फिल्ममेकर और प्रोड्यूसर किरण राव
फोटो सौजन्य: किरण राव

“आसान नहीं है पर्यावरण के अनुकूल जीवन”

फिल्ममेकर और प्रोड्यूसर किरण राव सामाजिक सरोकारों को मुख्यधारा की फिल्मों में प्रभावी ढंग से पेश करने में माहिर हैं। उनकी शुरुआती फिल्म धोबी घाट हो या हालिया फिल्म “लापता लेडीज” व “ह्यूमन्स इन द लूप” देख कर यह बात साफ तौर पर कही जा सकती है। वर्ष 2016 में राव ने आमिर खान के साथ पानी फाउंडेशन की स्थापना की, जो महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित किसानों को जलवायु संकट के प्रति सक्षम व आत्मनिर्भर बनाने के लिए काम करने वाला एक गैर लाभकारी संगठन है। प्रीथा बनर्जी को दिए गए एक साक्षात्कार में राव बताती हैं कि अब तक के उनके सफर ने प्रकृति के प्रति उनकी समझ को किस तरह गहराई दी है और यह अनुभव उनके रचनात्मक काम को कैसे प्रभावित करता रहा है।
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Q

पर्यावरण और सामाजिक मुद्दों के प्रति आपकी जागरुकता की शुरुआत कैसे हुई और समय के साथ यह समझ कैसे विकसित हुई ?

A

मेरी जागरुकता धीरे-धीरे स्वाभाविक रूप से विकसित हुई। बचपन में मुझे सबसे ज्यादा खुशी तब मिलती थी, जब मैं प्रकृति के बीच होती, खासकर छुट्टियों के दौरान जब मैं परिवार के साथ हिमालय की ओर जाती थी। उस समय मैं इसे शब्दों में नहीं कह पाती, लेकिन जब बड़ी हुई तो समझ आया कि प्रकृति हमें कितनी गहराई से पोषित करती है। पानी फाउंडेशन की शुरुआत के बाद जब मैंने ग्रामीण भारत की यात्राएं की, तब यह चेतना विकसित हुई कि सब कुछ आपस में जुड़ा हुआ है। पेड़, पानी और प्राकृतिक संसाधनों की देखभाल सीधे हमारे जीवन, परिवार की सुरक्षा और यहां तक कि हमारी खुशहाली से जुड़ी है। सूखे के असर को कम करने और किसानों की आजीविका बेहतर बनाने के अपने काम के दौरान मैंने नजदीक से देखा कि जलवायु परिवर्तन कोई दूर की या सैद्धांतिक बात नहीं है। यह बिल्कुल वास्तविक है। किसानों की जिंदगी में, सूखे कुओं में और जंगलों के खत्म होने में यह साफ दिखाई देता है। इस अनुभव ने मेरी समझ को और गहरा किया। तब मुझे अहसास हुआ कि पर्यावरण के प्रति जागरुकता सिर्फ एक व्यक्तिगत भावना नहीं, बल्कि एक सामाजिक और सामूहिक जिम्मेदारी है।

Q

टिकाऊ जीवनशैली अपनाना आसान नहीं है। ऐसे विकल्प चुनते समय आपको किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है?

A

मैं सादा जीवन जीने की कोशिश करती हूं। मैं पानी के इस्तेमाल को लेकर बहुत सजग रहती हूं। हमारे घर में जितना हो सके, पानी दोबारा इस्तेमाल किया जाता है। हमारे यहां कचरे से खाद बनाना, सिंगल यूज प्लास्टिक से मना करना, स्थानीय व मौसमी भोजन पर जोर दिया जाता है। ये बातें छोटी लगती हैं, लेकिन मिलकर बड़ा असर डालती हैं। मैं टिकाऊ फैशन को भी प्राथमिकता देती हूं और स्थानीय डिजाइनरों व कलाकारों का समर्थन करती हूं। फिल्म निर्माण के दौरान हम सजग रहने की कोशिश करते हैं। यह असल में हमारी सोच और संवेदनशीलता से जुड़ा है। हमें सबसे पहले खुद से पूछना चाहिए कि मेरे काम से दुनिया को क्या संदेश जा रहा है? मैं किन मूल्यों को आगे बढ़ा रही हूं? ऐसे सवाल हमें जिम्मेदारी से काम करने के लिए प्रेरित करते हैं। यह हमेशा सुविधाजनक नहीं होता। हर बार कचरा अलग करना या पर्यावरण के लिए बेहतर विकल्प चुनना आसान नहीं होता। कहीं लागत की समस्या होती है, कहीं सुविधाओं की कमी और कहीं आदतों का सवाल। मेरा मानना है कि जिन लोगों के पास बेहतर विकल्प चुनने की सुविधा है, उन्हें ऐसा जरूर करना चाहिए। हम सुविधा के आदी हो चुके हैं। आदत बदलने में मेहनत लगती है। यह मुश्किल जरूर है, लेकिन असंभव नहीं। हालांकि अपने कार्बन फुटप्रिंट को लेकर मुझे अभी लंबा रास्ता तय करना है, पर मैं रोज बेहतर करने की कोशिश करती हूं।

Q

क्या पर्यावरण को लेकर आपकी समझ ने फिल्म, थिएटर या लेखन में आपके काम करने के तरीके या आपके द्वारा चुने जाने वाले प्रोजेक्ट्स को प्रभावित किया है?

A

हां, बिल्कुल। शायद यह प्रभाव सीधे तौर पर नजर न आए, लेकिन दुनिया को देखने की मेरी नजर जरूर बदली है। मैं अब ऐसी कहानियों की ओर ज्यादा आकर्षित होती हूं जो लोगों, जगहों और रिश्तों से गहराई से जुड़ी हों। जो जमीनी और सजीव महसूस हों। मुझे सच्चाई से भरे किरदार पसंद हैं, जो अपने आसपास के माहौल व पर्यावरण के संदर्भ में मौजूद हों। जिस अगली फिल्म पर मैं काम कर रही हूं, वह पर्यावरणीय चेतना व जीवन के आपसी जुड़ाव की भावना पर आधारित है। कहानी की ताकत बहुत बड़ी होती है। यह हमें ज्यादा संवेदनशील, समझदार और संतुलित बना सकती है। यही बात मैं हमेशा याद रखने की कोशिश करती हूं, चाहे वह कोई बड़ी फिल्म हो या कोई छोटा रचनात्मक प्रोजेक्ट।

Q

आप पानी फाउंडेशन की सह संस्थापक हैं। यह सफर कैसा रहा और आपके लिए इसका क्या महत्व है?

A

यह मेरे जीवन की सबसे गहरी और आनंददायक यात्राओं में से एक रहा। जब हमने पानी फाउंडेशन की शुरुआत की तो हम जानते थे कि यह दान का काम नहीं है, बल्कि लोगों को अपने भविष्य की जिम्मेदारी खुद संभालने में सक्षम बनाने की कोशिश है। शुरुआती सोच बहुत सरल थी। समुदायों को प्रेरित और संगठित करना, जल-संरक्षण और वाटरशेड प्रबंधन का विज्ञान समझाना और एक साझा लक्ष्य के लिए लोगों को एक साथ लाना। हमने इस प्रक्रिया को उत्सव जैसा बनाने की कोशिश की, इसलिए ‘वाटर कप’ नाम की प्रतियोगिता शुरू की, ताकि सूखे की मार झेल रहे लोगों में उत्साह और सकारात्मकता बनी रहे। हमें अंदाजा नहीं था कि यह प्रक्रिया इतनी परिवर्तनकारी साबित होगी। जिन गांवों में लोग वर्षों से एक-दूसरे से बात नहीं करते थे, वहां वे कंधे से कंधा मिलाकर काम करने लगे। महिलाओं ने अद्भुत नेतृत्व दिखाया। जमीन बदली, लेकिन उससे भी ज्यादा लोग बदले। मैंने अपनी कक्षाओं में जितना नहीं सीखा, उससे कहीं ज्यादा अपने ही समुदायों से सीखा। लोगों ने दिखाया कि सामूहिक प्रयास व उम्मीद मिलकर क्या-क्या कर सकते हैं। मेरे लिए पानी फाउंडेशन यह याद दिलाता है कि पर्यावरणीय बदलाव असल में इंसानी व्यवहार में बदलाव से आता है। यह सामाजिक एकता, सहयोग और जज्बे की कहानी है।

Q

आपने अक्सर कला को सामाजिक मुद्दों को सामने लाने का माध्यम बनाया है। आज के समय में आपको किस तरह की कहानियों की जरूरत ज्यादा लगती है?

A

कहानियां यह तय करती हैं कि हम दुनिया को कैसे देखते हैं। हम किन बातों को महत्व देते हैं, किसके साथ खड़े हैं और खुद को इस बड़े पारिस्थितिकी तंत्र में कहां रखते हैं। मेरा मानना रहा है कि पर्यावरण के प्रति जागरुकता, इंसानी चेतना से अलग नहीं है। हम धरती के साथ जैसा व्यवहार करते हैं, वही रवैया अक्सर एक-दूसरे के साथ भी करते हैं। जैसे कि हम इंसानों के प्रति लगाव रखते हैं तो पर्यावरण के प्रति भी रखेंगे और यदि उदासीनता का रवैया रखते हैं तो दोनों के साथ ऐसा करते हैं।

इसी सोच ने मुझे हाल ही में फिल्म “ह्यूमन इन दी लूप” से जोड़ा, जिसके निर्देशक अरण्य सहाय हैं और मैं एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर हूं। यह फिल्म एक आदिवासी महिला की कहानी है, जो एक एआई (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) मॉडल को प्रशिक्षित करने के लिए डेटा लेबलर के रूप में काम करती है। ऊपर से देखने पर यह काम प्रकृति से पूरी तरह अलग लग सकता है, लेकिन इसके भीतर टूटते रिश्तों की एक गहरी कहानी छिपी है। फिल्म में दिखाया गया है कि तकनीक किस तरह आदिवासी ज्ञान प्रणालियों और सांस्कृतिक संदर्भों को नजरअंदाज कर सकती है। “ प्रगति” के नाम पर कैसे जमीन से सबसे ज्यादा जुड़े लोगों को हाशिए पर धकेला जाता है और हम विकास की दौड़ में अपनी सांस्कृतिक और पर्यावरणीय जड़ों को खो सकते हैं।

आज हमें ऐसी ही कहानियों की जरूरत है। जरूरी नहीं कि वे बोझिल या उपदेशात्मक “इश्यू फिल्में ” हों। वे मानवीय कहानियां हो सकती हैं, जो यह दिखाएं कि हमारी दुनिया आपस में कितनी गहराई से जुड़ी हुई है। पानी फाउंडेशन में हम जो लघु फिल्में बनाते हैं, उनमें भी यही कोशिश रहती है कि ऐसी कहानियां कहें जो हमें याद दिलाएं कि हम प्रकृति से बाहर नहीं हैं, बल्कि उसी का हिस्सा हैं।

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