नई 'बीमारी' का नाम है 'ईको एंजायटी', युवाओं में दिखा गंभीर असर!

21वीं शताब्दी की पहली पीढ़ी के बीच हुए जनमत सर्वेक्षण में जलवायु परिवर्तन के दौर में दुख, निराशा और गुस्सा जाहिर किया गया और युवाओं में भविष्य को लेकर गंभीर चिंताएं सामने आईं।
नई 'बीमारी' का नाम है 'ईको एंजायटी', युवाओं में दिखा गंभीर असर!
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सारांश
  • संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण युवाओं में ईको एंजायटी तेजी से बढ़ रही है।

  • 88% युवाओं ने जलवायु में बदलाव महसूस किया है, जबकि 67% ने इसे अपने जीवन पर प्रभावी बताया।

  • सर्वेक्षण में पाया गया कि जलवायु परिवर्तन के कारण युवाओं में चिंता, असहायता और डर की भावनाएं प्रबल हो रही हैं।

संयुक्त राष्ट्र जलवायु कार्यक्रम (यूएनईपी) ने 2024 में जब “नेविगेटिंग न्यू होराइजंस: ए ग्लोबल फोरसाइट रिपोर्ट ऑन प्लेनेटरी हेल्थ एंड ह्यूमन वेलबींग” रिपोर्ट जारी की, तब यह भी चेताया कि दुनियाभर में युवाओं के बीच ईको एंजायटी नाम का संकट तेजी से उभर रहा है। इसे ग्लाइमेट ग्रीफ अथवा जलवायु से संबंधित दुख के रूप में भी परिभाषित किया जाता है। यह नकारात्मक भावना पर्यावरण के क्षरण और जलवायु परिवर्तन से पैदा होने वाले खतरों की उपज है। यूएनईपी की रिपोर्ट ने युवाओं में क्लाइमेट एंजायटी यानी जलवायु से जुड़ी चिंता को “सबकी नजरों के सामने मौजूद संकट” बताया और यह भी चेताया कि यह आने वाली पीढ़ियों पर थोपी जा रही एक भावनात्मक तबाही है।

इस बेचैनी के प्रमाण हर ओर दिखाई देते हैं। डाउन टू अर्थ ने अक्टूबर–नवंबर 2025 में 16 से 25 वर्ष आयु वर्ग यानी 21वीं सदी की पहली पीढ़ी के 300 से अधिक लोगों के बीच एक जनमत सर्वेक्षण किया। इससे स्पष्ट होता है कि ईको एंजायटी कितनी गहराई तक जड़ जमा चुकी है। लगभग 88 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि वे अपने आसपास जलवायु में बदलाव महसूस कर रहे हैं, 67 प्रतिशत ने कहा कि ये बदलाव उनके रोजमर्रा के जीवन और जीवनशैली को पहले ही प्रभावित कर चुके हैं।

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जलवायु परिवर्तनों पर नजर रखने वाले अध्ययनों से संकेत मिलता है कि पिछले 25 वर्षों में जन्मी पीढ़ी ने शायद कभी “सामान्य” जलवायु का अनुभव ही नहीं किया। हीटवेव से लेकर चक्रवातों और बाढ़ तक धरती की हलचल बदल चुकी है। युवा इसे पहले से कहीं अधिक तेजी से महसूस कर रहे हैं।

एथ ज्यूरिच के इंस्टीट्यूट फॉर एटमॉस्फेरिक एंड क्लाइमेट साइंस में वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं संयुक्त राष्ट्र के जलवायु विज्ञान विश्लेषण के प्रमुख लेखक इरिश फिशर के अनुसार, “मौजूदा समय में जलवायु स्टेरॉयड पर रहने वाले खिलाड़ी जैसा रवैया दिखा रही है।”

जलवायु परिवर्तन पर रिपोर्टिंग और शोध करने वाले वैज्ञानिकों व पत्रकारों के अंतरराष्ट्रीय संगठन क्लाइमेट सेंट्रल के वैज्ञानिकों का कहना है कि फरवरी 1986 में और उसके बाद जन्मे किसी भी व्यक्ति ने सामान्य तापमान वाला एक भी महीना नहीं देखा है। तब से हर महीना औसत से अधिक गर्म रहा है।

युवा आखिर जलवायु परिवर्तन की कड़ियों को किन बदलावों से जोड़ते हैं? जनमत सर्वेक्षण में ऐसे नौ लक्षण सूचीबद्ध किए गए थे। युवा असमय मौसम से लेकर बढ़ते तापमान और कीट-पतंगों की बढ़ोतरी जैसे एक से अधिक विकल्प चुन सकते थे। दो-तिहाई से अधिक उत्तरदाताओं ने जलवायु परिवर्तन को अधिक तापमान और असमय गर्मी या वर्षा से जोड़ा। लगभग 40 प्रतिशत ने इसे धुंधले या कोहरे भरे दिनों से जोड़ा, जबकि 36 प्रतिशत ने “खाद्य गुणवत्ता में बदलाव” को जलवायु परिवर्तन की एक बानगी बताया। 38 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने अत्यधिक ठंड को भी जलवायु परिवर्तन का लक्षण माना और 32 प्रतिशत ने कीट-पतंगों में वृद्धि को इससे जोड़ा।

उनके सामने एक सवाल यह था कि क्या जलवायु परिवर्तन का प्रभाव विभिन्न आर्थिक वर्गों पर अलग-अलग पड़ता है? इसके उत्तर में 61 प्रतिशत ने कहा कि इसका असर समाज के सभी वर्गों-अमीर, गरीब और मध्यम वर्ग पर समान रूप से पड़ता है। हालांकि, जो लोग असमान प्रभाव मानते थे, उनमें स्पष्ट सहमति थी कि सबसे अधिक नुकसान गरीबों को होता है।

लैंगिक दृष्टि से राय अधिक एकरूप रही। करीब 90 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि जलवायु परिवर्तन पुरुषों और महिलाओं को समान रूप से प्रभावित करता है।

युवाओं पर इन चिंताओं का भावनात्मक बोझ स्पष्ट तौर पर दिखाई देता है। उत्तरदाताओं से जलवायु परिवर्तन को लेकर अपनी भावनाएं छह विकल्पों में से चुनने को कहा गया। ये विकल्प थे डरा हुआ और उदास, चिंतित, गुस्सा, असहाय, ठगे हुए और उदासीन। उन्हें एक से अधिक विकल्प चुनने की अनुमति थी। सभी भावनाओं को व्यापक समर्थन मिला, जो जलवायु चिंता की गहराई को दर्शाता है। 57 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने खुद को “चिंतित”, 54 प्रतिशत ने “असहाय” और 43 प्रतिशत ने “डरा हुआ और उदास” बताया। कई लोगों ने “गुस्सा” और “ठगे जाने” की भावना भी जाहिर की।

युवाओं में भविष्य को लेकर डर बना हुआ है। लगभग 53 प्रतिशत को आशंका है कि जलवायु परिवर्तन से बीमारियां बढ़ेंगी, एक-तिहाई से अधिक ने खाद्य कमी की आशंका जताई और 45 प्रतिशत को जल संकट का डर है। 94 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण वे अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं। आधे लोगों ने इस मुद्दे पर सरकारी कार्रवाई को “निराशाजनक” बताया।

कुछ विशेषज्ञों का तर्क है कि ऐसी प्रतिक्रियाएं पूरी तरह तर्कसंगत हैं। क्लाइमेट एंजायटी पर एक बड़े अध्ययन की सह लेखिका और बाथ विश्वविद्यालय से जुड़ीं कैरोलिन हिकमैन के अनुसार, “हमारे बच्चों की चिंता पूरी तरह जायज है, क्योंकि वे सरकारों की ओर से जलवायु परिवर्तन पर अपर्याप्त प्रतिक्रिया देख रहे हैं।” उनके अनुसार, बच्चे और युवा दुनियाभर में संगठित हो रहे हैं और सरकारों को अदालत में ले जा रहे हैं, यह तर्क देते हुए कि जलवायु परिवर्तन पर कार्रवाई न करना मानवाधिकारों का उल्लंघन है।

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