ढोला मत जाओ जी स्याळा में
कांप रह्य छै धरती अम्बर
चालंगा उन्दाला मं
ढोला…
मेरा प छा रहयो छै लूण्यो
गार गलडकती होरी
ताप ताप क गरम हो रहया
गांवा म छोरा- छोरी
ढोला………
पत्नी अपने पति से कह रही है, "इतनी सर्दी में परदेस मत जाओ। तेज सर्दी के कारण धरती और आसमान दोनों कंपकंपा रहे हैं। अगर चलना ही है तो हम गर्मियों में एक साथ चलेंगे। देखो तेज ओस के कारण खेत की मेड़ों पर नमक सा जम गया है। जमीन बिलकुल ठंडी हो गई है। गांव के बच्चे अलाव जला कर गर्म हो रहे हैं। सर्दी इतनी ज्यादा है कि मैंने भी जाड़ा दूर करने के लिए घर के दरवाजे की टाटी, छप्पर, छत का फूस और घास को भी अलाव में डाल दिया है। जाड़े के कारण पहनने वाले कपड़े भी अलाव में जला दिए हैं। इस सब के बाद भी मेरी सभी सर्दी से बचने की सभी कोशिशें नाकाम हो चुकी हैं।"
राजस्थान की मारवाड़ी बोली में पौष (दिसंबर-जनवरी) महीने की सर्दी के सितम को इस लोकगीत के जरिए बताया गया है, लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण अब मौसम चक्र बदल गया है। ना तो पौष में इतनी सर्दी हो रही है और ना ही समाज और प्रकृति इस बदलते मौसम में खुद को पूरी तरह ढाल पा रहा है।
राजस्थान में सर्दियां अब गर्म हो रही हैं। 2025 के नवंबर-दिसंबर और 2026 के पहले तीन महीनों में सर्दी के सीजन में होने वाली पर्याप्त बारिश नहीं हुई। कोल्ड वेव दिनों की संख्या भी घटी है। सर्दी के पूरे सीजन में प्रदेश में करीब 5-6 एक्टिव पश्चिमी विक्षोभ आते हैं। जिनसे होने वाली बारिश का सर्दी बढ़ाने में बड़ा योगदान होता है, लेकिन मौसम विभाग के आंकड़ों की मानें तो इस बार दो-तीन पश्चिमी विक्षोभ ही एक्टिव हुए।
सर्दी के महीनों में गर्म दिनों की संख्या बढ़ने से आम जन-जीवन, फसल चक्र सब प्रभावित होने लगा है। जाती हुई सर्दियां भेड़ों की ऊन उतारने का वक्त होता है, लेकिन दिन में गर्मी और रात में सर्दी के किसान भेड़पालक भी परेशान हैं। जिन भेड़ों की ऊन उतार ली गई, रात में सर्दी के कारण उन्हें निमोनिया हो गया और जिनकी ऊन नहीं उतारी वे दिन में गर्मी के कारण बीमार हो रही हैं।
“एक महीना आगे हुई उत्तर से आने वाली हवाएं, फसलों को 120 की जगह 90 दिन ही मिला सही तापमान”
जलवायु परिवर्तन के जमीनी असर को पहचानने और बताने के लिए डाउन-टू-अर्थ ने जैसलमेर के किसान और पर्यावरणविद् चतर सिंह जाम से बात की। वे बताते हैं, “पश्चिमी राजस्थान में 10-15 नवंबर से सर्दी शुरू हो जाती थी, लेकिन इस साल सर्दी 15-16 दिसंबर से आई। आधे जनवरी तक 20-25 दिन कड़ाके की सर्दी पड़ी। जमीन ऐसे सफेद हो गई जैसे किसी ने नमक छिड़का हो। सर्दी से खेजड़ी और कैर के पेड़ जल गए, लेकिन संक्रांति के बाद ठंड गायब ही हो गई और अब तो तापमान 40 डिग्री के आसपास है।”
पुराना समय याद करते हुए वह कहते हैं, “रेगिस्तान में जिस साल बरसात कम होती है, उस साल सर्दी ज्यादा होती है। क्योंकि जमीन में नमी नहीं होती। नमी रहने से जमीन गर्म रहती है। आज से एक दशक पहले भी सर्दी के सीजन में धूप के बावजूद दिन में ठंडक रहती थी, लेकिन अब दिन में गर्मी का अहसास होने लगता है। सीजन में जैसलमेर सहित रेगिस्तान में उत्तर की हवाएं चलती थीं, लेकिन इस बार नमी लाने वाली उत्तर की हवाएं नहीं चलीं। इससे फसलों पर सीधा असर हुआ। गर्मी से खड़ीनों में नमी खत्म हो गई। इसे हम फसल का प्यास करना कहते हैं। इससे फसल का उगना कम हुआ। सही तापमान के इंतजार में किसानों ने फसलें देरी से बोईं। वहीं, जब कम दिनों में ज्यादा सर्दी हुई, उससे सरसों और चने की फसल झुलस गई।”
लगभग यही बात जयपुर में करीब 20 बीघा में सब्जी और रबी सीजन की फसलें करने वाले किसान कैलाश चौधरी ने कही। चौधरी ने बताया कि इस बार कम सर्दी के कारण सब्जी की फसलें जैसे टमाटर, खीरा, करेला बहुत अच्छा हुआ, लेकिन गेहूं और सरसों का दाना गर्मी के कारण छोटा रह गया। जरूरत के मुताबिक नमी नहीं मिलने से फसल की ग्रोथ भी बहुत अच्छी नहीं हुई।
चतर सिंह जाम कहते हैं, “10-20 साल पहले रेगिस्तानी इलाकों में नवरात्र यानी सितंबर के आखिरी हफ्ते से अक्टूबर के पहले सप्ताह में उत्तर की हवाएं चलना शुरू हो जाती थीं, लेकिन इस बार उत्तर की हवाएं एक महीने देरी से चलीं। अच्छे उत्पादन के लिए किसानों को 120-125 दिन का सही तापमान चाहिए, लेकिन इस सीजन में हमें सिर्फ 90 दिन ही सही तापमान मिला। वहीं, फरवरी में अक्टूबर जैसा तापमान महसूस हुआ और मार्च में अंत में तापमान 40 डिग्री के आसपास जाता है, वो टेम्परेचर मार्च के पहले हफ्ते में ही चला गया। इससे फसलें सूख गईं।”
केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी) जोधपुर में इंटीग्रेटेड फार्मिंग सिस्टम डिवीजन के हैड डॉ. धीरज सिंह भी सर्दियों में बढ़ते तापमान को फसलों के लिए नुकसानदायक मानते हैं। डाउन-टू-अर्थ से बात करते हुए डॉ. सिंह बताते हैं कि सर्दी छोटी हो रही हैं। रबी सीजन में होने वाली फसलों को भी अलग जलवायु चाहिए होती है। फसल बोने से लेकर उगने और दाने के पूरी तरह विकसित होने तक अगर सही तापमान और हवा में नमी नहीं मिलती है तो पैदावार 25-30% तक घट जाती है। साथ ही अनाज की गुणवत्ता भी खराब हो जाती है। सरसों में 38-42% तेल होता है। सही मौसम नहीं मिलने की वजह से सरसों में ऑयल कंटेंट कम हो रहा है।गेहूं का दाना सिकुड़ रहा है। दाने में स्वाद और कलर नहीं आएगा।
डॉ. धीरज आगे बताते हैं, “अगर गर्मी जल्दी शुरू हो रही है तो फूल वाले पौधे गर्मी से मुकाबला करने के लिए तनाव में आकर जल्दी फ्लारिंग करने लगता है। इससे उत्पादन और गुणवत्ता कम हो जाती है। इस साल सर्दी कम होने और गर्मी जल्दी शुरू होने के कारण गेहूं, सरसों, चना में यह असर बड़ी मात्रा में देखने को मिला। काजरी संस्थान में फसल कटाई चल रही है। अनिश्चित मौसम के कारण संस्थान की 25-30% पैदावार कम हुई है। पौधों का साइज भी छोटा रह गया। बायोमास भी पौधों ने नहीं लिया। फसल समय से पहले पक गई। खेजड़ी में मार्च महीने में फूल आता है। ज्यादा तापमान के कारण पूरे क्षेत्र में फरवरी में ही खेजड़ी में फूल आ गए। पौधों का प्राकृतिक व्यवहार इस मौसम के कारण बदला है। ”
सर्दियों में कम हो रही बारिश
मौसम विभाग के आंकड़ों के मुताबिक जनवरी के पहले पखवाड़े में राजस्थान में मौसम गर्म ही रहा। 9 जनवरी को पूर्वी राजस्थान के कहीं-कहीं हल्की बूंदाबांदी दर्ज हुई। इस दौरान होने वाली सामान्य बारिश (Long period average) में 97% की कमी देखी गई। जनवरी के पहले पखवाड़े में पूरे राजस्थान में एक मिमी औसत बारिश होती है, लेकिन कहीं भी बारिश दर्ज नहीं हुई। वहीं, पूर्वी राजस्थान में 1.1 मिमी सामान्य बारिश होती है, लेकिन इस दौरान सिर्फ 0.1 मिमी बारिश ही हुई। इसी तरह पश्चिमी राजस्थान में 0.9 मिमी सामान्य बारिश की जगह कहीं भी बारिश नहीं हुई। इस तरह पूरे राजस्थान में औसत 97% कम बारिश हुई।
इसी तरह फरवरी के पहले हफ्ते में पूर्वी राजस्थान में 1.1 मिमी की जगह सिर्फ 0.9 मिमी बारिश हुई और पश्चिमी राजस्थान में 0.7 सामान्य बारिश के बदले बादल बिलकुल नहीं बरसे। इस तरह पूरे राजस्थान में औसतन 39% कम बारिश हुई। गौर करने वाली बात यह है कि जनवरी और फरवरी दोनों महीनों में पश्चिमी राजस्थान में बिलकुल बारिश नहीं हुई।
वहीं, 6-12 फरवरी के दौरान पूरे राजस्थान में सामान्य (1.4%) की तुलना में कहीं भी बारिश नहीं हुई। साथ ही पूरे महीने अधिकतम तापमान सामान्य से 2-3 डिग्री ज्यादा रहा। जबकि मार्च में अभी तक एक भी दिन बारिश नहीं हुई है। बाड़मेर में तापमान 40 डिग्री से अधिक दर्ज किया जा चुका है।
“मैदानी इलाकों में शून्य तापमान के दिन घटे”
कम होती बारिश और बढ़ते तापमान के पीछे की वजह जानने के लिए डाउन-टू-अर्थ ने जयपुर मौसम केन्द्र के निदेशक राधेश्याम शर्मा से बात की। वह बताते हैं, “इस बार दिसंबर में अधिकतम तापमान औसत से 1-2 डिग्री ज्यादा रहा है। जनवरी में कुछ इलाकों में ही तापमान सामान्य से कम रहा और अधिकतर जिलों में सामान्य के आसपास ही रहा। जनवरी में ही सर्दी सामान्य रही। वहीं, न्यूनतम यानी रात के तापमान में पश्चिमी राजस्थान में सामान्य से दो डिग्री तक ज्यादा रहा है। पूर्वी राजस्थान में भी सामान्य के आसपास रहा। इसी तरह जनवरी में भी न्यूनतम तापमान सामान्य (10 डिग्री) के आसपास रहा।”
राधेश्याम जोड़ते हैं, “बीकानेर, चुरु जैसे मैदानी इलाकों वाले जिलों में एक-दो दिन ही तापमान शून्य या इसके आसपास रहा। इन इलाकों में जनवरी में एक भी दिन तापमान शून्य से नीचे नहीं गया। जबकि आमतौर पर सीकर, चुरू जैसे शेखावाटी इलाकों में 4-5 बार तापमान शून्य से नीचे दर्ज हो जाता है। दिसंबर में एक-दो दिन के लिए कुछ इलाकों में पारा शून्य से नीचे आया था।”
घटते शीतलहर के दिनों के बारे में बताते हुए शर्मा कहते हैं कि सीजन में औसतन 10-12 कोल्डवेव दिन होते हैं। इस बार यह लगभग इतना ही रहा, लेकिन इनका स्पैन 2-3 दिन ही था। जबकि कुछ साल पहले तक 4-5 दिनों तक लगातार शीतलहर रहती थी। कुल मिलाकर हमारा विंड पैटर्न चेंज हुआ है। क्योंकि पहाड़ों पर बर्फवारी कम हुई। हमारे क्षेत्र में सर्दी पश्चिमी विक्षोभ और पहाड़ों पर होने वाली बर्फवारी पर निर्भर करता है। पिछले कुछ सालों से यह देखा जा रहा है कि राजस्थान में जाती हुई सर्दियां यानी फरवरी और मार्च में तापमान सामान्य से ज्यादा रिकॉर्ड हो रहा है। सर्दी समय से पहले जा रही हैं और गर्मी का आगाज़ पहले हो रहा है।
अनिश्चित तापमान से पशुपालक परेशान, भेड़ें बीमार
अनिश्चित तापमान का पशुओं के स्वास्थ्य पर भी प्रभाव पड़ रहा है। दिन में गर्म और रात में ठंड के कारण पशु बीमार हो रहे हैं। राजस्थान में यह समय भेड़ों की ऊन कटाई का है। भेड़पालक यदि ऊन काट लेता है तो रात में ठंड के कारण भेड़ों को निमोनिया हो रहा है और नहीं काटता तो दिन में गर्मी के कारण भेड़ें बीमार हो रही हैं। चतर सिंह बताते हैं कि जैसलमेर, बाड़मेर के कई इलाकों में मौसम की अनिश्चितता के कारण भेड़, बकरियों को निमोनिया और अन्य बीमारियों की शिकायतें सामने आ रही हैं।
इस बार सिर्फ एक मावठ जबकि 4-5 बार सीजन में बारिश होती है
जलवायु परिवर्तन और रेगिस्तानी इकोलॉजी पर काम करने वाले पर्यावरणविद् पार्थ जगाणी से भी डाउन-टू-अर्थ ने बात की। वे बताते हैं, “इस बार 15 दिसंबर तक सर्दी नहीं थी। इसीलिए सर्दी के इंतजार में दिसंबर पहले दो हफ्तों तक किसानों ने बिजाई तक नहीं की। रेगिस्तान में जीरा, ईसबगोल, सरसों, चना, गेहूं मुख्य रूप से होता है। जीरे की बिजाई सबसे आखिर में की गई, क्योंकि जीरे को बोने लायक तापमान किसानों को नहीं मिल पा रहा था। वहीं, इस बार पूरे सीजन में सिर्फ एक बार ही बारिश (मावठ) हुई। जबकि आमतौर पर सर्दियों में 4-5 बार बारिश होती है। पिछले साल तो एक बार भी बारिश नहीं हुई थी। मावठ सर्दी और कोहरा बढ़ाने में मददगार है और कोहरा बढ़ने से रबी की फसलों की ग्रोथ अच्छी होती है।
फरवरी पिछले एक दशक का सबसे गर्म महीना
पूरे राजस्थान के साथ ही राजधानी जयपुर में भी सर्दी का मिजाज बदला है। आंकड़ों के मुताबिक जनवरी में जयपुर में सिर्फ दो ही दिन मावठ हुई। जबकि एक जनवरी को राजस्थान के 20 जिलों में बूंदाबांदी और हल्की बारिश हुई थी। राजधानी जयपुर में इस बार सिर्फ दो हफ्ते ही कड़ाके की सर्दी रही। कुल 120 दिन में से 21 दिन ही रात का पारा 10 डिग्री से नीचे रहा। इसमें दिसंबर महीने में छह और जनवरी के 15 दिन शामिल हैं।
वहीं, 87 दिन रात का पारा 10 डिग्री से ऊपर ही रहा और दिन में कड़ी धूप का अहसास लोगों को रहा। फरवरी के आखिरी 12 दिनों में दो दिन का एक पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय रहने का पूर्वानुमान मौसम केन्द्र ने दिया, लेकिन यह भी लगभग सूखा ही निकला। आंकड़ों के मुताबिक नवंबर, दिसंबर और फरवरी में रात का पारा सामान्य से ज्यादा दर्ज हुआ है। जयपुर में हर साल नवंबर के महीने में सर्दियों की शुरूआत होने लगती है। इस साल नवंबर में सर्दी को रफ्तार देने वाले दो सिस्टम बने, लेकिन दोनों ही एक्टिव नहीं हुए। ऐसे में पूरे महीने में एक बार भी रात का तापमान 12 डिग्री से नीचे नहीं आया। वहीं, फरवरी पिछले एक दशक का सबसे गर्म महीना रहा है।