झीलों की गहराई में बढ़ती लू से जलीय जीवन पर बड़ा खतरा: शोध

गहरे पानी में जलीय प्रजातियों के रहने की जगहें जो कभी सतही लू के दौरान आश्रय प्रदान करते थे, अब कम हो रहे हैं या पूरी तरह से गायब हो रहे हैं।
1980 के बाद से झीलों के सबसे गहरे हिस्सों में चलने वाली लू की आवृत्ति में प्रति दशक सात दिन से अधिक, तापमान में प्रति दशक 0.2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि देखी गई है।
1980 के बाद से झीलों के सबसे गहरे हिस्सों में चलने वाली लू की आवृत्ति में प्रति दशक सात दिन से अधिक, तापमान में प्रति दशक 0.2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि देखी गई है।फोटो साभार: आईस्टॉक
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दुनिया भर में झीलें पारिस्थितिक तंत्र के लिए बहुत जरूरी हैं, ये मीठे या ताजे पानी की आपूर्ति करती हैं, जैव विविधता को बढ़ावा देती हैं और मछलियों व अन्य जलीय प्रजातियों के लिए आवास प्रदान करती हैं।

एक हालिया अध्ययन से पता चलता है कि दुनिया भर की झीलें न केवल सतह पर, बल्कि गहराई में भी गर्म हो रही हैं। झीलों में सतही हीटवेव या लू, जिन्हें सतह के नीचे पानी के अत्यधिक तापमान की अवधि के रूप में परिभाषित किया जाता है, जो कम समय में बार-बार हो रही है और इनकी तीव्रता भी बढ़ रही है।

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1980 के बाद से झीलों के सबसे गहरे हिस्सों में चलने वाली लू की आवृत्ति में प्रति दशक सात दिन से अधिक, तापमान में प्रति दशक 0.2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि देखी गई है।

इन छिपी हुई चरम स्थितियों का झील पारिस्थितिक तंत्र पर गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं। इसके बावजूद इस मुद्दे को नजरअंदाज किया जा रहा है और इसे ठीक से समझा भी नहीं गया है।

नेचर क्लाइमेट चेंज में प्रकाशित शोध में कहा गया है कि झीलों में चलने वाली हीटवेव वायुमंडल या महासागर में होने वाली हीटवेव के समान ही होती हैं। ये गर्मी की अत्यधिक लंबी अवधि होती हैं। अब तक के अधिकतर शोध सतही तापमानों पर आधारित रहे हैं, जहां जलवायु परिवर्तन के कारण हाल के दशकों में पहले से ही अधिक बार और तीव्र लू की घटनाएं हो रही हैं।

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ये सतही घटनाएं झीलों के रासायनिक और भौतिक संतुलन को बिगाड़ सकती हैं, खाद्य जाल को नुकसान पहुंचा सकती हैं और कुछ मामलों में, बड़ी संख्या में मछलियों की मृत्यु का कारण बन सकती हैं।

जलीय प्रजातियां सतही लू के चलते अलग-अलग तरह से प्रतिक्रिया करती हैं। कुछ को फायदा होता है यदि लू उनके पसंदीदा तापमान सीमा का विस्तार करती है। लेकिन कई अन्य, विशेष रूप से वे जो पहले से ही अपनी गर्मी की सीमा के पास रह रहे हैं, उन्हें भारी तनाव का सामना करना पड़ता है।

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1980 के बाद से झीलों के सबसे गहरे हिस्सों में चलने वाली लू की आवृत्ति में प्रति दशक सात दिन से अधिक, तापमान में प्रति दशक 0.2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि देखी गई है।

गर्मियों के दौरान गर्म सतही पानी निचली ठंडी परत के ऊपर होता है, कुछ प्रजातियां गर्मी से बचने के लिए गहरे पानी में चली जाती हैं। लेकिन क्या होता है जब वह गहरी जगहें भी गर्म हो जाती है?

झील में पानी के सतह के नीचे की निगरानी

शोध पत्र में शोधकर्ताओं के हवाले से कहा गया है कि जांच के लिए, उन्होंने दुनिया भर की हजारों झीलों के तापमान के आंकड़ों का विश्लेषण किया। इनमें एक-आयामी झील मॉडल, उत्तरी अमेरिका की सबसे बड़ी झीलों के लिए उच्च-रिज़ॉल्यूशन सिमुलेशन और विशेष तरह की झीलों की स्थितियों के अनुसार जांच किए गए स्थानीय मॉडल शामिल किए गए।

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गहराई और समय के साथ तापमान में कैसे बदलाव होता है, इसका विश्लेषण करके, शोधकर्ताओं ने यह पता लगाया कि कब और कहां सतह के नीचे का पानी अत्यधिक गर्मी की सीमा को पार कर गया है।

शोध में सतह के नीचे हीटवेव को उन अवधियों के रूप में परिभाषित किया है जब किसी विशेष गहराई पर तापमान अपनी सामान्य मौसमी सीमा से अधिक हो जाता है। जहां यह देखा गया कि 1980 के बाद से इन घटनाओं में कैसे बदलाव आया है और इस सदी के अंत तक विभिन्न उत्सर्जन परिदृश्यों में ये कैसे विकसित हो सकती हैं।

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1980 के बाद से झीलों के सबसे गहरे हिस्सों में चलने वाली लू की आवृत्ति में प्रति दशक सात दिन से अधिक, तापमान में प्रति दशक 0.2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि देखी गई है।

सतह के नीचे की हीटवेव पहले की तुलना में आम हो गई हैं और ये और भी आम होती जा रही हैं। 1980 के बाद से तलीय हीटवेव (झीलों के सबसे गहरे हिस्सों में चलने वाली लू) की आवृत्ति में प्रति दशक औसतन सात दिन से अधिक, अवधि में प्रति दशक दो दिन से अधिक की वृद्धि हुई है और इनके तापमान में प्रति दशक लगभग 0.2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि देखी गई है।

गहरे पानी में रहने की जगहें जो कभी सतही लू के दौरान आश्रय प्रदान करते थे, अब कम हो रहे हैं या पूरी तरह से गायब हो रहे हैं। कुछ झीलों में, ठंडा पानी ढूंढने के लिए मछलियों के द्वारा तय की जाने वाली दूरी हर दशक में लगभग एक मीटर बढ़ गई है।

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सिमुलेशन बताते हैं कि ये रुझान और तेज होंगे, खासकर उच्च-उत्सर्जन परिदृश्यों में। इस सदी के अंत तक, कुछ निचले स्तर की हीटवेव महीनों तक चल सकती हैं और तापमान के ऐसे चरम स्तर ऐतिहासिक रिकॉर्ड में नहीं देखे गए हैं।

पारिस्थितिक तंत्र और जलवायु परिवर्तन के हिसाब से क्यों अहम हैं झीलें?

झील के पारिस्थितिक तंत्र तापीय संरचना पर निर्भर करते हैं। जब अत्यधिक गर्म पानी गहराई तक पहुंचता है, तो यह पारिस्थितिक तंत्र पर बुरा असर डाल सकता है। जिसमें मछलियों के आवासों में बदलाव और प्रजातियों के वितरण में बदलाव, पोषक तत्वों के चक्रण में वृद्धि और शैवालों के विकास में वृद्धि होना शामिल है। यह झील के तल तलछट से मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को भी प्रभावित कर सकता है।

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सतह के नीचे की हीटवेव नीचे रहने वाली प्रजातियों के लिए एक विशेष खतरा पैदा करती हैं, जो कम गतिशील हो सकती हैं या पहले से ही ठंडी, स्थिर परिस्थितियों के अनुकूल हो सकती हैं। सतही हीटवेव के दौरान आश्रयों के नष्ट होने से उन प्रजातियों को भी खतरा होता है जो गहरे पानी में भाग जाती हैं।

अध्ययन झीलों की निगरानी के प्रयासों को सतह के नीचे के तापमानों तक विस्तारित करने की तत्काल जरूरत पर प्रकाश डालता है। हालांकि उपग्रहों ने सतही तापमान वृद्धि के बारे में समझ को बदल दिया है, लेकिन वे नीचे क्या हो रहा है, इसका पता नहीं लगा सकते हैं।

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भविष्य के शोध में यह पता लगाया जाना चाहिए कि विभिन्न प्रजातियां इन गहरे पानी और ऊर्ध्वाधर रूप से बढ़ती लू पर कैसे प्रतिक्रिया करती हैं। इसमें यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि झीलों की तापीय संरचना में बदलाव पोषक चक्रण और मीथेन उत्पादन जैसी विभिन्न प्रक्रियाओं को कैसे प्रभावित करते हैं।

जैसे-जैसे झीलें गर्म होती जा रही हैं, इन छिपी हुई चरम गर्म स्थितियों का प्रबंधन जैव विविधता और झीलों द्वारा प्रदान की जाने वाली महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं की रक्षा करना जरूरी हो गया है।

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