

जलवायु परिर्वन भारतीय शहरों की गर्मी को और बढ़ा रहा है। इससे सार्वजनिक स्वास्थ्य, ऊर्जा प्रणाली और कुल मिलाकर रहने की जगह को खतरा पैदा हो रहा है।
यूनाइटेड नेशंस एनवायरनमेंट प्रोग्राम (यूएनईपी) का अनुमान है कि 2100 तक कई शहरों में तापमान 4 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाएगा। इस प्रकार की चुनौतियां विशेषकर गर्म और सूखी जलवायु क्षेत्र में बहुत अधिक पाई जाती है, जहां गर्मियों का आधार तापमान पहले से ही 45 डिग्री सेल्सियस से अधिक होता है।
राजस्थान के शहरी इलाके इस समस्या की वास्तविकता को दिखाते हैं। ध्यान रहे कि जयपुर का औसत सालाना तापमान हर दशक में 0.53 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है। यह विश्व के औसत 0.2 डिग्री सेल्सियस से दोगुना से भी अधिक है और यही नहीं गर्मी के तनाव वाले दिनों की संख्या में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यहां के शहरों में अब नियमित तौर पर हर साल तनाव वाले दिनों की संख्या 40 से 50 तक बल्कि यह कहना अधिक मुनासिफ होगा कि ऐसे दिनों की संख्या और अधिक हो जाती है, जबकि 1990 से 2010 तक ऐसे दिनों की संख्या 20 से 30 तक ही सीमित थी।
बिना किसी संरचनात्मक दखल के अधिक तापमान एयर-कंडीशनिंग को अधिकाधिक अपनाने पर मजबूर करता है, जिसके कारण एसी से गर्मी निकलती है, जो कि शहरी हीट आइलैंड इफेक्ट को और प्रभावी बनाता है और कूलिंग की मांग को और बढ़ा देता है। यह एक खतरनाक और भविष्य में और अधिक मजबूत होने वाला एक कुचक्र है।
दिल्ली स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) ने जयपुर के लिए एक इंटीग्रेटेड शहरी कूलिंग फ्रेमवर्क बनाया है। ध्यान रहे कि वर्तमान में जयपुर के 250 वार्ड गर्मी के अलग-अलग स्तर का सामना करते हैं, जो मुख्य रूप से जमा हुई डेंसिटी, ग्रीन-ब्लू इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी और उससे जुड़ी इंसानों की अन्य गतिविधियों की वजह से होता है। जयपुर के लगभग 13 प्रतिशत वार्ड अधिक और बहुत अधिक गर्मी वाले क्षेत्र (क्षेत्र 4 और 5) में गिने जाते हैं। इसके अलावा 35 प्रतिशत मध्यम-उच्च क्षेत्र 3 में हैं और 48 प्रतिशत मध्यम-निम्न क्षेत्र 2 में गिने जाते हैं।
सीएसई का अनुमान है कि जयपुर में रेजिडेंशियल स्पेस कूलिंग 2037 तक लगभग तीन गुना हो जाएगी। जो अभी के 636 एमयू से बढ़कर लगभग 1,700 एमयू हो जाएगी। प्रोजेक्शन में इंडिया के कूलिंग एक्शन प्लान 2019 से एसी पेनिट्रेशन रेट को सोशियो-इकोनॉमिक वेरिएबिलिटी मॉडल के साथ मिलाया गया। दोनों को फाइनल डिमांड एस्टीमेट बनाने के लिए नॉर्मलाइज किया गया। कमर्शियल कूलिंग डिमांड 2037 तक एक्स्ट्रा 800 एमयू तक पहुंचने का अनुमान है, जिससे शहर के एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर पर बहुत अधिक दबाव पड़ेगा।
जैसे-जैसे जयपुर 2037 तक कूलिंग की मांग में तीन गुना बढ़ोतरी का सामना करेगा, अधिक ऊर्जा खपत वाले एयर कंडीशनिंग का इस्तेमाल जारी रखने से ग्रिड पर दबाव और बढ़ेगा साथ ही उत्सर्जन में बढ़ोतरी होगी और साथ ही थर्मल से जुड़ी असमानताएं और गहरी होंगी। हालांकि एक एकीकृत ढांचा इस चक्र को तोड़ता है, क्योंकि यह कूलिंग को एक विलासिता की वस्तु मानने के बजाय एक जरूरी शहरी बुनियादी ढांचे के तौर पर देखता है। इस ढांचे का हर स्तर, दूसरे स्तर को मजबूत करता है। पैसिव डिजाइन इमारतों के स्तर पर गर्मी को अंदर आने से रोकता है और ग्रीन-ब्लू इंफ्रास्ट्रक्चर आसपास के तापमान को कम करता है, नवीकरणीय ऊर्जा स्वच्छ बिजली की सप्लाई करती है और वेस्ट हीट रिकवरी से ऊर्जा का चक्रीय प्रवाह बनता है। इन सभी उपायों के कुल लाभ, अलग-अलग स्तर पर किए जाने वाले लाभों के कुल योग से कहीं अधिक होता है।
जयपुर का उदाहरण दिखाता है कि तापीय संवेदनशीलता का गहन मूल्यांकन और मांग का अनुमान लगाने से ऐसे उपाय किए जा सकते हैं जो लक्ष्य को पूरा करने वाले और समानता पर आधारित हों। हालांकि, सफलता के लिए इमारतों से जुड़े नियमों, शहरी नियोजन, साफ ऊर्जा प्रणालियों, स्थानीय संसाधनों के प्रबंधन और शहरी डिजाइन के क्षेत्रों के बीच समन्वय के साथ काम करना आवश्यक है।