ऐसा लगता है मानो वसंत कभी आया ही नहीं
जनवरी से फरवरी 2026 तक की सर्दी भारत के अधिकांश हिस्सों में काफी सूखी रही और वर्षा सामान्य औसत से लगभग 60 प्रतिशत कम दर्ज की गई। तापमान भी ज्यादातर क्षेत्रों में अपेक्षाकृत कम ठंडे रहे, हालांकि पूर्वी भारत के कुछ हिस्सों में यह लगभग सामान्य के आसपास बना रहा। यह स्थिति दिसंबर 2025 से अलग थी, जब मध्य, पूर्वी और दक्षिणी भारत के बड़े हिस्सों में सामान्य से ठंडे हालात थे, जबकि उत्तरी भारत में सर्दी उतनी तीखी नहीं थी।
दिसंबर में भी देश के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से कम वर्षा हुई, हालांकि जम्मू कश्मीर के कुछ इलाके इससे अलग रहे। इस वर्ष की एक खास बात यह भी रही कि मार्च के दौरान देश के बड़े हिस्सों में मौसम बहुत तेजी से वसंत से गर्मियों में बदल गया। ऐसा लगा मानो वसंत आया ही नहीं।
भारत में सूखी सर्दियां अक्सर कमजोर या कम संख्या में आने वाले पश्चिमी विक्षोभों से जुड़ी होती हैं। जब ये मौसम तंत्र नहीं आते या सामान्य से कमजोर होते हैं, तो उत्तरी भारत, खासकर हिमालयी और आसपास के पहाड़ी राज्यों में, वर्षा कम हो जाती है और तापमान बढ़ जाता है। हाल के वर्षों में सर्दियों में अक्सर कम वर्षा और पहले की तुलना में कम तीव्र शीत लहरें देखने को मिल रही हैं।
आगे की बात करें तो दुनिया के कई प्रमुख मौसम विज्ञान केंद्र संकेत दे रहे हैं कि इस वर्ष के अंत में अल नीनो की स्थिति बन सकती है। इस समय पूर्वानुमान पूरी तरह सटीक नहीं होते, लेकिन जब संकेत साफ हों तो उन्हें नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। फिलहाल के आंकड़े बताते हैं कि भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर की सतह के नीचे काफी मात्रा में ऊष्मा जमा है। यह अंदर की जमा हुई गर्मी अल नीनो बनने का एक अहम संकेत मानी जाती है।
इसे ऐसे समझा जा सकता है जैसे नीचे से गरम किए जा रहे पानी का एक बर्तन। पहले गर्मी नीचे जमा होती है, फिर धीरे धीरे ऊपर फैलकर सतह को गर्म करती है। ठीक इसी तरह महासागर की सतह के नीचे गर्म पानी इकट्ठा होता है, जो समय के साथ धाराओं के जरिए ऊपर आता है और फैलता है। इसके बाद अल नीनो की स्थिति बनने लगती है।
फिलहाल हालात ऐसे हैं कि महासागर अल नीनो की शुरुआत के लिए तैयार दिख रहा है लेकिन वायुमंडल ने अभी पूरी तरह से प्रतिक्रिया नहीं दी है। अल नीनो को वैज्ञानिक महासागर और वायुमंडल के आपसी जुड़ाव वाली प्रणाली मानते हैं।
सरल शब्दों में कहें तो अल नीनो के पूरी तरह विकसित होने के लिए महासागर और वायुमंडल का साथ-साथ काम करना जरूरी होता है। महासागर में गर्माहट के साफ संकेत दिख सकते हैं, लेकिन वायुमंडल को भी अपने पवनों के पैटर्न और परिसंचरण में ऐसे बदलाव करने होते हैं जो इस गर्माहट को सहारा दें और उसे और बढ़ाएं। जलवायु मॉडल बताते हैं कि आने वाले महीनों में यह गर्माहट और मजबूत होगी और वायुमंडल धीरे धीरे इन महासागरीय बदलावों के अनुसार प्रतिक्रिया देगा।
अमेरिका की नेशनल ओसिएनिक एंड एटॉमस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (एनओएए) के क्लाइमेट प्रेडिक्शन सेंटर के ताजा अनुमान के अनुसार इस वर्ष अल नीनो विकसित होने की संभावना 80 प्रतिशत से अधिक है और लगभग एक तिहाई संभावना यह भी है कि यह एक मजबूत घटना बन सकता है।
खास बात यह है कि इस साल मार्च में जारी संभावनाएं 2023, 2018, 2015 और 2014 के इसी समय जारी अनुमानों की तुलना में काफी अधिक हैं, जबकि उन वर्षों में भी बाद में अल नीनो विकसित हुआ था। इससे संकेत मिलता है कि इस समय प्रशांत महासागर में जो संकेत मिल रहे हैं, वह पहले के कई वर्षों की शुरुआती अवस्थाओं की तुलना में अधिक मजबूत और स्पष्ट हैं।
सच्चाई यह है कि वैश्विक ऊष्मीकरण प्रशांत महासागर समेत कई महासागरीय क्षेत्रों में समुद्र की सतह के तापमान को बढ़ा रहा है। क्योंकि अल नीनो की पहचान समुद्र सतह के तापमान में असामान्य बदलाव से होती है, इसलिए यह पृष्ठभूमि ऊष्मीकरण कभी-कभी इसके संकेत को पहले की तुलना में अधिक जटिल बना देता है। प्राकृतिक जलवायु संकेत को जलवायु परिवर्तन के व्यापक प्रभावों से अलग करने के लिए वैज्ञानिक अब बेहतर तरीकों का उपयोग कर रहे हैं, जिनसे अल नीनो घटनाओं का पता लगाना और उनकी निगरानी करना संभव हो सके और जो दीर्घकालिक महासागरीय ऊष्मीकरण को भी ध्यान में रखते हैं। वर्तमान में समुद्र के भीतर मौजूद ऊष्मा के स्तर और अन्य संकेतकों को देखते हुए यह संभावना कम लगती है कि आने वाला अल नीनो कमजोर होगा। ज्यादा संभावना है कि यह एक मध्यम या यहां तक कि मजबूत घटना में विकसित हो सकता है, हालांकि बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि आने वाले कुछ महीनों में खासकर वायुमंडलीय स्थितियों में किस तरह का बदलाव होता है।
एक मजबूत अल नीनो सामान्य तौर पर भारत में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की वर्षा को कम कर देता है और मौसम को सामान्य से अधिक गरम बना देता है। कुछ जलवायु मॉडल के आकलन अब इस संभावना की ओर संकेत करने लगे हैं। अल नीनो वाले वर्षों से जुड़ी एक और विशेषता यह है कि इस दौरान मॉनसून ब्रेक बढ़ जाते हैं, जो पूरे मौसम के दौरान वर्षा के वितरण को प्रभावित कर सकती है। फिर भी, महीने-दर-महीने प्रभावों को पूरी निश्चितता के साथ समझने के लिए अभी समय जल्दी है। हमें अगले कुछ महीनों में महासागर और वायुमंडल के व्यवहार पर नजर रखनी होगी।
केरल में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून का आगमन कई बार अल नीनो वर्षों में देर से होता है, हालांकि यह हर बार ऐसा नहीं होता। आमतौर पर संभावित आगमन समय का अधिक स्पष्ट संकेत 15 मई के आसपास मिलता है। मानवजनित जलवायु परिवर्तन अब मॉनसून के व्यवहार को तेजी से प्रभावित कर रहा है। इसका एक सबसे स्पष्ट प्रभाव मॉनसून के दौरान वर्षा की बढ़ती अनियमितता है। इसका मतलब है कि बारिश अब छोटे लेकिन तीव्र दौरों में होती है, जिनके बीच लंबे सूखे अंतराल रहते हैं।
अल नीनो वर्षों में यह प्रवृत्ति और तेज हो सकती है, जिससे मॉनसून में लंबे या अधिक बार आने वाले ब्रेक की संभावना बढ़ जाती है, जैसा कि अगस्त 2023 में देखा गया था।
(अक्षय देवरस, यूनाइटेड किंगडम के रीडिंग विश्वविद्यालय में नेशनल सेंटर फॉर एटमॉस्फेरिक साइंस और मौसम विज्ञान विभाग में रिसर्च साइंटिस्ट के तौर पर कार्यरत हैं)


