

मैं जून के अंत में बैठकों के सिलसिले में यूरोप में थी और वहां भीषण गर्मी पड़ रही थी। हालात ऐसे थे कि मुझ जैसी भारतीय के लिए भी, जो अधिक तापमान की आदी हैं, सूरज की जलन बहुत ही असहनीय थी। यह भी स्पष्ट था कि ये देश गर्मी के हिसाब से “डिजाइन” नहीं किए गए हैं। चाहे उनकी इमारतें हों या तापमान नियंत्रित करने वाले उपकरण।
जब मैं घर वापस आ रही थी तब भारत में मानसून दस्तक दे चुका था। देश की आर्थिक राजधानी, कभी न रूकने वाली मुंबई थम चुकी थी, बाढ़ का पानी सड़कों पर भर गया और घरों में घुस गया। हिमालय और पश्चिमी घाट में बादल फटने की घटनाओं के फलस्वरूप भूस्खलन और संपत्ति का भारी नुकसान हुआ। इसके अलावा कई सड़कों और पुलों को हुए नुकसान की खबरें भी सामने आईं, जिनमें से कुछ तो हाल ही में बने थे। यह निवेश स्पष्ट रूप से जलवायु की उस चरम सीमा के प्रति लापरवाह था जिसका हम अब सामना कर रहे हैं। जब मैं यह लिख रही हूं तब न्यूयॉर्क भीषण तूफान और बाढ़ से जूझने की तैयारी कर रहा है और यह सब केवल एक सप्ताह के भीतर घटित हुआ है।
यदि अब भी कोई जलवायु परिवर्तन के प्रभाव पर सवाल उठाता है तो वह वास्तविकता से दूर और मानसिक भ्रम में जी रहा है। जलवायु मॉडलों ने पहले ही भविष्यवाणी की थी कि जैसे-जैसे तापमान बढ़ेगा, मौसम का मिजाज और अधिक अनिश्चित और चरम होता जाएगा।
अब समय आ गया है कि हम यह स्वीकार करें कि ग्रह के बढ़ते तापमान को रोकने के लिए हम जो कुछ कर रहे हैं वह आवश्यकता से बहुत कम है। हमें संभलने और एकजुट होकर काम करने की आवश्यकता है। दुखद यह है कि हम न केवल अपने रोजमर्रा के जीवन में बल्कि उस दृष्टिकोण के हिसाब से भी पीछे जा रहे हैं जो दुनिया को एक बेहतर जगह बना सकता था।
सच तो यह है कि ग्रीन टेक्नोलॉजी (हरित तकनीक) अपनी जगह बना रही है। यह जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए नहीं, बल्कि ऊर्जा और आर्थिक दृष्टि से अधिक व्यावहारिक होने के कारण अपनाई जा रही है।
जीवाश्म ईंधन के दौर से गुजरे बिना सीधे सौर ऊर्जा की ओर बढ़ना तब कारगर होता जब सौर पैनलों और बैटरी की लागत विद्युत ग्रिड बनाने और स्थापित करने से कम हो, जिसमें वैसे भी समय लगता है। देश अपनी घरेलू प्राथमिकताओं के आधार पर निर्णय ले रहे हैं और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम होना इसका एक अतिरिक्त लाभ या सह-लाभ है।
उदाहरण के तौर पर वाहनों के विद्युतीकरण को बढ़ावा देने के लिए दिल्ली सरकार की हालिया नीति को लें। यह एक साहसिक नीति है और गेम-चेंजर साबित हो सकती है। यह नीति इलेक्ट्रिक दोपहिया, तिपहिया और हल्के व्यावसायिक वाहनों को अपनाने का अनिवार्य प्रावधान करती है।
इसके तहत जनवरी 2027 तक शहर में सार्वजनिक परिवहन के रूप में बड़े पैमाने पर उपयोग किए जाने वाले केवल इलेक्ट्रिक तिपहिया और हल्के व्यावसायिक वाहनों के ही पंजीकरण की अनुमति होगी। अप्रैल 2028 तक केवल इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों का ही पंजीकरण हो सकेगा। यह नीति खरीद के लिए वित्तीय प्रोत्साहन और एक मजबूत स्क्रैपेज पॉलिसी (पुराने वाहनों को हटाने की नीति) को एक साथ जोड़ती है ताकि पुराने वाहनों को हटाकर उनके स्थान पर नए ईवी लाए जा सकें।
इस नीति का मुख्य उद्देश्य शहर में वायु प्रदूषण को नियंत्रित करना है। यही कारण है कि दोपहिया वाहनों पर इतना ध्यान दिया गया है। शहर में हर दिन लगभग 1,000 नए दोपहिया वाहन पंजीकृत होते हैं जो अपनी बड़ी संख्या के कारण प्रदूषण के बोझ को और बढ़ा देते हैं।
इसी तरह पैरा-ट्रांजिट (सार्वजनिक परिवहन से जोड़ने वाली छोटी परिवहन सेवाएं) सार्वजनिक परिवहन से जुड़ने के लिए एक महत्वपूर्ण प्रणाली है। शहर अब इलेक्ट्रिक बसों के बेड़े को अपनाने की ओर बढ़ रहा है और अपनी विस्तृत मेट्रो प्रणाली के साथ, यह दिल्ली के लिए हरित परिवहन भविष्य का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।
दिल्ली की इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) 2026 नीति में व्यक्तिगत वाहनों के लिए सीमित वित्तीय प्रोत्साहन दिए गए हैं और ऐसा होना भी चाहिए, क्योंकि ये वाहन सड़क पर बहुत अधिक जगह घेरते हैं और भीड़भाड़ पैदा करते हैं जो प्रदूषण को और बढ़ाता है। यह इलेक्ट्रिक-वाहन ‘‘ट्रांजिशन’’ जलवायु परिवर्तन को कम करने के लिए डिजाइन नहीं किया गया है, लेकिन यदि यह सफल होता है तो इससे दिल्ली के ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में निश्चित रूप से कमी आएगी।
यही वह क्षेत्र है जहां शहर तेजी से बदलाव ला सकते हैं क्योंकि स्वच्छ हवा की घरेलू आवश्यकता ही दुनिया को अधिक जलवायु-सुरक्षित भविष्य की ओर ले जा सकती है।
लेकिन यहां इन सभी प्रयासों के लिए निरंतर और सघन ‘‘फॉलो थ्रू’’ की आवश्यकता होगी। इसके लिए पुराने वाहनों को कबाड़ में डालना होगा होगा ताकि बेड़े का वास्तविक परिवर्तन हो सके। चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को व्यवस्थित करना होगा ताकि सार्वजनिक वाहनों के पास विश्वसनीय सुविधा हो; और निश्चित रूप से यह सुनिश्चित करना होगा कि ये सभी प्रयास सामूहिक रूप से सार्वजनिक परिवहन को प्रभावी बनाएं।
लोगों को व्यक्तिगत वाहनों से बाहर निकालने का एकमात्र तरीका यह है कि हम सार्वजनिक परिवहन प्रणाली को इतना विश्वसनीय, सुविधाजनक और किफायती बनाएं कि उसका उपयोग करना ही सबसे बेहतर विकल्प लगे। कोई भी ट्रैफिक में फंसना या प्रदूषित हवा में सांस लेना नहीं चाहता । यह एक ऐसा बदलाव है जिसे हम सभी चाहते हैं।
यह भी स्पष्ट है कि हम उन्नत सार्वजनिक परिवहन नेटवर्क में जितना अधिक निवेश करेंगे, यह आजीविका सुरक्षित करने के लिए उतना ही बेहतर होगा। इससे रिहायशी इलाकों की कीमतें भी सुधरेंगी क्योंकि लोग वहां रह सकते हैं, जहां जमीन सस्ती है और रोजगार के केंद्रों तक आसानी से आ-जा सकते हैं। इसके लिए योजना बनाने में कल्पनाशीलता, बड़े पैमाने पर क्रियान्वयन और कार्यों में तत्परता की आवश्यकता है।
यही वास्तव में जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी चुनौती है। ऐसी दुनिया में रहना जहां मौसम हमारे खिलाफ होता जा रहा है। हमें ऐसे समाधानों की आवश्यकता है जो हमारी दुनिया में बदलाव की गति को तेज करें। आर्थिक विकास का वह मॉडल जिसने हमें जलवायु आपदा के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है, एक ऐसा मॉडल है जिसमें पहले विकास किया जाता है और फिर उसकी पर्यावरणीय लागतों को सुधारने व कम करने के लिए निवेश की आवश्यकता पड़ती है। हमें विकास के नए तरीके खोजने होंगे न कि पुराने तरीकों को ही दोहराना होगा। जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई को जीतने का यही एकमात्र रास्ता है।