरा बढ़ जाता है। मिसाल के तौर पर जब हम फील्डिंग करते हुए दौड़ते या छलांग लगाते हैं, उस वक्त सूखे मैदान हमें चोट पहुंचाते हैं। खेल के दौरान पानी पीना भी चुनौतीपूर्ण हो गया है, क्योंकि भयंकर गर्मी में ज्यादा पानी पीने से भी राहत नहीं मिलती।

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