

बढ़ता तापमान मोनार्क तितलियों की परजीवी संक्रमण सहन क्षमता घटाता है और बीमारियों का खतरा बढ़ाता है
ओई परजीवी संक्रमण 2002 के बाद तेजी से बढ़ा और मोनार्क तितलियों को लगातार गंभीर नुकसान पहुंचा
उष्णकटिबंधीय मिल्कवीड साल भर उगने से मोनार्क प्रवास रुकता है और परजीवियों को फैलने का अवसर मिलता है
गर्म तापमान में विषैले मिल्कवीड की औषधीय सुरक्षा समाप्त हुई और परजीवी अपेक्षा से अधिक सफल बने
नया अध्ययन बताता है कि जलवायु परिवर्तन भविष्य में मोनार्क तितलियों को लगातार तेजी से और अधिक बीमार करेगा
जलवायु परिवर्तन आज पूरी दुनिया के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुका है। इसका प्रभाव केवल मानव जीवन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं को भी गहराई से प्रभावित कर रहा है। अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ जॉर्जिया (यूजीए) के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक नए शोध से पता चला है कि बढ़ता तापमान मोनार्क तितलियों को एक खतरनाक परजीवी संक्रमण के प्रति और अधिक कमजोर बना रहा है। यह शोध इकोलॉजिकल एंटोमोलोजी नामक वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।
मोनार्क तितलियां और परजीवी संक्रमण
मोनार्क तितलियां ओफ्रियोसिस्टिस इलेक्ट्रोसिरा नामक परजीवी से संक्रमित होती हैं, जिसे संक्षेप में ओई कहा जाता है। इस परजीवी की खोज 1960 के दशक में हुई थी, लेकिन साल 2002 के बाद से इसके संक्रमण के मामलों में तेजी से वृद्धि हुई है। आज स्थिति यह है कि मोनार्क तितलियों में यह संक्रमण तीन गुना से भी अधिक बढ़ चुका है। यह परजीवी तितलियों के पंखों को छोटा कर देता है, उनके वजन को कम करता है और उनके जीवनकाल को भी घटा देता है। साथ ही, यह संक्रमण उनकी लंबी प्रवास यात्रा को पूरा करने की क्षमता को प्रभावित करता है।
संक्रमण सहन करने की क्षमता पर तापमान का असर
इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पाया कि जिन मोनार्क तितलियों को अधिक तापमान में रखा गया, वे परजीवी संक्रमण को सहन करने में लगभग 22 प्रतिशत कम सक्षम थीं। अध्ययनकर्ता के अनुसार, संक्रमण को सहन करने का मतलब यह होता है कि बीमारी शरीर को कितना नुकसान पहुंचाती है। जैसे किसी इंसान को फ्लू होने पर कोई गंभीर रूप से बीमार पड़ सकता है, जबकि किसी को केवल हल्के लक्षण होते हैं। इसी तरह, गर्म वातावरण में संक्रमित मोनार्क तितलियों को अधिक नुकसान झेलना पड़ा।
मिल्कवीड पौधों की अहम भूमिका
मोनार्क तितलियों के जीवन में मिल्कवीड पौधों का बहुत महत्व है। ये तितलियां केवल मिल्कवीड पर ही अंडे देती हैं और उनके कैटरपिलर भी इसी पौधे को खाते हैं। मोनार्क तितलियों की संख्या घटने के बाद कई लोग उन्हें बचाने के लिए अपने बगीचों में मिल्कवीड लगाने लगे हैं। हालांकि, कई बार लोग स्थानीय मिल्कवीड की बजाय गैर-स्थानीय या उष्णकटिबंधीय मिल्कवीड लगा देते हैं, जिससे अनजाने में समस्या बढ़ जाती है।
उष्णकटिबंधीय मिल्कवीड और बढ़ता खतरा
उष्णकटिबंधीय मिल्कवीड उन क्षेत्रों में साल भर उगता रहता है जहां मौसम अधिक ठंडा नहीं होता। इसके कारण मोनार्क तितलियां सर्दियों में प्रवास करना टाल देती हैं या पूरी तरह बंद कर देती हैं। जब तितलियां लंबे समय तक एक ही जगह रहती हैं, तो परजीवियों को फैलने का अधिक मौका मिलता है और संक्रमण तेजी से बढ़ता है।
उष्णकटिबंधीय मिल्कवीड अन्य मिल्कवीड पौधों की तुलना में अधिक विषैला होता है। मोनार्क तितलियां सीमित मात्रा तक इन विषैले तत्वों को सहन कर सकती हैं और उन्हें अपने शरीर में जमा भी कर लेती हैं। पहले माना जाता था कि ये विषैले तत्व परजीवियों से बचाव में मदद करते हैं और गर्म तापमान परजीवियों के लिए नुकसानदायक हो सकता है।
नए अध्ययन के चौंकाने वाले परिणाम
नए शोध में वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला की बजाय प्राकृतिक वातावरण में अध्ययन किया, जहां तापमान दिन-रात के अनुसार बदलता रहता है। संक्रमित और स्वस्थ मोनार्क तितलियों को स्थानीय स्वैम्प मिल्कवीड और ट्रॉपिकल मिल्कवीड पर पाला गया और उन्हें सामान्य तथा अधिक तापमान वाली परिस्थितियों में रखा गया।
शोध के मुताबिक, परिणाम उम्मीद के विपरीत थे। गर्म परिस्थितियों में न तो संक्रमण कम हुआ और न ही विषैले मिल्कवीड से तितलियों को कोई सुरक्षा मिली। अधिकांश तितलियां संक्रमित हो गईं और परजीवी अपेक्षा से अधिक सफल साबित हुए। गर्म तापमान में मिल्कवीड के विषैले तत्व थोड़े बढ़ गए, लेकिन इससे तितलियों का विकास धीमा हो गया और उनकी कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा।
भविष्य के लिए चेतावनी
इस अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि बढ़ता तापमान मिल्कवीड की “औषधीय” भूमिका को कमजोर कर देता है। कई बार तितलियां विषैले तत्वों को शरीर से बाहर निकाल देती हैं, जिससे उन्हें मिलने वाली संभावित सुरक्षा भी खत्म हो जाती है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर तापमान इसी तरह बढ़ता रहा, तो मोनार्क तितलियों में परजीवी संक्रमण और तेजी से फैल सकता है। इसलिए मोनार्क संरक्षण के लिए सही पौधों का चयन और जलवायु परिवर्तन पर नियंत्रण बेहद जरूरी है।