

16वें वित्त आयोग ने सिफारिश की है कि हीट वेव (लू) और आकाशीय बिजली गिरने की घटनाओं को राष्ट्रीय स्तर पर अधिसूचित आपदाओं की सूची में शामिल किया जाए। इसके साथ ही आयोग ने यह भी कहा है कि वर्तमान व्यवस्था को जारी रखा जाए, जिसके तहत राज्यों को एसडीआरएफ की राशि का 10 प्रतिशत तक हिस्सा उन आपदाओं पर खर्च करने की अनुमति है, जो राष्ट्रीय सूची में शामिल नहीं हैं, लेकिन स्थानीय परिस्थितियों में गंभीर मानी जाती हैं।
1 फरवरी 2026 को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने बजट भाषण में कहा कि 17 नवंबर 2025 को 16वें वित्त आयोग ने राष्ट्रपति को अपनी रिपोर्ट सौंपी। संविधान के अनुच्छेद 281 के अनुसार, सरकार को आयोग की सिफारिशों पर की गई कार्रवाई की व्याख्यात्मक ज्ञापन सहित रिपोर्ट संसद में रखनी है। सरकार ने अपनी हिस्सेदारी को 41 प्रतिशत पर बनाए रखने की आयोग की सिफारिश को स्वीकार कर लिया है।
सीतारमण ने कहा, “आयोग की सिफारिश के अनुसार, मैंने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए राज्यों को वित्त आयोग अनुदान के रूप में 1.4 लाख करोड रुपए उपलब्ध कराए हैं। इनमें ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकाय और आपदा प्रबंधन अनुदान शामिल हैं।
अपने रिपोर्ट में वित्त आयोग ने कहा है कि राष्ट्रीय आपदा कोषों के लिए धन तय करते समय आयोग ने पिछले कई वर्षों में आपदा पर हुए वास्तविक खर्च को आधार बनाया है। इसमें 2015-16 से 2023-24 तक का खर्च, 2024-25 के संशोधित अनुमान और 2025-26 के बजट अनुमान शामिल हैं।
इन सभी आंकड़ों को महंगाई के असर को देखते हुए 5 प्रतिशत बढ़ाकर देखा गया। इसके बाद 11 वर्षों के औसत खर्च को 10 प्रतिशत और बढ़ाकर 2026-27 के लिए 14,370 करोड़ रुपए का आवंटन तय किया गया।
राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (एसडीआरएफ) और राज्य आपदा शमन कोष (एसडीएमएफ) के लिए आयोग ने 2026-27 से 2030-31 की अवधि के दौरान कुल 2,04,401 करोड़ रुपए का प्रावधान करने की सिफारिश की है।
राज्यों के लिए अलग-अलग आवंटन का विवरण आयोग की रिपोर्ट में दिया गया है। इस कुल राशि में से 1,55,915.85 करोड़ रुपए केंद्र सरकार का हिस्सा होगा, जबकि 48,485.15 करोड़ रुपये राज्यों को देने का प्रस्ताव है।
केंद्र और राज्यों के बीच खर्च साझा करने का अनुपात गैर-पूर्वोत्तर और गैर-पर्वतीय राज्यों के लिए 75:25 तथा पूर्वोत्तर और पर्वतीय राज्यों के लिए 90:10 तय किया गया है।
आयोग ने यह भी सिफारिश की है कि कुल आपदा कोष का 80 प्रतिशत एसडीआरएफ और 20 प्रतिशत एसडीएमएफ में रखा जाए। इसके तहत एसडीआरएफ के लिए 1,63,521 करोड़ रुपए और एसडीएमएफ के लिए 40,880 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है।
राष्ट्रीय आपदा की सूची
आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक फिलहाल राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (एसडीआरएफ) के तहत जिन आपदाओं को शामिल किया गया है, उनमें चक्रवात, सूखा, भूकंप, आग, बाढ़, सुनामी, ओलावृष्टि, भूस्खलन, हिमस्खलन, बादल फटना, कीट प्रकोप, पाला और शीत लहर शामिल हैं।
इसके अलावा राज्यों को यह अनुमति है कि वे एसडीआरएफ की कुल राशि का 10 प्रतिशत तक हिस्सा उन प्राकृतिक आपदाओं में तत्काल राहत देने के लिए उपयोग कर सकते हैं, जो केंद्र सरकार की अधिसूचित सूची में शामिल नहीं हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर गंभीर मानी जाती हैं।
हालांकि, इसके लिए जरूरी है कि राज्य सरकार ने ऐसी आपदाओं को औपचारिक रूप से अधिसूचित किया हो और उनके लिए स्पष्ट व पारदर्शी नियम और दिशा-निर्देश तय किए गए हों, जिन्हें राज्य कार्यकारी समिति की स्वीकृति मिली हो।
हीट वेव को राष्ट्रीय आपदा मानने की बढ़ती मांग
आयोग ने नोट किया है कि अब तक 11 राज्यों ने हीट वेव (लू) को राज्य-विशेष आपदा के रूप में अधिसूचित कर दिया है। इसके अलावा कई राज्यों ने अपने ज्ञापनों में जोर देकर यह मांग उठाई है कि हीट वेव को राष्ट्रीय स्तर पर अधिसूचित आपदाओं की सूची में शामिल किया जाए।
आयोग के अनुसार, अत्यधिक गर्मी का सबसे अधिक असर कमजोर और संवेदनशील आबादी पर पड़ता है। पिछले चार दशकों, यानी 1981 से 2022 के बीच, भारत में बहुत गर्म दिनों की संख्या और उनकी तीव्रता में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। देश में 2013, 2016, 2019, 2022 और 2024 के दौरान गंभीर हीट वेव दर्ज की गईं।
पिछले एक दशक में बहुत गर्म रातों की संख्या में भी साफ तौर पर बढ़ोतरी हुई है। ऐसी रातों में इंसान का शरीर दिन की तेज गर्मी से उबर नहीं पाता, जिससे लू और हीट स्ट्रोक जैसी बीमारियों का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो और गृह मंंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2018 से 2022 के बीच भारत में गर्मी या लू के कारण कुल 3,798 मौतें दर्ज की गई हैं।
आकाशीय बिजली: तेजी से बढ़ता जानलेवा खतरा
हीट वेव की तरह ही, आकाशीय बिजली गिरने की घटनाओं का खतरा भी देशभर में तेजी से बढ़ रहा है, जिसे अब राष्ट्रीय आपदा के रूप में मान्यता देना बेहद जरूरी होता जा रहा है। आयोग ने मौसम विज्ञान विभाग के सहयोग से जारी वार्षिक लाइटनिंग रिपोर्ट (2020-21) का हवाला देते हुए बताया, देशभर में आकाशीय बिजली गिरने की घटनाओं में 34 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इस अवधि में करीब 1.85 करोड़ बार बिजली गिरने की घटनाएं दर्ज हुईं, जो पिछले साल की तुलना में 47 लाख से अधिक हैं।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े बताते हैं कि भारत में प्राकृतिक कारणों से होने वाली मौतों में आकाशीय बिजली सबसे बड़ा कारण बन चुकी है। सिर्फ 2022 में ही प्राकृतिक आपदाओं से हुई कुल 8,060 मौतों में से 2,887 मौतें (35.8 प्रतिशत) आकाशीय बिजली के कारण हुईं।
आयोग ने कहा है कि अब राष्ट्रीय आपदा सूची में लू व आकाशीय बिजली को भी शामिल किया जाना चाहिए।