

चंपानेर! मध्य भारत का एक गांव, जहां लगातार दो साल से बारिश न होने के कारण ऐसा अकाल पड़ा कि लोगों के पास खाने को न अन्न था और न पशुओं के लिए चारा। ऐसे मुश्किल समय में भी क्रूर ब्रिटिश अधिकारी कैप्टन एंड्रयू रसेल गांव वालों से सामान्य से दोगुना लगान मांगता है और लगान से बचने के लिए ग्रामीणों से क्रिकेट मैच खेलने की चुनौती देता है। यह कहानी 1893 की है। शायद आप इस चंपानेर को जानते होंगे। चंपानेर, “लगान” फिल्म का गांव है, लेकिन इसका असल नाम कुनारिया है। कुनारिया में ही साल 2000 में लगान फिल्म की शूटिंग हुई थी। भौगोलिक दृष्टि से देश के सबसे बड़े जिले कच्छ का गांव कुनारिया उस भू-दृश्य में बसा है, जहां से लगभग 50 किलोमीटर की दूरी पर धरती का रंग और मिजाज बदलने लगता है। रण की कठोर जलवायु से प्रभावित इस इलाके में बारिश कम और अनिश्चित होती है और सूखे मौसम में पानी तेजी से वाष्पित हो जाता है। 1893 के चंपानेर यानी कुनारिया में अब बहुत कुछ बदल गया है, लेकिन नहीं बदले हैं तो सूखे जैसे हालात। जिस साल बारिश नहीं होती, गांव के बड़े हिस्से में चंपानेर जैसा सूखा पसर जाता है। मीलों तक फैले खेत किसी रेगिस्तान की तरह सूने और वीरान नजर आते हैं। इस साल ऐसा ही कुछ यहां दिख रहा है।
लगभग 66 वर्षीय कांजी भाई कांजीकारा बताते हैं, “29 से 31 जुलाई 2026 के बीच बारिश हुई तो मैंने अपने 3 हेक्टेयर के खेतों में अरंडी की बुआई कर दी, लेकिन उसके बाद एक बूंद भी नहीं बरसी और पूरी फसल खराब हो गई।” उनका परिवार पशुओं को भी पालता है। दूध से अभी आमदनी हो रही है, लेकिन कांजी भाई कहते हैं कि यदि अगले महीनों में बारिश नहीं हुई तो पशुओं के लिए चारे का इंतजाम करना भी मुश्किल हो जाएगा। यह स्थिति तब है, जब गांव में पानी के इंतजाम को लेकर सरकार की ओर से तरह-तरह के वादे किए जाते रहे। कांजीभाई ने कहा, “मैं 14-15 साल का रहा हूंगा, तब से सुन रहा हूं कि हमारे गांव में नर्मदा का पानी पहुंचेगा। अब ऊपर जाने की उम्र हो गई, लेकिन अब तक नर्मदा का पानी नहीं पहुंचा।” हालांकि गांव में नर्मदा से आ रहे पीने के पानी की सप्लाई पहुंच चुकी है, परंतु खेतों की सिंचाई के लिए लोगों को या तो बारिश पर निर्भर रहना पड़ता है या गांव से लगभग पांच किलोमीटर दूर स्थित रुद्रमाता बांध उनका वैकल्पिक सहारा है।
साल 1970 में रुद्रमाता बांध का निर्माण खारी नदी पर हुआ था। इसकी कुल भंडारण क्षमता 64.74 मिलियन घन मीटर (एमसीएम) और प्रभावी भंडारण क्षमता 55.70 एमसीएम है। यह आसपास के क्षेत्र में सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराता है। कुछ बड़े किसान पाइप लाइन बिछाकर इस बांध से अपने खेतों तक पानी लाते हैं, लेकिन इस साल रुद्रमाता बांध में भी पानी नहीं है। गुजरात सरकार के नर्मदा, जल संसाधन, जलापूर्ति एवं कल्पसर विभाग के रिजर्वायर डाटा मैनेजमेंट सिस्टम के मुताबिक, 14 सितंबर 2026 को रुद्रमाता बांध में महज 1.81 मिलियन घन मीटर (एमसीएम) पानी था, जो सिर्फ 3.02 प्रतिशत है, इसलिए यहां से पानी की निकासी बंद है।
गांव के बुजुर्ग किसान रणछोड़ भाई कहते हैं कि उनके पास 5 एकड़ जमीन है और एक एकड़ से लगभग 15 बोरी अरंडी निकलती है, जो बाजार में 50 से 75 हजार रुपए के रेट में बिकती है। इस तरह उन्हें एक सीजन में लगभग ढाई से तीन लाख रुपए की आमदनी एक फसल से होती है, लेकिन इस बार उनकी लगभग पूरी फसल बर्बाद हो गई। हालात इस तरह खराब हो गए हैं कि ग्रामीणों के समक्ष आजीविका का संकट खड़ा हो गया है।
चालू मॉनसून सीजन 2026 में कुनारिया जैसे सैकड़ों गांव पानी की बूंद-बूंद के लिए तरह रहे हैं। यह मॉनसून सीजन पूरे कच्छ और सौराष्ट्र के कई जिलों के लिए चुनौती भरा साबित हुआ। मौसम विज्ञान केंद्र, गुजरात की 15 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, गुजरात में एक जून से 15 सितंबर 2026 तक कुल औसत बारिश 597.4 मिलीमीटर (मिमी) हुई, जबकि सामान्य तौर पर 663.9 मिमी बारिश होती है, यानी 10 प्रतिशत कम बारिश रिकॉर्ड की गई, लेकिन जिलावार तस्वीर बेहद असमान है। सबसे कम बारिश सौराष्ट्र के देवभूमि द्वारका जिले में हुई। यहां सामान्य के मुकाबले केवल 20 प्रतिशत बारिश हुई। इस अवधि में इस जिले में सामान्य तौर पर 535 मिमी बारिश होती है, लेकिन 15 सितंबर तक केवल 106 मिमी बारिश दर्ज हुई।
इसी तरह समुद्र तट से सटे पोरबंदर में 67 फीसदी कम बारिश, जामनगर में 50 फीसदी कम बारिश, कच्छ जिले में 39 फीसदी, गिर सोमनाथ में 33 फीसदी, राजकोट में 28 फीसदी कम बारिश रिकॉर्ड की गई। खास बात यह है कि खरीफ सीजन के शुरुआती दो महीने इन जिलों में हालात बहुत खराब रहे। 31 अगस्त 2026 तक देवभूमि द्वारका में सामान्य से 88 प्रतिशत, पोरबंदर में 73 प्रतिशत, कच्छ में 61 प्रतिशत और जामनगर में 60 प्रतिशत कम बारिश हुई थी।
बारिश की कमी वाले इन जिलों में कुनारिया जैसे हालात रहे। किसानों ने खरीफ की फसलें डेढ़ से दो महीने देरी से लगाई, बावजूद इसके पानी न होने के कारण फसलें पनप नहीं पाई। वर्तमान में गुजरात के पास देश के कुल जल संसाधनों का केवल 2 प्रतिशत है, जबकि देश की 5 प्रतिशत आबादी यहां रहती है। राज्य के अलग-अलग क्षेत्रों में उपलब्ध सतही जल की मात्रा में काफी अंतर है। दक्षिण गुजरात में उपलब्ध जल संसाधनों का हिस्सा 69 प्रतिशत, सौराष्ट्र और कच्छ में 17 प्रतिशत तथा उत्तर गुजरात में केवल 3 प्रतिशत है। शेष 11 प्रतिशत अन्य हिस्सों में है। पूरे राज्य में वर्षा का स्वरूप अनिश्चित और असमान है, जिससे कृषि, विकास और लोगों की आजीविका में असंतुलन साफ दिखता है। राज्य के जल संसाधन विभाग के अनुसार, राज्य के दक्षिणी हिस्से में जहां औसत सालाना वर्षा 1,100 मिमी से अधिक है, मध्य गुजरात में यह 800–1,000 मिमी, सौराष्ट्र में 400 से 800 मिमी और कच्छ में 400 मिमी से भी कम रह जाती है।
क्षेत्रवार बारिश के दिनों में भी बड़ा अंतर है। दक्षिण गुजरात में करीब 120 वर्षा दिन, मध्य गुजरात में 30–70, सौराष्ट्र में केवल 20–30 और कच्छ में 10–20 दिन हैं। केंद्रीय भूजल बोर्ड के आंकड़े इस भौगोलिक अंतर को और अधिक स्पष्ट करते हैं। राज्य के दक्षिण खासकर डांग और वलसाड में वार्षिक वर्षा करीब 2,000 मिमी तक पहुंच जाती है, जबकि कच्छ के कुछ इलाकों में यह लगभग 300 मिमी तक सिमट जाती है। यानी राज्य के दो हिस्सों के बीच सामान्य वार्षिक वर्षा में करीब छह से सात गुना का अंतर है। यही वजह है कि कच्छ-सौराष्ट्र को अर्द्ध शुष्क क्षेत्र माना जाता है और सूखा यहां साल दर साल दबे पांव पहुंच जाता है।
बारिश के पानी को जल सुरक्षा, कृषि और ग्रामीण आजीविका की बुनियाद माना जाता है। असामान्य बारिश का सीधा असर फसल उत्पादन, भूजल पुनर्भरण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। यही वजह है कि ग्रामीण बारिश की कीमत जानते हैं और उसे सहेजने की पुरजोर कोशिश करते हैं। कुछ ऐसा ही तटीय राज्य गुजरात में देखने को मिलता है। यहां वर्षा जल संचयन की परंपरा सदियों पुरानी है। कच्छ के धोलावीरा में तो करीब 4,500 वर्ष पहले हड़प्पा सभ्यता के लोगों ने बारिश और मौसमी नदियों के पानी को रोकने और संग्रहित करने के लिए जलाशयों का जटिल तंत्र विकसित किया था। आगे चलकर वाव, तालाब, कुंड और टांका जैसी पारंपरिक संरचनाएं विकसित हुईं, जिनमें पाटन की रानी की वाव प्रमुख उदाहरण है।
आधुनिक दौर में सौराष्ट्र में चेकडैम, बोरी बांध, खेत तालाब जैसी छोटी जल संरचनाओं का निर्माण इस परंपरा की नई कड़ी बना। 1980 और 1990 के दशकों में लगातार सूखे और गिरते भूजल स्तर ने वर्षाजल को रोकने और भूजल पुनर्भरण (रिचार्ज) की जरूरत बढ़ा दी। साल 1987 के भीषण सूखे के बाद किसानों ने छोटी नदियों और नालों पर चेकडैम बनाकर बारिश के बहाव को रोकने और पानी को कुओं तक पहुंचाने के प्रयोग शुरू किए। 1990 के दशक में गैर-सरकारी संगठनों ने इन प्रयासों को तकनीकी और आर्थिक मदद दी। इस तरह चेकडैम बनाने की मुहिम ने एक आंदोलन का रूप ले लिया, जिसकी शुरुआत मूलतः सामुदायिक पहल के रूप में हुई।
1998-2000 के सूखे के दौरान यह अभियान और तेज हुआ। आईडब्ल्यूएमआई–टाटा जल नीति अनुसंधान कार्यक्रम के तहत 2002 में प्रकाशित आरके नागर के अध्ययन के अनुसार, सौराष्ट्र में उस समय सालाना 380–680 मिमी बारिश होती थी और लगभग चार में से तीन वर्षों में सामान्य से कम बारिश पड़ती थी। खेती और पेयजल के लिए भूजल पर भारी निर्भरता के बीच गांवों में चेकडैम, तालाब और कुओं के पुनर्भरण की संरचनाएं तेजी से बनीं। इस अध्ययन के मुताबिक, मात्र सात महीने में सौराष्ट्र में 9,875 चेकडैम बन गए, जबकि 1,224 निर्माणाधीन थे। स्थानीय लोगों की भागीदारी से बनी इन संरचनाओं ने भूजल पुनर्भरण और सूखे से निपटने की क्षमता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसकी सफलता को देखते हुए सरकार ने इस जनपहल को बड़े कार्यक्रम का रूप दे दिया। 1996-97 में गुजरात में वर्षाजल संचयन के लिए एक कार्ययोजना बनाई गई, जिसमें घरेलू टांकों और सामुदायिक जल संरचनाओं (ढांचों) के जरिये भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देने का निर्णय लिया गया। 17 जनवरी 2000 को “सरदार पटेल सहभागी जल संचय योजना” शुरू की गई। शुरुआत में गैर-आदिवासी क्षेत्रों में चैकडेम बनाने की लागत का 60 प्रतिशत सरकार और 40 प्रतिशत लाभार्थियों को देना था, जबकि आदिवासी क्षेत्रों में यह अनुपात 80:20 था।
योजना का उद्देश्य बारिश के पानी को बहकर समुद्र में जाने से रोकना, स्थानीय जलस्रोतों में पानी जमा करना और आसपास के कुओं में भूजल पुनर्भरण करना था। राज्य में चैकडेम बनाने को लेकर इतनी तेजी से काम हुआ कि संसद में दिए गए एक उत्तर में जानकारी के मुताबिक, गुजरात में केवल दो वर्षों (1999-2000) में 10,708 चेकडैम बना दिए गए। इस आंदोलन को डाउन टू अर्थ के 31 अक्टूबर 2000 के अंक में प्रकाशित रिपोर्ट “ट्रिस्ट विद रेन” में जगह दी गई। इस रिपोर्ट के मुताबिक, मात्र दो सालों में ग्रामीणों की ओर से अकेले सौराष्ट्र में 25,000 से अधिक चैकडेम बनाने के प्रस्ताव मिले। योजना के चौथे चरण में साल 2005 से सरकार और लाभार्थियों की हिस्सेदारी 80:20 कर दी गई। इंटरनेशनल वाटर मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट के मानद वैज्ञानिक तुषार शाह ने डाउन टू अर्थ को बताया, “उस समय अपने-अपने गांवों में चैकडेम बनवाने को लेकर ग्रामीणों का उत्साह देखते ही बनता था। लोग साल दर साल सूखे की मार से परेशान थे और स्थायी समाधान चाहते थे। अहम बात यह थी कि क्षेत्र के कई सामाजिक व धार्मिक संगठनों ने खुलकर मदद की।”
आम तौर पर 1.5–2 मीटर ऊंचे चेकडैम की भंडारण क्षमता 0.20 से 1.5 दस लाख घन फीट होती है। इनके कारण आसपास के 2 से 15 कुओं और ट्यूबवेल में भूजल पुनर्भरण हो सकता है और 3 से 22 हेक्टेयर क्षेत्र को सिंचाई का लाभ मिल सकता है। कम लागत, सीमित रखरखाव और जमीन अधिग्रहण की जरूरत न होने के कारण चेकडैम सौराष्ट्र के जल प्रबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा बने। चैकडेम के साथ-साथ और भी ढांचे बनाने की मुहिम चलाई गई। आज गुजरात सरकार का दावा है कि राज्य में व्यापक स्तर पर जल संचयन के इंतजाम किए गए हैं।
गुजरात सरकार के नर्मदा, जल संसाधन एवं जलापूर्ति विभाग के अनुसार, राज्य में 2018 तक करीब 5.55 लाख जल संचयन संरचनाएं बनाई गई हैं। इनमें 1.68 लाख चेकडैम व बोरी बांध, 2.38 लाख खेत तालाब और 1.25 लाख बोरीबंध शामिल हैं। जलापूर्ति विभाग ने इनमें से 88,312 चेकडैम बनाए और करीब 24,497 तालाबों को गहरा किया। विभाग का दावा है कि इन प्रयासों से भूजल स्तर में गिरावट पर रोक लगी और कई क्षेत्रों में सुधार हुआ (देखें, कहां कितने बने जल संचयन ढांचे)।
लेकिन सवाल यह है कि साल 2026 में सूखे के मुहाने पर खड़े सौराष्ट्र व कच्छ के जिलों में ये ढांचे कितने काम आ रहे हैं? डाउन टू अर्थ ने अगस्त माह में सौराष्ट्र व कच्छ के पांच जिलों में जाकर हकीकत जानी। जामनगर जिले के गांव जोडिया के लोग भी अपने खेतों में मूंगफली की फसल को सूखते हुए देखने को मजबूर थे। जोडिया समुद्र तट से लगा है और तालुका मुख्यालय है। यह स्थान अपने प्राचीन बंदरगाह, मछली पकड़ने के उद्योग और सुंदर समुद्र तट के लिए भी जाना जाता है, लेकिन गांव के दो छोरों में खेती होती है। गांव के किसान हरेश भाई कानणी बताते हैं कि उनके गांव में बारिश के सीजन में अगस्त तक सामान्यत: 25 इंच (63.5 सेमी) बारिश हो जाती है, लेकिन इस साल केवल चार इंच ही बारिश हुई। पहले ही बारिश देर से हुई तो गांव वालों ने अपनी फसल लेट लगाई, लेकिन दो दिन की बारिश के बाद बारिश ही नहीं हुई।
कानणी ने कहा, “जो फसल लगाई है, वो पूरी तरह चौपट होने वाली है। इस सीजन में तो अब कोई फसल नहीं लगा पाएंगे।” जोडिया गांव में तालुका कार्यालय भी है, जहां बारिश को मापक यंत्र भी रखा गया है। जोडिया गांव को सौनी योजना का पानी नहीं मिल रहा है। सौनी योजना का पूरा नाम सौराष्ट्र नर्मदा अवतरण सिंचाई योजना है (देखें, क्या है सौनी योजना,)।
ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें भरोसा दिलाया गया था कि उनके क्षेत्र में सौनी योजना का पानी पहुंचाया जाएगा, लेकिन एक दशक से अधिक समय बीतने के बाद भी जोडिया के अलावा बादनपुर व कुनड गांव तक इस योजना का लाभ नहीं मिल रहा है। गांव से लगभग सात किलोमीटर दूरी पर स्थित उंड बांध में सौनी योजना के तहत नर्मदा का पानी पहुंचाया जाना था। लेकिन नर्मदा का पानी न पहुंचने के कारण उंड बांध में ही काफी कम पानी है। गांव के नजदीक से गुजर रही उंड नदी भी सूखी पड़ी है।
ग्रामीण हरेश भाई कानणी बताते हैं, “सालों पहले उंड नदी पर चैकडेम बनाए गए थे, लेकिन जब नदी में ही पानी नहीं है तो चैकडेम में कहां से पानी आएगा।” उनके मुताबिक कई सालों से चैकडेम की मरम्मत नहीं हुई है, इसलिए वहां बारिश का पानी भी नहीं ठहरता। चूंकि पूरा गांव समुद्र तट से सटा है तो भूजल भी खारा होने के कारण खेती के काम नहीं आता। हालांकि ग्रामीण मानते हैं कि पिछले लगभग डेढ़ दशक से बारिश का सिलसिला बढ़ा है, जिस वजह से जहां पहले वे केवल एक फसल लिया करते थे, अब खरीफ के साथ-साथ रबी की फसल भी लेने लगे हैं। उन्हें अब भी उम्मीद है कि सितंबर-अक्टूबर में बारिश होगी। बेशक खरीफ में मूंगफली नहीं होगी, लेकिन रबी में गेहूं-चना हो सकती है। बांध में पानी न होने के कारण गांव के मछुआरे भी परेशान हैं। बरसात में समुद्र में जाने की मनाही होती है तो वे बांध में मछलियां पकड़ते हैं, लेकिन बांध में पानी न होने से मछलियां नहीं मिल रही हैं।
जोडिया की तरह देवभूमि द्वारका जिले के खंभालिया तालुका के गांव सिदपुर में भी चेकडैम कारगर साबित नहीं हो रहे हैं। इनकी देखरेख नहीं की गई और आज हालात ऐसे हैं कि चेकडैम ही सूखने के कगार पर हैं। किसानों ने अपने खेतों में जो कुएं खोदे हुए हैं, वहां भी पानी नहीं रहा। सिदपुर गांव के किसान यक्षराज अपने खेतों में लगे कुएं को दिखाते हुए कहते हैं, “यह कुआं लबालब रहता था, लेकिन इस साल लगभग सूख गया है। हालत यह है कि कुएं में दो दिन में इतना पानी इकट्ठा हो पाता है कि पंप के जरिए आधा घंटा ही निकाल पाते हैं।” सिदपुर गांव में गडकी बांध को फिर से बनाया जा रहा है, लेकिन वह भी खाली पड़ा है। राजकोट जिले के उपलेटा तालुका के गांव अरणी के आसपाास के इलाकों में 40 से अधिक चैकडेम बनाए गए थे, लेकिन गांव के उप सरपंच रह चुके पंकज भाई बताते हैं कि ज्यादातर चैकडेम टूट चुके हैं। उनमें मिट्टी जम चुकी है। ग्रामीण दामजी भाई रामजी भाई कहते हैं कि गांव में भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। ऐसा तब है, जब पिछले कुछ सालों में बारिश में सुधार हुआ है और किसानों ने अपने खेतों में ट्यूबवेल लगवा लिए हैं। वह मानते हैं कि अगर चैकडेम की देखरेख ढंग से होती तो भूजल स्तर इतनी तेजी से नहीं गिरता। देवभूमि द्वारका के गांव भानवाड़ के लोगों ने बताया कि चैकडेम खाली पड़े हैं।
इस साल बारिश न होने के कारण कई किसानों ने अपने कुछ खेत खाली छोड़ दिए और जिन किसानों ने कपास व मूंगफली लगाई है, वो भी दो माह लेट लगाई है। कच्छ जिले के भुज तालुका के गांव लेर में भी सूखा इस कदर है कि किसानों अपनी फसल को ज्यों का त्यों छोड़ रहे हैं। लगभग सात एकड़ जमीन के मालिक धीरू भाई तो अरंडी की फसल को सूखता देख उस पर ट्रैक्टर चलाने की तैयारी में हैं। उन्होने कहा, “अब बारिश तो होगी नहीं, ट्रैक्टर चलाकर यहां ज्वार लगाएंगे, ताकि पशुओं के लिए चारे का इंतजाम हो जाए।” गांव के बाहर बने चैकडेम किसी काम नहीं आ रहे हैं। हर साल पानी 20 से 30 फुट नीचे जा रहा है। अव्वल तो बारिश नहीं होती, अगर होती भी है तो इतनी तेज होती है कि खेतों में पानी नहीं टिकता, इसलिए किसान अपने खेतों में ट्यूबवेल लगवा रहे हैं, लेकिन कई दफा 500 फुट से नीचे खोदने के बावजूद पानी खारा निकल जाता है।
करीब तीन दशक पहले गुजरात ने जिन वर्षा जल संचयन के ढांचे बनाकर एक उल्लेखनीय मिसाल कायम की थी। अब उन ढांचों के रखरखाव पर सवाल उठ रहे हैं। डेवलपमेंट सपोर्ट सेंटर (डीएससी) ने 2020 से 2022 के बीच पूरे गुजरात में एक अध्ययन किया और फरवरी 2023 में प्रकाशित “बिल्डिंग इंफॉमंड एंड स्केलेबल वाटर सिक्योरिटी सोल्यूशन फॉर गुजरात” अध्ययन में बताया कि केवल ढांचे बना देना जल सुरक्षा की गारंटी नहीं है। उनकी टीम ने राज्य के 12 जलग्रहण (वाटरशेड) क्षेत्रों में 227 संरचनाओं का प्रत्यक्ष आकलन किया और पाया कि सौराष्ट्र तटीय क्षेत्र की 72 प्रतिशत और पूर्वी आदिवासी पट्टी (छोटा उदयपुर, दाहोद, माहीसागर, पंचमहल) की 68 प्रतिशत नमूना ढांचे काम नहीं कर रहे थे। रखरखाव और स्थानीय स्तर पर ढांचों के प्रबंधन में कई गंभीर समस्याओं क पता चला। अध्ययन में शामिल कई जलग्रहण क्षेत्रों में खराब रखरखाव के कारण बड़ी संख्या में ढांचे निष्क्रिय मिले। कुल 227 ढांचों में से 52 प्रतिशत चैकडेम, 9 प्रतिशत परकोलेशन टैंक और 1 प्रतिशत जलाशय बांधों का अध्ययन किया गया। ये ढांचे इंटीग्रेटेड वाटरशेड मैनेजमेंट प्रोग्राम (आईडब्ल्यूएमपी), सरदार पटेल सहभागी जल संचय योजना (एसपीएसवाई) और महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) जैसी विभिन्न योजनाओं के तहत बनाए गए थे। डीएससी की टीम ने अमरेली जिले के जलग्रहण क्षेत्र में बरपाटोड़ी गांव की छह, वांध की चार, बालीनाव की दो तथा लुनसापुर और भाटवदार की एक-एक जल-संचयन संरचना की पहचान की। इनमें 12 चेकडैम और दो गांव के तालाब थे। लेकिन अध्ययन में पाया गया कि 12 चेकडैम में से 10 बेकार और पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुके थे तथा इनके रखरखाव की कोई व्यवस्था नहीं थी (देखें, वर्षा जल संचयन ढांचों की हकीकत,)। दरअसल सूखे की ढाल बनने वाले ढांचे ढाई दशक में दम तोड़ गए। सरकार का हस्तक्षेप बढ़ा तो लोगों ने अपने हाथ खींच लिए। रखरखाव व मरम्मत के काम में लोगों ने हाथ बंटाना बंद कर दिया। साथ ही, सरकार ने अपना फोकस बड़ी सिंचाई परियोजनाओं पर बढ़ा दिया।
सौनी स्कीम इसका एक उदाहरण है। साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपल सेंड्रप के समन्वयक हिमांशु ठक्कर कहते हैं कि ढाई से तीन दशक के बीच सौराष्ट्र में चैकडेम सहित कई छोटी-छोटी संरचनाएं बनाई गई, जो काफी सफल रहीं। लेकिन बाद में गुजरात सरकार ने बड़े बजट वाली योजनाओं पर पैसा खर्चना शुरू किया, लोगों ने भी चैकडेम जैसी संरचनाओं की ओर ध्यान देना छोड़ दिया। उनके मुताबिक, सौनी जैसी योजना का असर इसलिए दिखाई दिया, क्योंकि पिछले कुछ सालों में बारिश अच्छी होने के कारण सरदार सरोवर बांध लगातार ओवरफ्लो हुआ। साथ ही, सौराष्ट्र में भी अच्छी बारिश हुई, इसलिए लोगों को सिंचाई के लिए पानी की कमी महसूस नहीं हुई।
डेवलपमेंट सपोर्ट सेंटर फाउंडेशन के कार्यकारी निदेशक सचिन ओझा के मुताबिक, चेकडैम और दूसरी जल संरचनाओं के नाकाम होने की बड़ी वजह यह है कि उन्हें बनाकर छोड़ दिया गया। उपभोक्ताओं के समूह या तो बने नहीं या कुछ समय बाद निष्क्रिय हो गए। पंचायतों को ये ढांचे हस्तांतरित नहीं किए गए, जबकि पंचायतों को उनकी संपत्ति के तौर पर सौंप कर जिम्मेदारी दी जानी चाहिए थी। ग्राम पंचायत विकास योजना और मनरेगा में मरम्मत व रखरखाव का स्पष्ट प्रावधान होता तो स्थिति अलग होती। कच्छ-सौराष्ट्र में हाल के वर्षों में बारिश और भूजल स्तर बढ़ने से भी इन ढांचों पर ध्यान कम हुआ, जिससे उनकी देखरेख और कमजोर पड़ गई। सस्टेनेबल एग्रीकल्चर कंसलटेंट डीएन झाला भी कहते हैं कि पिछले सालों में बारिश अधिक होने के कारण इन चैकडेम की जरूरत महसूस नहीं हुई, लेकिन इस साल जब बारिश नहीं हुई तो लोगों को चैकडेम की याद आ रही है, जबकि अब तो बहुत से इलाकों में चैकडेम की सफाई न होने के कारण गाद व मिट्टी भर गई है। नई पीढ़ी तो जानती ही नहीं कि सूखा क्या होता है?
ढाई से तीन दशक पहले तक जहां सौराष्ट्र और कच्छ में बारिश की कमी के कारण लगातार दो-दो साल तक सूखे की स्थिति बन जाती थी, वहीं अब इस क्षेत्र में बारिश का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। सितंबर 2025 में इंटरनेशनल जर्नल ऑफ एनवायरमेंट एंड क्लाइमेट चेंज में प्रकाशित एक अध्ययन में 1990 से 2022 तक गुजरात में बारिश के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। अध्ययन के मुताबिक, सौराष्ट्र और कच्छ जैसे शुष्क और अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में औसत वार्षिक बारिश बढ़ी है, लेकिन बारिश वाले दिनों की संख्या घट गई है। यानी अब बारिश अधिक दिनों तक थोड़ी-थोड़ी होने के बजाय कम दिनों में अधिक मात्रा और तीव्रता के साथ हो रही है। शोधकर्ताओं के अनुसार, बारिश के इस बदलते स्वरूप के कारण गुजरात में एक साथ बाढ़ और सूखे दोनों की घटनाएं बढ़ रही हैं।
इस बदलाव के संभावित बड़े कारणों को 2024 में जियोफिजिक्स रिसर्च लैटर्स में प्रकाशित अध्ययन में स्पष्ट किया गया। इस अध्ययन के मुताबिक, 1979 से 2022 के बीच उत्तर-पश्चिम भारत में ग्रीष्मकालीन मॉनसूनी बारिश 1980 के दशक की तुलना में करीब 40 प्रतिशत बढ़ी और इसके पीछे पश्चिमी भूमध्यरेखीय हिंद महासागर तथा अरब सागर के समुद्री सतह के तापमान में वृद्धि महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। समुद्र के गर्म होने से वाष्पीकरण बढ़ता है, भूमध्य रेखा के पार मॉनसूनी हवाएं मजबूत होती हैं और समुद्र से अधिक नमी उत्तर-पश्चिम भारत की ओर पहुंचती है। अध्ययन में इस बदलाव को हिंद महासागर के गर्म होने और हेडली सेल (हवा के ऊपर उठने, दूर जाने और फिर नीचे उतरने का एक बड़ा वायमुंडलीय चक्र) के ध्रुवों की ओर खिसकने तथा विस्तार से जुड़े वायुमंडलीय बदलावों से जोड़ा गया।
बारिश बढ़ने के कारण जहां सूखे की प्रवति में कमी आई, वहीं सौराष्ट्र व कच्छ में फसल का रकबा बढ़ गया। कच्छ पर 2023 में फ्रंटियर्स इन सस्टेनेबल फूड सिस्टम्स में प्रकाशित अध्ययन “एग्रीकल्चर ट्रांसफॉर्मेशंस इन दी एरिड, ड्रॉउट प्रोन रीजन ऑफ कच्छ” के अनुसार, कच्छ में 2001-02 में कुल फसल क्षेत्र करीब 8.25 लाख हेक्टेयर था, जो 2017-18 में बढ़कर करीब 9.34 लाख हेक्टेयर हो गया। यानी जिस क्षेत्र को लंबे समय तक पानी की कमी और सूखे के कारण कृषि विस्तार के लिए प्रतिकूल माना जाता था, वहां भूजल आधारित सिंचाई और जल-संरचनाओं के विस्तार ने खेती का रकबा बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इसका दूसरा पहलू यह है कि बारिश और भूजल पुनर्भरण की तुलना में सिंचाई के लिए पानी की मांग बढ़ने से कई इलाकों में भूजल पर दबाव भी बढ़ा। डेवलपमेंट सपोर्ट सेंटर के 1995 से 2020 के बीच वर्षा और भूजल स्तर के रुझानों के विश्लेषण के अनुसार, राज्य में औसत वर्षा लगभग 821 मिलीमीटर रही और अधिकांश क्षेत्रों में वर्षा की प्रवृत्ति बढ़ी है, लेकिन उत्तर गुजरात, कच्छ और मध्य गुजरात में भूजल स्तर लगातार नीचे गया। उत्तर गुजरात में इस अवधि में औसत वर्षा 547 मिलीमीटर से बढ़कर 657 मिलीमीटर हुई, फिर भी भूजल स्तर करीब 23 मीटर से गिरकर 35 मीटर तक पहुंच गया। जबकि कच्छ में भी बारिश बढ़ने के बावजूद भूजल स्तर में गिरावट दर्ज की गई।
हालांकि सौराष्ट्र के आंतरिक और तटीय क्षेत्रों में भूजल स्तर में सुधार हुआ है़, लेकिन अब जब बारिश नहीं हो रही है तो लोगों को ढाई दशक पुराने ढांचे याद आ रहे हैं। तुषार शाह कहते हैं कि पिछले ढाई दशक के दौरान सौराष्ट्र कच्छ में काफी परिवर्तन आए हैं। बारिश बढ़ गई है और नर्मदा का कमांड एरिया बढ़ने से सूखे का प्रभाव कम हुआ है। बावजूद इसके, चैकडेम जैसे ढांचों की जरूरत बनी हुई है। ओझा कहते हैं कि सौराष्ट्र व कच्छ एक नई चुनौती से जूझ रहे हैं। बारिश बढ़ने व भूजल स्तर सुधरने से टयूबवेल की संख्या में इजाफा हो रहा है और भूजल का इस्तेमाल बढ़ गया है, ऐसे में वर्षा जल संचयन व जल प्रबंधन की ओर अधिक ध्यान देना होगा।
गुजरात के जिन इलाकों में ढाई दशक पहले चैकडेम बने थे और अभी भी उनकी देखरेख की जा रही है, वहां खासकर चैकडेम के वाटरशेड इलाकों में सूखे का असर बिल्कुल नहीं दिख रहा है
यहां यह समझना बेहद जरूरी है कि ढाई से तीन दशक के बीच जल संचयन के लिए जो संरचनाएं बनाई गई हैं, अगर उनकी देखभाल सही से हो तो सूखे के वर्तमान दौर में भी एक बड़े क्षेत्रफल में खेती सफल हो सकती है। राजकोट के गोंडल तालुका के गांव चरखड़ी के आसपास 20 से अधिक चैकडेम बने हुए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि इस साल बारिश न होने के बावजूद लगभग सभी चैकडेम में पानी जमा है। बारिश से पहले ही ग्रामीणों ने लगभग सभी चैकडेम की सफाई और मरम्मत की। खास बात यह है कि सफाई के दौरान निकली मिट्टी खेतों में बिछाई गई, क्योंकि यह मिट्टी उपजाऊ होती है। गांव के जागरूक किसान संजय सगपारिया कहते हैं, “गांव में साल 2000 से पहले ही चैकडेम बनने शुरू हो गए थे। गांव से गुजर रही बरसाती नदियों में 20 से ज्यादा चैकडेम बनाए गए। पहले पहल तो इसका असर नहीं दिखा, केवल बरसात में पानी रुकता था, बरसात के कुछ दिनों बाद पानी सूख जाता था, लेकिन तीन-चार साल बाद असर दिखने लगा। आसपास के इलाकों में किसानों ने कुएं लगाने शुरू किए और अब तो लगभग हर कुएं में पानी रहता है और चैकडेम भी लगभग 12 महीने भरे रहते हैं।” बारिश न होने के बावजूद पानी से लबालब भरे हुए कुएं से अपने खेतों की सिंचाई कर रहे अश्विन भाई कहते हैं, “उनके पास आठ एकड़ जमीन है। बड़े हिस्से में कपास लगाई है और कुछ हिस्से में तरबूज लगाया है। सिंचाई की दिक्कत नहीं है, साठ फुट गहरा कुआं लगभग भरा रहता है।” आगा खान रूरल सपोर्ट प्रोग्राम के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अपूर्व ओझा कहते हैं कि कुछ इलाकों में अभी वाटर हार्वेस्टिंग को लेकर लोग अपने स्तर पर काम कर रहे हैं, जो उत्साहजनक है।
18 हजार करोड़ रुपए की लागत वाली सौनी योजना का मकसद सरदार सरोवर बांध भरने के बाद बाहर निकलने वाले पानी को सौराष्ट्र पहुंचाना था
सौराष्ट्र में करीब 71 नदियां हैं, जो अपेक्षाकृत छोटी और अधिकांशतः मौसमी हैं। माॅनसून के बाद शेत्रुंजी और भादर को छोड़कर ज्यादातर नदियां सूख जाती हैं। ऐसे में सिंचाई और पेयजल के लिए बाहरी जल स्रोतों पर निर्भरता बनी रहती है। इसी जरूरत को देखते हुए सौनी (सौराष्ट्र नर्मदा अवतरण सिंचाई) योजना शुरू की गई। लगभग 18,563 करोड़ रुपए की इस योजना का उद्देश्य नर्मदा में उपलब्ध अतिरिक्त पानी को पाइपलाइन के जरिए सौराष्ट्र के जल-संकट वाले इलाकों के 115 प्रमुख जलाशयों तक पहुंचाना है। केंद्र सरकार के अनुसार, परियोजना की पहली तीन लिंक का उद्घाटन अगस्त 2016, अप्रैल 2017 और जून 2017 में हुआ। गुजरात सरकार के जल संसाधन विभाग के मुताबिक, योजना से सौराष्ट्र के 11 जिलों में पानी पहुंचाया जाना है और 115 बांधों को जोड़ने के लिए करीब 1,371 किलोमीटर का जल अंतरण ढांचा तैयार हो चुका है। दरअसल सौनी की मूल अवधारणा नर्मदा के अतिरिक्त पानी के इस्तेमाल पर आधारित है।
यानी सरदार सरोवर भरने के बाद उपलब्ध अतिरिक्त पानी को सौराष्ट्र की ओर मोड़ा जाना है। केंद्रीय जल आयोग के 3 सितंबर 2026 के बुलेटिन के मुताबिक, नर्मदा बेसिन में 17.777 अरब घन मीटर पानी था, जो सामान्य भंडारण 16.748 अरब घन मीटर से 6.13 प्रतिशत अधिक है। लेकिन पिछले साल इसी समय 19.864 अरब घन मीटर पानी था। यानी इस साल भंडारण पिछले वर्ष की तुलना में करीब 10.5 प्रतिशत कम है। ऐसे में सामान्य से अधिक भंडारण के बावजूद इसे अतिरिक्त पानी मानकर सौनी के लिए बड़े पैमाने पर छोड़ना संभव नहीं है। हालांकि सौराष्ट्र के कई हिस्सों में कम बारिश और सूखते जलाशयों के बीच सरकार ने 30 अगस्त को मच्छु-2 से सौनी लिंक-1 के जरिए जामनगर और देवभूमि द्वारका के लिए 600 क्यूसेक पानी उठाने की मंजूरी दी, लेकिन प्राथमिकता पेयजल को दी गई है और उसके बाद बचा पानी सिंचाई के लिए इस्तेमाल होगा। 2 सितंबर की मंत्रिमंडलीय बैठक में कच्छ, जामनगर और देवभूमि द्वारका समेत प्रभावित जिलों में पेयजल और चारे की उपलब्धता सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए गए। लेकिन किसानों के लिए सिंचाई का भरोसेमंद इंतजाम अब भी नहीं है।
दक्षिण एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपल (सेंड्रप) के समन्वयक हिमांशु ठक्कर के मुताबिक, सौनी योजना की मूल परिकल्पना ही सरदार सरोवर से निकलने वाले अतिरिक्त पानी यानी बाढ़ के पानी को सौराष्ट्र तक पहुंचाने की थी। इस साल सरदार सरोवर में अब तक ओवरफ्लो की स्थिति नहीं बनी है, इसलिए योजना के मूल उद्देश्य के अनुरूप पानी उपलब्ध नहीं है। उनका कहना है कि पिछले वर्षों में नर्मदा का अतिरिक्त पानी सौनी के जरिए सौराष्ट्र पहुंचाया जाता रहा है। लेकिन इस साल सौराष्ट्र में भी पर्याप्त बारिश नहीं हुई और नर्मदा में भी पिछले साल की तुलना में कम भंडारण है। इससे सवाल उठता है कि ऐसी विशाल जल-अंतरण परियोजना सूखे के वर्षों में कितनी प्रभावी है और क्या जल सुरक्षा के लिए स्थानीय जल-संरक्षण और भूजल पुनर्भरण पर समान जोर दिया गया है?