कल्कि केकलां , अभिनेत्री | लेखिका
फोटो सौजन्य: कल्कि केकलां

“टिकाऊ जीवन जीना सजा नहीं”

चाहे फिल्में हों, नाटक हो, पॉडकास्ट हो या फिर वेबसीरीज कल्कि केकलां अपने अलग और बेबाक चुनावों के लिए लंबे समय से पहचानी जाती रही हैं। अपने रचनात्मक काम से परे उनका प्रकृति से गहरा जुड़ाव उन्हें उपभोग के लिए सतर्क और व्यवस्था में बदलाव की वकालत की ओर ले जाता है। प्रीथा बनर्जी से बातचीत में कल्कि अपनी पर्यावरणीय चेतना की जड़ों, व्यक्तिगत और कॉरपोरेट जिम्मेदारी के बीच के तनाव और सांस्कृतिक कल्पना को बदलने में कहानी कहने की भूमिका पर बात करती हैं
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Q

आप अक्सर सजग तरीके से जीने और प्रकृति से जुड़े रहने की बात करती हैं। इस सोच की शुरुआत कैसे हुई और यह कैसे विकसित हुई?

A

मैं सौभाग्यशाली थी कि मेरा बचपन प्रकृति और वन्यजीवों के बीच बीता। मैं नीलगिरि में मुदुमलाई अभयारण्य के पास रहती थी, जहां हाथी, भालू, हिरण और जंगली भैंसे देखना आम बात थी। हमारी यात्राएं हमेशा प्रकृति से जुड़ी होती थीं। हम टेंट लगाते थे, ट्रेकिंग करते थे साथ ही नदियों में पैडलिंग करते थे और कयाक चलाना सीखते थे। बचपन से ही मुझे यह सिखाया गया कि जहां जाएं, वहां कोई निशान न छोड़ें, खासकर प्लास्टिक पीछे न छोड़ें।

मैंने ऑरोविल में भी समय बिताया, जहां टिकाऊ जीवन की एक मजबूत सोच है। वहां मान्यता है कि आप जो भी व्यवसाय करें, उसके जरिए समुदाय को कुछ लौटाएं। लोग अपनी जरूरतों के लिए एक दूसरे पर निर्भर रहते थे, चीजों का आदान-प्रदान होता था और जैविक भोजन उगाने पर खास जोर था। बाद में मैंने इकोफेम का समर्थन किया, जो एक पर्यावरण के प्रति जागरूक संगठन है और दोबारा उपयोग हो सकने वाले सैनिटरी नैपकिन सहित कई उत्पाद बनाता है।

मैं तकनीक के खिलाफ नहीं हूं लेकिन मेरा मानना है कि तकनीकी प्रगति के साथ-साथ इंसान यह भूलता जा रहा है कि वह भी प्रकृति का ही हिस्सा है। बाढ़, सूखा और चरम मौसम की घटनाओं के कारण लोग विस्थापित हो रहे हैं। दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में प्रदूषण की वजह से लोग घर छोड़ने को मजबूर हैं। यह सब प्रकृति की अनदेखी के बहुत वास्तविक नतीजे हैं।

Q

टिकाऊ जीवन की सोच को रोजमर्रा की जिंदगी में कैसे उतारा जा सकता है?

A

इसके दो पहलू हैं। एक तो व्यक्तिगत जिम्मेदारी, जिस पर जरूरत से ज्यादा जोर दिया जाता है, जबकि असल जिम्मेदारी बड़ी कंपनियों की है। लोगों को इस बात के लिए दोषी ठहराया जाता है कि वे खाद नहीं बनाते या प्लास्टिक अलग नहीं करते। जबकि सच्चाई यह है कि हम चाहे प्लास्टिक अलग भी कर लें, आखिरकार उसका बड़ा हिस्सा कचरे के ढेर में ही जाता है। असली समस्या इन चीजों के उत्पादन की है।

फिर भी व्यक्तिगत फैसले मायने रखते हैं, जैसे हम कपड़े, खाना या बाकी सामान कहां से खरीदते हैं। व्यक्तिगत स्तर पर टिकाऊ आदतें भी जरूरी हैं। गोवा में जहां मैं रहती हूं, वहां मैंने एक स्थानीय पहल के लिए अभियान चलाया है, जिसका नाम माका नाका प्लास्टिक्स है। यह समूह दुकानदारों और सब्जी विक्रेताओं के बीच कपड़े के थैले बांटता है, जो स्थानीय महिलाएं फेंके गए कपड़ों से बनाती हैं।

टिकाऊ पर्यटन भी फर्क ला सकता है। पांच सितारा होटलों की बजाय समुदाय के भीतर होमस्टे चुनिए। इसका मतलब यह नहीं कि सब कुछ बेहद सादा हो। आरामदायक और शानदार अनुभव भी टिकाऊ हो सकते हैं। एक सेलिब्रिटी के तौर पर मुझे लगता है कि जिन ब्रांड्स के साथ मैं काम करती हूं, उन्हें प्रभावित करना और उनकी सोच को कुछ हद तक टिकाऊ दिशा में मोड़ना मेरी जिम्मेदारी है।

एक सांस्कृतिक बदलाव भी जरूरी है ताकि टिकाऊ जीवन जीना सजा जैसा न लगे बल्कि खुशी देने वाला अनुभव बने। मेरे लिए और मेरी बेटी सैफो के लिए वीकेंड में झरने के पास जाना किसी मॉल में घूमने से कहीं ज्यादा मजेदार, रोमांचक और प्रेरक है।

Q

मां बनने के बाद पर्यावरण को लेकर आपकी सोच में क्या बदलाव आया?

A

मुझे सैफो के लिए एक गहरी जिम्मेदारी महसूस होती है कि वह ऐसी दुनिया में बड़ी हो, जहां वह समुद्र में गोता लगा सके और समुद्री जीवन देख सके, जो तेजी से खत्म हो रहा है। प्रवाल भित्तियां मर रही हैं। सबसे बड़े फैसलों में से एक था उसके जन्म के बाद गोवा जाना। लॉकडाउन के दौरान हम मुंबई में फंसे थे और पूरे महामारी काल में एक अपार्टमेंट में बंद रहना बहुत कठिन था।

हमें लगा कि हम ऐसी जगह रहना चाहते हैं जहां बगीचा हो और खुली जगह मिले। मुंबई में यह हमारे लिए संभव नहीं था, इसलिए हम गोवा चले गए। मेरे लिए यह चुनौतीपूर्ण रहा है क्योंकि मेरा काम मुंबई में है और मुझे बार-बार आना जाना पड़ता है। लेकिन यह सब सैफो के लिए है। सैफो प्रकृति को ऐसे अनुभव कर पा रही है, जो उसके विकास के लिए जरूरी है।

उसकी पर्यावरणीय समझ अपने आप विकसित हो रही है। उसके वीकेंड समुद्र तट पर, झरनों के पास, ट्रेकिंग करते या पेड़ों पर चढ़ते हुए बीतते हैं। वह हमारे आसपास पौधों को बढ़ते देख रही है, जैसे तुलसी, कड़ी पत्ता और पुदीना। वह जानती है कि कौन से पौधे खाने योग्य हैं और कौन से नहीं और यह भी कि किन इल्ली को छूना नहीं चाहिए।

Q

क्या कहानी कहने का माध्यम सामाजिक और पर्यावरणीय बदलाव ला सकता है? क्या भारतीय फिल्म उद्योग इस दिशा में संवेदनशील हो रहा है?

A

बिल्कुल, कहानी कहने की भूमिका बहुत अहम है। उदाहरण के लिए लियोनार्डो डिकैप्रियो की फिल्म डोंट लुक अप को ही देखिए। यह जलवायु संकट को हास्य के जरिए लेकिन बहुत सटीक ढंग से दिखाती है। यह गंभीर मुद्दे को बड़ी आबादी तक पहुंचाने में मदद करती है।

मुझे याद है कि मैंने सैफो को सोते समय एक कहानी सुनाई थी, जिसमें दक्षिण अमेरिका की एक युवा महिला एक पेड़ पर चढ़कर वहीं रहने लगती है ताकि एक बड़ी कंपनी जंगल को काट न सके। उसने पेड़ पर ही चूल्हा और बिस्तर लगाकर सालों तक वहां डेरा डाले रखा और अंत में मुकदमा जीतकर जंगल बचा लिया। सैफो उस कहानी से बहुत प्रभावित हुई थी।

भारतीय फिल्म उद्योग की बात करें तो मुझे लगता है कि हम अभी खासतौर से पर्यावरण पर प्रभावशाली फिल्में बनाने के मामले में काफी पीछे हैं। उद्योग को अपने कामकाज के पर्यावरणीय असर के प्रति भी ज्यादा सजग होना चाहिए। जंगलों में शूटिंग के बाद कचरा छोड़ जाना मुझे बहुत परेशान करता है। हालांकि, एक सकारात्मक बदलाव यह है कि फैशन और मैगजीन शूट अब ज्यादा सचेत हो रहे हैं। वहां कांच की बोतलें और रीसायकल होने वाली सामग्री दिखने लगी है। फिर भी अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।

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