

वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों के अनियंत्रित उत्सर्जन के कारण बढ़ते वैश्विक तापमान के खतरनाक असर दुनिया को आगे भी झेलने पड़ेंगे।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की ओर से प्रकाशित ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन पर वैश्विक आकलन की 17वीं रिपोर्ट ‘एमिशन गैप रिपोर्ट 2026: द पॉइंट ऑफ रिटर्न’ में चेतावनी दी गई है कि औद्योगिक काल से पहले के स्तर की तुलना में वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने की संभावना अब खत्म हो गई है। इसमें तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक बढ़ने से रोकने या इस सीमा को मामूली समय के लिए ही पार होने देने की संभावना भी समाप्त होने की बात कही गई है।
पेरिस जलवायु समझौते के तहत तय 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार करने से जलवायु संकट और गंभीर हो जाएगा।
यूएनईपी ने चेतावनी दी है कि तापमान में हर अतिरिक्त वृद्धि और 1.5 डिग्री सेल्सियस से ऊपर रहने वाला हर अतिरिक्त साल जलवायु संबंधी जोखिमों को बढ़ाएगा। हालांकि, 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को भी कभी पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना गया है।
यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है, जब दुनिया के कई हिस्सों में तापमान के पुराने रिकॉर्ड टूट रहे हैं। वर्ष 2024 में पहली बार दुनिया का औसत तापमान औद्योगिक काल से पहले के स्तर की तुलना में 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक दर्ज किया गया।
सितंबर 2026 अब तक दर्ज किया गया दूसरा सबसे गर्म सितंबर रहा। इस महीने वैश्विक औसत तापमान 16.27 डिग्री सेल्सियस रहा, जो 1991-2020 के औसत से 0.82 डिग्री सेल्सियस और औद्योगिक काल से पहले के स्तर से 1.63 डिग्री सेल्सियस अधिक था। कॉपरनिकस जलवायु परिवर्तन सेवा के अनुसार, अगस्त 2026 भी अब तक दर्ज सबसे गर्म महीनों में से एक रहा।
यूएनईपी के वार्षिक आकलन के मुताबिक, 2025 में वैश्विक ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन 2024 के मुकाबले मामूली रूप से घटा। रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में कुल उत्सर्जन 58.4 गीगाटन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य रहा। यह 2024 के स्तर से 0.1 गीगाटन कम है।
दुनिया में ग्रीनहाउस गैसों के कुल उत्सर्जन में दो-तिहाई से अधिक हिस्सा जीवाश्म ईंधनों से होने वाले उत्सर्जन का है। शेष उत्सर्जन भूमि उपयोग, भूमि उपयोग में बदलाव और वानिकी (एलयूएलयूसीएफ) से होने वाले कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड और फ्लोरीनयुक्त गैसों (एफ-गैसों) से होता है।
हालांकि, कुल उत्सर्जन में आई मामूली गिरावट एक चिंताजनक स्थिति को छिपाती है। वर्ष 2025 में जीवाश्म ईंधनों से होने वाला कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन लगातार बढ़ता रहा।
‘एमिशन गैप रिपोर्ट 2026’ के अनुसार, 2025 में तेल, कोयले और गैस के जलने से होने वाला कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन बढ़ा। नाइट्रस ऑक्साइड और फ्लोरीनयुक्त गैसों का उत्सर्जन भी बढ़ा, जबकि मीथेन का उत्सर्जन 2024 के लगभग समान रहा।
आकलन के मुताबिक, जीवाश्म ईंधनों से होने वाले कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में इस वृद्धि की भरपाई भूमि उपयोग, भूमि उपयोग में बदलाव और वानिकी क्षेत्र से होने वाले उत्सर्जन में लगभग 0.5 गीगाटन सीओ2ई की कमी से हुई। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस क्षेत्र में उत्सर्जन घटने की एक वजह जैव ईंधन के जलने से होने वाले उत्सर्जन में कमी थी। इसमें जंगलों में लगने वाली आग से निकलने वाले कार्बन उत्सर्जन में आई गिरावट भी शामिल है। वर्ष 2025 में जंगलों की आग से होने वाला वैश्विक कार्बन उत्सर्जन 2024 के असाधारण रूप से सक्रिय अग्निकाल की तुलना में कम रहा।
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि वैश्विक ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन न तो अपने चरम पर पहुंच रहा है और न ही स्थिर हो रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, अफ्रीकी संघ को छोड़कर जी-20 के सदस्य देशों की हिस्सेदारी दुनिया के कुल उत्सर्जन में 76 फीसदी है। इन देशों में भूमि उपयोग, भूमि उपयोग में बदलाव और वानिकी क्षेत्र (एलयूएलयूसीएफ) से होने वाले उत्सर्जन को छोड़कर, वर्ष 2025 में कुल उत्सर्जन में 0.7 फीसदी की वृद्धि हुई।
पिछले एक दशक में 63 देशों ने अपने ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी की है। हालांकि, 124 देशों में उत्सर्जन बढ़ा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रति व्यक्ति उत्सर्जन और ऐतिहासिक उत्सर्जन के लिहाज से अधिक योगदान देने वाले कई देशों में उत्सर्जन का चरम स्तर अब तक नहीं आया है।
रिपोर्ट का स्पष्ट निष्कर्ष है कि अब 21वीं सदी के अंत तक वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक वापस लाने के लिए उत्सर्जन में कटौती की रफ्तार तेज करनी होगी। रिपोर्ट के अनुसार, अब लक्ष्य यह होना चाहिए कि तापमान वृद्धि 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को जितने कम समय और जितनी कम मात्रा में पार करे, उतना बेहतर हो। इसके बाद सदी के अंत तक तापमान को फिर से इस सीमा तक लाना होगा।
तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक होने से यथासंभव कम रोकने वाले परिदृश्य के तहत रिपोर्ट कहती है कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए वर्ष 2025 के स्तर की तुलना में वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 2030 तक 18 फीसदी, 2035 तक 45 फीसदी और 2040 तक 69 फीसदी की कटौती करनी होगी। तापमान को फिर से 1.5 डिग्री सेल्सियस या उससे नीचे लाने के लिए वायुमंडल से बड़े पैमाने पर कार्बन डाइऑक्साइड हटाने की भी जरूरत होगी।
वैश्विक विज्ञान एवं नीति संस्थान क्लाइमेट एनालिटिक्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी बिल हेयर ने कहा, “मुख्य संदेश सीधा है- सरकारों को जल्द से जल्द जीवाश्म ईंधनों के इस्तेमाल में कटौती करने वाली नीतियां लागू करनी चाहिए।”
उन्होंने आगे कहा, “हमारे अपने विश्लेषण से पता चलता है कि यदि सरकारें अधिकतम संभव महत्वाकांक्षा के साथ कदम उठाती हैं, तो हम सदी के मध्य तक वैश्विक तापमान वृद्धि को लगभग 1.7 डिग्री सेल्सियस पर रोक सकते हैं और सदी के अंत तक इसे घटाकर 1.5 डिग्री सेल्सियस से काफी नीचे ला सकते हैं।”