‘अल नीनो का बदलता चेहरा’

इंपीरियल कॉलेज लंदन में सेंटर फॉर एनवायरमेंट पॉलिसी की रिसर्च एसोसिएट मरियम जकारिया के साथ अक्षित संगोमला की बातचीत
‘अल नीनो का बदलता चेहरा’
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गर्मी और उससे जुड़े जलवायु परिवर्तन का अल नीनो घटनाओं पर क्या प्रभाव पड़ रहा है? इनकी तीव्रता बढ़ी है या घटी है?

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आईपीसीसी एआर6 के मुताबिक, अल नीनो-सदर्न ऑसिलेशन समेत ज्यादातर बड़े जलवायु पैटर्न में ऐसे लंबे समय के बदलावों के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिले हैं, जिन्हें प्राकृतिक जलवायु उतार-चढ़ाव से अलग करके देखा जा सके। निकट भविष्य में ईएनएसओ और उससे जुड़े जलवायु प्रभाव मुख्य रूप से प्राकृतिक परिस्थितियों से ही प्रभावित रहेंगे। हालांकि, लंबे समय में ईएनएसओ से जुड़ी वर्षा में उतार-चढ़ाव बढ़ने की आशंका है। इसका मतलब है कि भविष्य में अल नीनो और ला नीना घटनाओं का कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा या सूखे जैसी चरम मौसमी घटनाओं पर ज्यादा असर पड़ सकता है।

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वैज्ञानिक अल नीनो जैसी प्रमुख प्राकृतिक जलवायु घटनाओं पर जलवायु परिवर्तन के असर को कैसे मापते और ट्रैक करते हैं?

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वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन के असर को समुद्र सतह तापमान, वायुमंडलीय परिसंचरण और अल नीनो तथा ला नीना घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता में होने वाले बदलावों का अध्ययन करके मापते और ट्रैक करते हैं। इसके लिए वे अवलोकन किए गए आंकड़ों के साथ-साथ अलग-अलग गर्म परिदृश्यों पर आधारित जलवायु मॉडल सिमुलेशन का इस्तेमाल करते हैं। कुछ अध्ययन संकेत देते हैं कि मानव-जनित गर्मी ईएनएसओ के व्यवहार को प्रभावित कर रही है और हाल के दशकों में अल नीनो घटनाओं की आवृत्ति बढ़ा सकती है। हालांकि, ईएनएसओ पर प्राकृतिक आंतरिक उतार-चढ़ाव का भी असर होता है, जिससे स्पष्ट निष्कर्ष निकालना मुश्किल हो जाता है। उदाहरण के तौर पर, हाल में किए गए एक बड़े मॉडलिंग अध्ययन में पाया गया कि 1960 के दशक के बाद बहुवर्षीय ला नीना घटनाओं में हुई वृद्धि मुख्य रूप से प्राकृतिक आंतरिक उतार-चढ़ाव के कारण थी, जबकि बाहरी कारकों की भूमिका सीमित रही।

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क्या मौजूदा जलवायु मॉडल यह अनुमान लगाने में सक्षम हैं कि 1.5 डिग्री सेल्सियस या दो डिग्री सेल्सियस से अधिक गर्म दुनिया में अल नीनो कैसे व्यवहार करेगा?

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भविष्य की गर्म दुनिया में अल नीनो घटनाओं में होने वाले बदलावों का अनुमान लगाने के लिए जलवायु मॉडल अहम उपकरण हैं। हालांकि, उष्णकटिबंधीय प्रशांत की जलवायु प्रणाली की कई महत्वपूर्ण विशेषताओं (जैसे वायुमंडलीय परिसंचरण पैटर्न और समुद्र सतह तापमान के वितरण) को लेकर इन मॉडलों में अब भी त्रुटियां मौजूद हैं। इसी वजह से अलग-अलग मॉडल विभिन्न क्षेत्रों में अल नीनो के टेली-कनेक्शन प्रभावों को अलग-अलग तरीके से दिखाते हैं। इससे यह साफ होता है कि भविष्य के अनुमानों को अधिक सटीक बनाने के लिए जलवायु मॉडलों में सुधार और इस विषय पर ज्यादा शोध की जरूरत है।

Q

अल नीनो पर बढ़ती गर्मी के असर के कौन से पहलू अब भी ज्यादा शोध की मांग करते हैं?

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अब भी यह स्पष्ट नहीं है कि भविष्य में अल नीनो घटनाएं अधिक शक्तिशाली होंगी या अधिक बार होंगी। वैज्ञानिक यह भी पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं कि इनके स्थानिक पैटर्न कैसे बदलेंगे व दुनिया के अलग-अलग हिस्सों पर इनके प्रभाव कैसे बदल सकते हैं। इन सवालों के जवाब के लिए लंबे और अधिक विश्वसनीय अवलोकन रिकॉर्ड, कम त्रुटियों वाले उन्नत जलवायु मॉडल, प्राकृतिक जलवायु उतार-चढ़ाव की बेहतर समझ और उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में महासागर-वायुमंडल के जटिल फीडबैक तंत्रों पर गहरा अध्ययन जरूरी है। आईपीसीसी रिपोर्ट के अनुसार, भविष्य में ईएनएसओ से जुड़ी वर्षा में उतार-चढ़ाव बदल सकते हैं।

हालांकि, इन बदलावों की तीव्रता और उनका क्षेत्रीय वितरण अब भी अनिश्चित बना हुआ है। कुछ क्षेत्रों में सूखे की स्थिति अधिक गंभीर हो सकती है, जबकि दूसरे क्षेत्रों में बाढ़ की घटनाएं ज्यादा बार हो सकती हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि अल नीनो और ला नीना दोनों चरणों के दौरान उष्णकटिबंधीय प्रशांत क्षेत्र में वर्षा पट्टियों की स्थिति और तीव्रता में भी बदलाव आ सकता है। ये बदलाव तूफानों के रास्तों, चक्रवातों के व्यवहार और क्षेत्रीय माॅनसूनी प्रणालियों को ऐसे तरीकों से प्रभावित कर सकते हैं, जिन्हें अभी पूरी तरह समझा नहीं गया है। माइकल मैकफेडेन के अनुसार, ईएनएसओ और उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के बीच संबंधों को समझना अब भी जलवायु विज्ञान की बड़ी चुनौतियों में शामिल है। उनका कहना है कि गर्म होता वायुमंडल और महासागर, चक्रवातों और तूफानों से जुड़ी अत्यधिक वर्षा की घटनाओं को और अधिक तीव्र बना सकते हैं, भले ही कुल तूफानों की संख्या बहुत ज्यादा न बढ़े। इसी वजह से वैज्ञानिक संवेदनशील क्षेत्रों में मजबूत जलवायु अनुकूलन प्रणालियों, प्रारंभिक चेतावनी तंत्रों और टिकाऊ बुनियादी ढांचे की जरूरत पर जोर दे रहे हैं। बेहतर पूर्वानुमान और तैयारी भविष्य की चरम अल नीनो घटनाओं के दौरान खाद्य सुरक्षा, जल प्रणालियों, सार्वजनिक स्वास्थ्य व आजीविका पर पड़ने वाले जोखिमों को कम करने में मदद कर सकती है।

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