ममंग दई, कवयित्री और उपन्यासकार
फोटो सौजन्य: ममंग दई

आबंग कथाओं में प्रकृति का महत्व: आदी समुदाय की अनमोल धरोहर

अक्सर अरुणाचल प्रदेश की कवि-योद्धा के रूप में वर्णित ममंग दई का जीवन और कार्य शांत साहस की मिसाल हैं। पासीघाट में जन्मी ममंग दई ने भारतीय प्रशासनिक सेवा में राज्य की पहली महिला अधिकारी के रूप में अपना करियर शुरू किया था, लेकिन बाद में पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए उन्होंने नौकरशाही छोड़ दी। पद्मश्री और साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित दई का लेखन प्रकृति को उसके मौलिक और प्राचीन रूप में महिमामंडित करता है, जो इस क्षेत्र के परिदृश्यों और परंपराओं में प्राण फूंक देता है। प्रीथा बनर्जी के साथ एक साक्षात्कार में दई इस पर विचार साझा करती हैं कि प्रकृति उनके काम को कैसे आकार देती है और जलवायु संकट के इस दौर में “ माइंडफुलनेस” (सचेत रहना) क्यों आवश्यक है
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Q

आपकी रचनाओं में प्रकृति और मानवीय भावनाएं आपस में गहराई से गुंथी हुई हैं। आपके अनुसार वह किस प्रकार जुड़ी हुई हैं?

A

मेरा अधिकांश लेखन आदि समाज और उस क्षेत्र एवं परंपराओं के बारे में है जिनसे मैं परिचित हूं। उदाहरण के लिए, जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है तो वर्जना (परहेज) की एक अवधि होती है जब परिवार के सदस्य घर से बाहर नहीं निकल सकते। इसके बाद “कुतुंग कुयार” नामक एक अनुष्ठान होता है जिसमें हर कोई नदी पर जाता है। वहां आग जलाई जाती है और हर कोई स्नान कर सकता है, कपड़े धो सकता है और अन्य काम कर सकता है। यह शोक की अवधि के एक हिस्से को पूर्ण विराम देने का कार्य है। ऐसे समय में यह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि प्रकृति और मानवीय भावनाएं कैसे जुड़ी हुई हैं। प्रकृति में रहना दुनिया की सुंदरता के प्रति अपनी आंखें फिर से खोलने के लिए एक उपहार की तरह है। अंत में प्रकृति ही सबसे बड़ी सांत्वना देने वाली है। यह आपको आत्म-चिंतन के लिए प्रेरित करती है। बस एक बहती हुई नदी को देखना उन कई चीजों के बारे में एक गुप्त संदेश प्राप्त करने जैसा है जिनका हम अपने जीवन के किसी न किसी मोड़ पर सामना करते हैं।

मेरी रचनाओं में प्रकृति और मानवीय भावनाओं की बात करें तो इसे समझाना थोड़ा और कठिन है, क्योंकि यहां इसका संबंध मेरे विचारों, स्मृतियों और कल्पना से है और वास्तव में कोई नहीं जानता कि कब कौन से जुड़ाव और आत्मीयता उभर कर सामने आ जाए।

Q

आपकी मातृभाषा आदी मुख्य रूप से एक बोलचाल की भाषा है। इस भाषा में प्रकृति या प्रकृति के पारंपरिक ज्ञान को किस प्रकार सहेजा जाता है या उसके बारे में कैसे चर्चा की जाती है और आपके समुदाय में प्रकृति का क्या महत्व है?

A

हमारे आदी समुदाय में “आबंग” नामक महाकाव्य कथाएं हैं। मूल रूप से अनुष्ठानिक भाषा (प्राचीन आदी भाषा) में गाए जाने वाले “आबंग” का सरलतम अर्थ एक कहानी है या एक “मिरी” द्वारा दर्शकों के सामने की जाने वाली कहानी सुनाने की क्रिया है। मिरी एक ओझा या पुजारी होता है, जो जनजाति के इतिहास में अच्छी तरह पारंगत होता है। यह कविताओं के माध्यम से ब्रह्मांड की शुरुआत, पौधों और जानवरों के जन्म व मनुष्य के शुरुआती जीवन का एक दस्तावेजीकरण है। इन सभी कहानियों में हमें प्राकृतिक दुनिया के बारे में बताने के लिए कुछ न कुछ है और ये पर्यावरण के साथ एक घनिष्ठ और जीवंत संबंध का समर्थन करती हैं। बेशक, आबंग की भाषा की कई अलग-अलग व्याख्याएं हैं। जो लोग दूर-दराज के गांवों में रहते हैं और जिनका अस्तित्व अपने परिवेश के साथ सह-अस्तित्व पर निर्भर है, उनका प्रकृति के प्रति दृष्टिकोण काफी व्यावहारिक है। जब आप जंगल के सहारे अपना जीवन बिताते हैं तो यह एक निरंतर संघर्ष होता है। आदी भाषा में हमारे पास प्रकृति के लिए कोई समानार्थक शब्द नहीं है। पृथ्वी-जल, सूर्य-चंद्रमा, पशु-पक्षी जैसी अवधारणाएं अवश्य हैं और पर्यावरण का अर्थ वह स्थान है जहां हम हैं, जो उस परिवेश का एक हिस्सा है।

Q

पिछले कुछ वर्षों में आपके गृहनगर के प्राकृतिक परिवेश में किस तरह के बदलाव आए हैं? क्या इन बदलावों ने आपको और आपके समुदाय को प्रभावित किया?

A

मेरा गृहनगर पासीघाट उस समय से बहुत बदल गया है, जब हम इसे एक उबाऊ जगह के रूप में जानते थे जहां हमें अपनी स्कूल की छुट्टियां बिताने के लिए बेमन से आना पड़ता था। मेरे दादा-दादी के घर के पास एक छोटी धारा बहती थी और यह आनंद का वह अकेला स्थान था जहां हम खेलने और छोटी मछलियां और केकड़े पकड़ने जाते थे।

अब वह धारा गायब हो चुकी है। अधिकांश बड़ी धाराओं का आकार भी घट गया है। पुराने लोग इसका वर्णन करने के लिए “दुजित” शब्द का प्रयोग करते हैं। यह कहने का एक तरीका है कि हमने अत्यधिक अतिक्रमण के साथ नदी को “सुखाकर उस पर कब्जा” कर लिया है। मुझे कभी-कभी लगता है कि पासीघाट शहर (जो अब एक स्मार्ट सिटी है) की कहानी पूरी तरह से पानी के बारे में है। इसकी शुरुआत प्रवासन और बेड़ों में नदी पार करने की कहानियों से होती है। इसकी शुरुआत सियांग नदी के तट पर आदी कुलों का बसने से होती है। इसके बाद अंग्रेजों का प्रवेश, सियांग के किनारे होने वाले युद्ध, भूकंप-बाढ़ की कहानियां और अब सियांग घाटी में विशाल बांध की योजनाएं।

साथ ही, कई बड़ी नदियों पर नए पुलों और निश्चित रूप से, ब्रह्मपुत्र नदी पर बोगीबील पुल और भूपेन हजारिका सेतु के साथ प्रमुख बुनियादी ढांचे के विकास ने पासीघाट को साहसिक पर्यटन के लिए एक सुलभ गंतव्य और राज्य का एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और बौद्धिक केंद्र बना दिया है।

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यदि आपको अपने उपन्यासों या कविता संग्रहों में से किसी एक को चुनना हो जो सीधे तौर पर पर्यावरण के क्षरण या पर्यावरण-चिंता के डर से पैदा हुआ है, तो आप किसे चुनेंगी और क्यों?

A

मैं “एस्केपिंग द लैंड” का जिक्र करना चाहूंगी जो 2024 में स्पीकिंग टाइगर द्वारा प्रकाशित हुआ है। मैंने इसे काफी साल पहले शुरू किया था जब मैं उग्रवाद से जुड़ी कहानियों को कवर करने वाली एक पत्रकार थी। मुझे तब महसूस हुआ कि पूरे राज्य में लकड़ी के कारोबार से होने वाली भारी कमाई न केवल जंगलों के विशाल हिस्सों को नष्ट कर रही थी, बल्कि हमारे राज्य में कथित “स्पिल-ओवर उग्रवाद “” (पड़ोसी क्षेत्रों से फैलने वाला उग्रवाद) को भी हवा दे रही थी।

Q

लगातार गर्म होती इस दुनिया में जहां व्यक्ति पर स्थायी और टिकाऊ रूप से जीने का इतना अधिक दबाव है, आप स्वयं को सचेत कैसे रखती हैं?

A

मैं सुबह उठती हूं और अपने बगीचे के बारे में सोचती हूं कि शायद रात भर में कोई नया फूल खिल गया हो। मुझे लगता है कि सचेत रहने का अर्थ है, तमाम छोटी-छोटी चीजों पर ध्यान देना। मैं भोजन बर्बाद न करने, स्थानीय और मौसमी फल-सब्जियां खरीदने, प्रसंस्कृत भोजन पर अत्यधिक खर्च न करने और चीजों का भंडार न लगाने के बारे में सोचती हूं। सचेत रहने का अर्थ खुद को किसी भी चीज में बहुत अधिक हस्तक्षेप करने से रोकना भी है। पहले मुझे लगता था कि मेरी मां सब कुछ गलत कर रही हैं, वह खाद का उपयोग नहीं करती थीं और ढेरों लिलियों को हर तरह के अन्य पौधों के साथ लगा देती थीं। अब मैं देखती हूं कि पौधों की अपनी आत्मीयता और पसंद होती है। उन्हें साझा जगह पसंद हो भी सकती है और नहीं भी। यदि मैं उन्हें अधिक धूप के लिए यहां-वहां हटाती रहूं या उन्हें वह खाद देती रहूं जो मुझे लगता है कि उनके लिए अच्छी होगी तो वे मुरझाकर मर जाते हैं। यह बहुत अधिक हस्तक्षेप है। बेहतर यही है कि धैर्य रखा जाए और चीज को उनके हाल पर छोड़ दिया जाए।

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