लू के थपेड़ों के बीच काम के दौरान अपनी प्यास बुझाता मजदूर; फोटो: आईस्टॉक
लू के थपेड़ों के बीच काम के दौरान अपनी प्यास बुझाता मजदूर; फोटो: आईस्टॉक

भीषण गर्मी, बढ़ती असमानता: जलवायु संकट की सबसे भारी कीमत चुके रहे हैं गरीब मजदूर और शहरी बस्तियां

भीषण गर्मी और जलवायु संकट ने शहरों को ‘हीट आइलैंड’ में बदला, जहां दिहाड़ी मजदूर, रिक्शा चालक, घरेलू कामगार और झुग्गी बस्तियों में रहने वाले लोग बिना आश्रय, पानी और स्वास्थ्य सेवाओं के सबसे घातक मार झेलने को मजबूर हैं
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आज दिल्ली में हुई हल्की बारिश ने भीषण गर्मी से एक-दो दिनों की राहत तो जरूर दी है, लेकिन यह राहत एक क्षणिक सुखद अहसास से अधिक कुछ नहीं है। सच्चाई तो यह है कि लगातार बढ़ता तापमान और बार-बार पड़ने वाली गर्मी हमारे समय का सबसे बड़ा और कठोर सच बन गया है। इस कड़कड़ाती गर्मी ने न केवल जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है, बल्कि एक गहरी सामाजिक और आर्थिक खाई को भी उजागर किया है। आज हम जिस दौर में जी रहे हैं, वहां गर्मी का प्रभाव सभी पर समान नहीं है।

समाज का एक बड़ा वर्ग, जो आर्थिक रूप से कमजोर है और दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर है, इस तपिश की सबसे भारी कीमत चुका रहा है। विडंबना यह है कि इन लोगों का जलवायु परिवर्तन को बढ़ाने में योगदान सबसे कम रहा है, लेकिन विडम्बना है कि जलवायु परिवर्तन का सबसे पहला और घातक प्रहार इन्हीं पर हो रहा है।

भीषण गर्मी के चलते, तापमान पर नजर रखने वाली वेबसाइट के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया के 100 सबसे गर्म शहरों में से 90 से 95 शहर भारत में स्थित हैं, जिससे बढ़ते तापमान के प्रभाव को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। कई क्षेत्रों में तापमान 42-45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है, जबकि गर्मी के चरम  समय के आने में अभी कुछ सप्ताह बाकी है।

अत्यधिक गर्मी ने उत्तर, मध्य और पश्चिमी भारत के कई शहरों को भीषण गर्मी की चपेट में ला दिया है| भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) ने उत्तर-पश्चिमी और मध्य भारत के कुछ हिस्सों के लिए अलर्ट जारी किया, जिसमें चेतावनी दी गई कि अगले कुछ दिनों तक भीषण गर्मी जारी रहने की संभावना है।

आईएमडी ने अत्यधिक गर्म क्षेत्रों में रहने वाले लोगों से यथासंभव घर के अंदर रहने का आग्रह किया है और उन्हें गर्मी से होने वाली बीमारियों से बचाव के लिए सावधानी बरतने को कहा है। लंबे समय तक अत्यधिक गर्मी के संपर्क में रहने से गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं, जिनमें लू लगना भी शामिल है।

दिल्ली विश्वविध्यालय के आस पास पिछले 15 साल से रिक्शा चलाने वाले मोहम्मद सलीम इस बेतहासा गर्मी में धूप में अपनी सवारियों का इंतजार करते है| कहते है “गर्मी में सवारियां कम मिलती है लेकिन हमे तो उनके इंतजार में खड़ा रहना ही होता है| अगर ये काम नहीं करेंगे तो रात का खाना भी नहीं खा पाएंगे| अमेरिका-ईरान के युद्ध के बाद यहाँ रहना मुश्किल हो गया है लेकिन अब गर्मी ने हमारे काम को और भी कम कर दिया है| लेकिन हमारे पास कोई विकल्प नहीं है|”

सलीम जैसे हजारों-लाखों लोग है जो इस गर्मी में काम करने के लिए मजबूर है| उनके पास आईएमडी की चेतावनी के अनुसार घर के अन्दर रहने का विकल्प नहीं है|

इस बीच, देशभर में बिजली की मांग रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गई। भारत के राष्ट्रीय ग्रिड संचालक, ग्रिड कंट्रोलर ऑफ इंडिया लिमिटेड के आंकड़ों के अनुसार, शुक्रवार (24 अप्रैल) को बिजली की अधिकतम मांग बढ़कर 252 गीगावाट हो गई, जो मई 2024 के पिछले उच्चतम स्तर 251 गीगावाट को पार कर गई।  

शनिवार (25 अप्रैल) को यह मांग फिर से बढ़कर सर्वकालिक उच्च स्तर 256 गीगावाट पर पहुंच गई। यह आंकड़ा ग्रिड इंडिया द्वारा 20-26 अप्रैल के साप्ताहिक पूर्वानुमान में अनुमानित 239.5 गीगावाट से कहीं अधिक है। बिजली की मांग का यह स्तर इस महीने के लिए असामान्य रूप से उच्च है; भारत की ऊर्जा आवश्यकताएं आमतौर पर जून-जुलाई में ही इस स्तर तक पहुंचती थी, जब उत्तरी भारत के कुछ हिस्सों में गर्मी अपने चरम पर होती है।

बिजली की बढ़ी हुई मांग इस बात का संकेत है कि कूलिंग उपकरणों का इस्तेमाल बहुत तेजी से बढ़ा है। मांग में यह उछाल मुख्य रूप से घरों और कार्यालयों में एयर कंडीशनिंग और कूलिंग उपकरणों के अत्यधिक उपयोग के कारण है, जो शहरों के बढ़ते तापमान के प्रभाव को और अधिक जटिल बना रहा है|

जलवायु परिवर्तन और सामाजिक असमानता

जलवायु परिवर्तन की मार का सबसे वीभत्स चेहरा शहरी गरीब इलाकों में देखने को मिलता है। दिल्ली जैसे विशाल शहरों में, जिन्हें "शहरी ताप द्वीप" (Urban Heat Island) कहा जाता है, जहाँ तापमान सामान्य  से 5 से 7 डिग्री अधिक तक दर्ज किया जाता है । यह कंक्रीट का जंगल, जहां ऊँची इमारतें और सड़कों का जाल गर्मी को बढ़ा रहा है, जो कि  गरीब बस्तियों के लिए एक तंदूर की तरह काम करता है।

निर्माण मजदूर, रिक्शा चालक और फेरीवाले, जो दिन भर चिलचिलाती धूप में सड़कों पर मेहनत करते हैं, उनके पास न तो पर्याप्त आश्रय है और न ही एयर कंडीशनिंग जैसी सुविधाएं। एक नए अध्ययन से यह भी स्पष्ट होता है कि कम आय वाले लोग, जो निजी वाहनों के बजाय पैदल या सार्वजनिक परिवहन पर निर्भर हैं, उन्हें काम पर जाने के लिए अनिवार्य रूप से भीषण गर्मी का सामना करना पड़ता है।

विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2050 तक खतरनाक गर्मी की चपेट में आने वाले शहरी गरीबों की संख्या में 700% तक की वृद्धि हो सकती है, जिसका सबसे ज्यादा बोझ एशिया जैसे विकासशील क्षेत्रों पर पड़ेगा।

 अत्यधिक गर्मी केवल पसीने और थकान की बात नहीं रह जाती, बल्कि यह जीवन और मृत्यु का प्रश्न बन जाती है। आर्थिक रूप से कमजोर लोग न केवल खराब आवास में रहते हैं, बल्कि उन्हें स्वच्छ पेयजल की भारी किल्लत का भी सामना करना पड़ता है, जो निर्जलीकरण (डिहाइड्रेशन ) और हीट स्ट्रोक के जोखिम को और बढ़ा देता है।

अत्यधिक गर्मी स्वास्थ्य जोखिम पैदा करती हैं, खासकर उन लोगों के लिए जिनके पास पर्याप्त आश्रय, शीतलन प्रणाली और स्वास्थ्य सेवा तक पर्याप्त पहुंच नहीं है। गरीब लोग अक्सर भीड़भाड़ वाले और खराब हवादार घरों में रहते हैं, जिससे भीषण गर्मी से बचना मुश्किल हो जाता है। इससे कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं होती है जिसका असर उनकी आर्थिक स्थिति के कारण अधिक बढ़ जाता है।

अभी अत्यधिक गर्मी की स्थिति आये दो ही सप्ताह हुए है लेकिन गर्मी की वजह से मौतों की खबर आने की शुरुआत हो गयी है|  लंबे समय तक अधिक गर्मी के संपर्क में रहने से हीट स्ट्रोक होता है, जिसका अगर तुरंत इलाज न किया जाय तो जानलेवा हो सकता है। मोनाश विश्वविद्यालय, ऑस्ट्रेलिया में हुए एक शोध के अनुसार दुनिया भर में प्रति वर्ष 1.53 लाख से अधिक मौतें अत्यधिक गर्मी के कारण होती हैं।

साल 1990 के बाद से 30 वर्षों के आंकड़ों को देखने वाले शोध के अनुसार, दुनिया भर में हर साल 1.53 लाख से अधिक मौतें हीटवेव के कारण होती हैं। इन मौत के आंकड़ों में से पांचवां हिस्सा और सबसे बड़ा हिस्सा भारत से आता है| वहीं, भारत के बाद चीन और रूस का नंबर आता है, जिनमें से प्रत्येक में क्रमशः लगभग 14 प्रतिशत और 8 प्रतिशत हीटवेव से जुड़ी अतिरिक्त मौतें होती हैं।

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) की रिपोर्ट के अनुसार, गरीब किसान भीषण गर्मी के कारण हर साल अपनी आय का लगभग पांच प्रतिशत खो देते हैं, क्योंकि उनके पास आय के अन्य स्रोत सीमित होते हैं। जब पेट भरने के लिए बाहर निकलना मजबूरी हो, तो स्वास्थ्य सेवाओं और उपचार तक पहुंच का अभाव इस संकट को और गहरा कर देता है। इस वित्तीय अस्थिरता के दौर में, उन्हें स्वास्थ्य और पानी जैसी बुनियादी जरूरतों पर भी अपनी सीमित आय का एक बड़ा हिस्सा खर्च करने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जिससे गरीबी का चक्र और अधिक विकराल हो जाता है ।

देहरादून में घरों में काम करने वाली किरन देवी कहती हैं, "कुछ साल पहले तक पंखे से गर्मियों में हमारा काम चल जाता था, लेकिन हर साल बढ़ रही गर्मी से हमारे लिए रहने लायक स्थितियां नहीं रह गई है। बढ़ी हुई गर्मी की वजह से दिन में एक-दो घंटा बिजली का जाना बहुत आम हो जाता है और गर्मियों में बिजली कटौती केवल एक बार नहीं बल्कि दिनभर में कई कई बार होती है। हम शायद इन सब चीजों को झेल भी लेंते लेकिन घर में छोटे बच्चे और बुजुर्ग इस गर्मी को झेलने में असमर्थ हैं। मेरे पति मजदूरी का काम करते हैं गर्मी में उन्हें काम भी कम मिलता है और जिसकी वजह से हमारा घर का खर्च ही बहुत मुश्किल से निकल पाता है। लेकिन लगातार बिजली कटौती से इनवर्टर और कूलर ने हमारे खर्च को बढ़ा दिया है। हम ना चाहते हुए भी इसे खरीदने के लिए मजबूर है। शायद अगर बार-बार बिजली में कटौती न होती तो हम पर इनवर्टर का बोझ नहीं पड़ता।"

इसी तरह का हाल दिल्ली में घरों में काम करने वाली मेहर का भी है। मेहर कहती है कि "गर्मियों में हमारे लिए पानी सबसे बड़ी समस्या बन कर आता है। इस अत्यधिक गर्मी में पंखे से काम नहीं चल रहा है। इस लिए कूलर पर खर्च करना पड़ता है। गर्मी बढ़ने की वजह से कूलर के दाम बहुत बढ़ जाते है लेकिन हम मजबूरी में क्या कर सकते थे।"

बढ़ी हुई अत्यधिक गर्मी का कारण, वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन को मानते हैं। इस जलवायु परिवर्तन ने न केवल गर्मी को बढ़ाया है बल्कि मानसून के समय को भी बदल दिया है। भारत की अधिकतर खेती मानसून पर निर्भर करती है लेकिन अब इसके बदले हुए समय की वजह से और जलवायु परिवर्तन के कारण कभी सूखा, तो कभी अत्यधिक बारिश की वजह से बाढ़ जैसी स्थितियां कृषि के क्षेत्र को प्रभावित कर रही है। जिसका असर खेती किसानी से जुड़े लाखों परिवारों पर पड़ रहा है।

नीतिगत हस्तक्षेप और भविष्य की राह

भारत में गरीब समुदायों पर गर्मी की लहरों के इस प्रतिकूल प्रभाव को संबोधित करने के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण की तत्काल आवश्यकता है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के शहरों को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बनाने के लिए वर्ष 2050 तक 2.4 ट्रिलियन डॉलर से भी अधिक के निवेश की आवश्यकता है । हमें तत्काल राहत उपायों के साथ-साथ दीर्घकालिक रणनीतियों पर काम करना होगा, ताकि अत्यधिक गर्मी के प्रभाव को कम किया जा सके। इसमें शहरों में हरित आवरण (ग्रीन कवर ) बढ़ाना, ठंडी छतों (कूल रूफ) का निर्माण करना और जल निकायों का संरक्षण करना शामिल है।

अभी जबकि भारत में दुनिया के सबसे अधिक गर्म शहर है तब हमारे देश में अलग अलग हिस्सों में विकास परियोजनाओ के लिए जंगलों को काटने की स्वीकृति सरकार ने दी है| उड़ीसा, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, अंदमान निकोबार, पूर्वोत्तर भारत में लाखों पेड़ों को काट कर स्थानीय लोगों को कई तरह के डर दिखा कर  विस्थापित किया जा रहा है| जो लोग विरोध कर रहे है उन पर मुक़दमे कर आन्दोलन को दबाया जा रहा है| दुनिया भर के पर्यावरणविद तेजी से हो रहे मौसमी बदलावों से बचने के लिए दीर्घकालिक उपाय के तौर पर जंगलों को बचाने की वकालत करते है| लेकिन दुनिया भर में विकास के लिए इन्ही जंगलों को तेजी से काटा जा रहा है| सरकारें और जनता तात्कालिक उपायों पर ध्यान दे रही है लेकिन बिना दीर्घकालिक उपायों के इस वैश्विक समस्या से नही बचा जा सकता है|

मौसम के अप्रत्याशित बदलावों के व्यापक सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभाव भी होते हैं जो अलग अलग समुदायों को असमान रूप से प्रभावित करता हैं। गर्मी की लहरें अक्सर सूखे की स्थिति पैदा करती हैं, जिसके परिणामस्वरूप पानी की कमी होती है। गरीब समुदाय, जिनके पास पहले से ही स्वच्छ पानी तक सीमित पहुंच है, उन्हें पीने, खाना पकाने और स्वच्छता के लिए पर्याप्त पानी हासिल करने में गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। अत्यधिक गर्मी लोगों को बेहतर रहने की स्थिति और रोजगार के अवसरों की तलाश में ग्रामीण क्षेत्रों से, शहरी क्षेत्रों में पलायन करने के लिए मजबूर करती है। यह प्रवास अक्सर शहरी झुग्गियों की ओर ले जाता है, जहां रहने की स्थिति पहले से ही बहुत खराब है।

सरकारी स्तर पर ऐसी सामाजिक सुरक्षा नीतियां और रोजगार गारंटी योजनाएं लाई जानी चाहिए जो अत्यधिक गर्मी के दौरान श्रमिकों को वित्तीय सुरक्षा प्रदान कर सकें। आपदा प्रबंधन के दायरे को बढ़ाकर उसमें 'हीट वेव' को एक प्रमुख खतरे के रूप में शामिल करना और गरीब परिवारों को सब्सिडी वाले शीतलन समाधान प्रदान करना भविष्य की तैयारी के लिए अनिवार्य है । एक न्यायसंगत और टिकाऊ भविष्य के निर्माण के लिए जरूरी है कि हम जलवायु न्याय (Climate Justice) के सिद्धांत को अपनाएं। जब तक हम बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य सेवा और पर्यावरणीय सुरक्षा में समान रूप से निवेश नहीं करेंगे, तब तक यह तपती गर्मी न केवल हमारे पर्यावरण को, बल्कि हमारे समाज की सामाजिक और आर्थिक नींव को भी कमजोर करती रहेगी। अत्यधिक गर्मी की यह बढ़ती हुई चुनौती अब केवल एक मौसम की घटना नहीं, बल्कि हमारे विकास और नीति निर्माण की सबसे बड़ी परीक्षा भी है।

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