तृष्णा सरकार - अर्थशास्त्री, डॉ भीमराव आंबेडकर कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय

“हर सांस की कीमत”

प्रदूषण ने सामान्य जीवन जीने को भी बेहद महंगा और मुश्किल बना दिया है
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इस सर्दी में एक दिन जब मैं दिल्ली में मेट्रो स्टेशन जाने के लिए एक परिचित फुटब्रिज चढ़ रही थी, अचानक मेरे सीने में कसाव महसूस हुआ। हवा सामान्य से भारी महसूस हो रही थी जो सीधा फेफड़ों पर दबाव डाल रही थी। सीढ़ियों के बीच में ही मुझे रुकना पड़ा, थकान की वजह से नहीं बल्कि इसलिए कि सांस लेना मुश्किल हो गया था। मैं रेलिंग पकड़कर खड़ी हो गई और आने-जाने वालों को देखती रही, जो उस स्याह धुंध में गुजर रहे थे, जिसे हम अब सामान्य मानने लगे हैं।

मैं फिर चल पड़ी और दिमाग में एक ही विचार बार-बार लौटता रहा। मुझे टैक्सी ले लेनी चाहिए थी। घर छोड़ते ही यह विचार अब लगातार बना रहता है। इस सर्दी में जब प्रदूषण स्तर बढ़ गया, मैं प्रति माह 15,000 से 20,000 रुपए टैक्सी में खर्च कर रही हूं। सुविधा के लिए नहीं बल्कि उस हवा से बचने के लिए जो अब एक हमला करने वाली दुश्मन की तरह लगती है।

विडंबना यह है कि अपनी सेहत की रक्षा करते हुए मैं उसी प्रदूषण में योगदान कर रही हूं जो शहर को घुटने पर ला रहा है।

एक अर्थशास्त्री के तौर पर यह विरोधाभास मुझे बेचैन करता है। उपभोक्ता-प्रधान समाज में हम यह मानने के लिए तैयार हो गए हैं कि कुछ भी मुफ्त नहीं आता लेकिन प्रकृति से मिलने वाले एकदम मुफ्त उपहार जैसे सूरज की रोशनी, पानी और हवा के बारे में क्या? आज हम शुद्ध हवा के लिए एयर प्यूरीफायर, मास्क, नेबुलाइजर और ऑक्सीजन किट पर खर्च कर रहे हैं और शुद्ध पानी के लिए फिल्ट्रेशन सिस्टम पर। जब ये मूलभूत संसाधन भी कीमत पर बिकने लगते हैं तो हमें नदी, पहाड़, जंगल, बादल या हवा की कीमत कैसे आंकनी चाहिए?

समस्या यह है कि हम दोष लगाने में हिचकते हैं। हम संकट को पहचानते हैं, लेकिन अपनी भूमिका स्वीकार करने में झिझकते हैं। सहकर्मियों से बातचीत में यह साफ होता है कि बोझ कितना व्यापक है। लगभग हर किसी के पास प्रदूषण से लगातार घटती सुविधा, स्वास्थ्य और वित्तीय स्थिति की कहानी होती है।

एक सहकर्मी, जिनके घर में अस्थमा से पीड़ित लोग हैं उन्होंने अपने घर में 10 एयर प्यूरीफायर लगाए हैं। रसोई और कार की तरह साफ हवा भी एक बड़ा खर्च बन गई है। अन्य लोग छोटी दूरी तय करने के लिए पैदल चलना छोड़ चुके हैं क्योंकि धुंध और धूल असहनीय हो गई है। सप्लीमेंट, इम्यूनिटी बूस्टर और मेडिकल सलाह पर खर्च बढ़ गया है। स्वस्थ रहना अब लगातार हस्तक्षेप की मांग करता है। यहां तक कि हंसी भी अब तनाव को छिपा नहीं पाती।

एक दिन मेरे एक सहकर्मी ने मजाक में कहा कि प्रदूषण से उसके एलर्जी और बाल झड़ने की समस्या बढ़ गई है और इसलिए हेयर और स्किन केयर पर खर्च बढ़ गया। इस मजाक के पीछे एक साझा हकीकत छिपी हुई है। अध्ययनों के अनुसार, दिल्ली के 80 प्रतिशत निवासी अत्यधिक प्रदूषण वाले महीनों में बार-बार खांसी, आंखों में जलन, थकान और सांस लेने में कठिनाई जैसी समस्याओं का सामना करते हैं। अध्ययन बताते हैं कि लंबे समय तक पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) 2.5 के संपर्क में रहने से हर साल हजारों लोग समय से पहले मौत के शिकार होते हैं।

राजधानी में आए छोटे शहरों से आए छात्रों के लिए यह बोझ और भी भारी है। वह बेहतर शिक्षा और अवसर की तलाश में दिल्ली आते हैं, लेकिन उन्हें पता चलता है कि मूलभूत आवश्यकताएं जैसे साफ हवा, शुद्ध पानी और सुरक्षित भोजन भी भारी कीमत पर मिलती हैं।

एक शिक्षक के रूप में मैं इसे अक्सर फेफड़ों के संक्रमण, पीलिया, एलर्जी, नींद और तनाव से जुड़ी बीमारियों के रूप में देखती हूं। जिन परिवारों के पास सीमित साधन हैं, उन्हें अब चिकित्सा, प्यूरीफायर और सुरक्षित भोजन पर पैसा खर्च करना पड़ता है ताकि उनके बच्चे सांस ले सकें। फुटब्रिज पर ठहर जाने का वह क्षण केवल व्यक्तिगत असुविधा नहीं थी।

यह लाखों लोगों की रोजमर्रा की वास्तविकता की एक झलक थी। जो हमें व्यक्तिगत असुविधा लगती है, वह वास्तव में एक सामूहिक संघर्ष का हिस्सा है, जिसमें सामान्य जीवन जीना दरअसल बेहद महंगा और मुश्किल बन गया है।

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