पर्यावरण के प्रति जागरूकता: धीमी लेकिन सुचिंतित जीवन की ओर कदम
इस गर्मी में जब मैं अपने परिवार के साथ अपनी मौसी के घर गई तो उन्होंने हमारा स्वागत प्यार और कपड़ों से किया जो भारतीय घरों में एक सामान्य उपहार है। मेरे बच्चे उन चमकीले, रंगीन कपड़ों को देखकर बहुत खुश थे। हालांकि, मेरा दिल बैठ गया। हकीकत ने मेरी उस योजना को तहस-नहस कर दिया था जिसे मैं लंबे समय से संजो रही थी, वह यह कि हमारा परिवार सूती के अलावा कोई नया कपड़ा नहीं खरीदेगा। कपड़ा मिलों के एक दौरे ने मुझे यह संकल्प लेने के लिए प्रेरित किया था। फिर भी, “पेट्रोलियम-आधारित सिंथेटिक” कपड़ों का एक और ढेर लगने के विचार ने उपहार मिलने की खुशी को फीका कर दिया। पर्यावरण के प्रति जागरुकता एक बोझिल साथी हो सकती है, जिससे बचना आसान नहीं है।
मैं टूटे हुए प्लास्टिक के खिलौनों, रासायनिक गोंद, ऑनलाइन ऑर्डर से आने वाली तीन-परत वाली पैकेजिंग और यहां तक कि उन “अनबॉक्सिंग” वीडियो की आवाज से भी सिहर जाती हूं जिन्हें मेरे बच्चे पसंद करते हैं। इनके परिणामस्वरूप पैदा होने वाले कचरे के प्रबंधन का विचार मुझे बेचैन कर देता है। हमारे घर से चीजों को बस कूड़ेदान में फेंक देना एक दशक पहले ही वर्जित कर दिया गया था, जब हमने महसूस किया कि स्थिरता के लिए भौतिक न्यूनतमवाद से कहीं अधिक की आवश्यकता है। अगर हम प्रकृति के जादू को महसूस करना चाहते थे तो हमें अपने जीवन को उसके साथ तालमेल में लाना था। इस डर से पार पाने (बिना वेतन या सुख-सुविधाओं के रहने के) में समय लगा। कोविड-19 महामारी की पहली लहर के बाद हमने अपना अधिकांश सामान बेच दिया और गुजरात के एक गांव में बस गए। मेरे पार्टनर ने अपनी कॉर्पोरेट नौकरी से विराम लिया और मैंने खर्चों को पूरा करने के लिए अतिरिक्त फ्रीलांस काम शुरू किया। यह योजना बिल्कुल साफ थी कि धीरे-धीरे एक जैविक फार्म बनाना और उसी पर निर्भर रहना है।
आदर्शवाद कुछ हद तक काम आया। कार्यालय के जीवन से मुक्ति और काम पर न जाने की स्वतंत्रता अद्वितीय थी और इसके साथ समय की विलासिता भी मिली। हमने लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाना सीखा, जड़ी-बूटियां उगाईं, केवल भूख लगने पर ताजा भोजन किया, खाद बनाई, पेड़ों से फलों को संरक्षित किया, घास से पायदान बुने और सब्जियों के लिए साप्ताहिक हाट तक लंबी सैर की। हमने बिना रेफ्रिजरेटर के गुजारा किया और घर से रसायनों वाले प्रसाधनों और क्लीनर को बाहर का रास्ता दिखा दिया। हमें नाश्ता पसंद है, जिसका मतलब था अक्सर बेकिंग करना और बाजार में अपना डिब्बा साथ ले जाना। सबसे बड़ी राहत बच्चों को हमेशा दिखावटी कपड़ों में रखने की चिंता न करना था।
यह सच है कि सचेत जीवन “धीमा” होता है। दैनिक कामकाज घंटों खा जाते हैं। बिना नल के बहते पानी के राख से बर्तन धोने में समय लगता है। सोच-समझकर खरीदारी करने में समय लगता है। कटहल और आमों को बर्बाद होने से बचाने में समय लगता है। पड़ोसियों से यह कौशल सीखने में समय लगता है। हमारे शहरी दिमाग, जिन्हें हर घंटे का मौद्रिक मूल्य आंकने का प्रशिक्षण मिला है, इसे एक लंबी छुट्टी के रूप में देखने लगे, ऐसी छुट्टी जिसे खत्म होना ही था। दुनिया जैसे जिद कर रही हो, “अपनी शिक्षा का उपयोग करो, पैसा कमाओ, अपने करियर में आगे बढ़ो।” हमने उनकी बात सुनी और कॉर्पोरेट जीवन में वापस लौट आए, जहां समय भाप बनकर उड़ जाता है। और हम पहले से कहीं अधिक तीव्रता से इस बात से चकित रह गए कि आधुनिक शहरी जीवन मितव्ययिता के लिए कितनी कम जगह छोड़ता है।
अब हम दूसरों को घरेलू काम करने के लिए भुगतान करने हेतु कमाते हैं और इसे रोजगार सृजन कहकर उचित ठहराते हैं। हम छोटी यात्राओं के लिए भी ईंधन जलाते हैं क्योंकि चलने के लिए न तो समय है और न ही सड़क पर जगह। ज्यादातर चीजें ऑनलाइन ऑर्डर करते हैं, सामग्री पर ध्यान दिए बिना खिलौनों के लिए बच्चों की मांगों के आगे झुक जाते हैं और तनाव के कारण बाहर भोजन करने के आदी हो जाते हैं। संक्षेप में हम वही उपभोक्तावादी जीवन जी रहे हैं जिससे हम कभी भाग गए थे।
मितव्ययिता की कुछ आदतें अब भी बनी हुई हैं। मैं अब भी भोजन को संरक्षित करती हूं और पुनः उपयोग के लिए प्लास्टिक के पैकेट धोती हूं। और मैं अनिच्छा से ही सही, अब (इन चीजों को) जाने देना सीख रही हूं।


