

पर्माफ्रॉस्ट पिघलने पर 25-100 गुना अधिक गैसें वातावरण में निकलती हैं।
पूरी दुनिया के पर्माफ्रॉस्ट में लगभग 1,700 अरब टन कार्बन है मौजूद है, जो वातावरण से तीन गुना अधिक है।
आर्कटिक क्षेत्र 4 गुना तेजी से गर्म हो रहा है।
पर्माफ्रॉस्ट का पिघलना जलवायु परिवर्तन को तेज करने वाला सकारात्मक फीडबैक लूप बनाता है।
पर्माफ्रॉस्ट पिघलने से रेडॉन जैसी रेडियोधर्मी गैस भी निकल सकती है, जो आर्कटिक निवासियों के स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकती है।
हाल ही में लीड्स विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण शोध किया है, जो जलवायु परिवर्तन के बारे में हमारी समझ को और गहरा करता है। अर्थ फ्यूचर नामक पत्रिका में प्रकाशित इस शोध में बताया गया है कि जैसे-जैसे पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, वैसे-वैसे पर्माफ्रॉस्ट (जमी हुई मिट्टी) पिघल रही है। यह पिघलना केवल एक सामान्य प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इससे वातावरण में खतरनाक गैसों का उत्सर्जन तेजी से बढ़ सकता है।
पर्माफ्रॉस्ट क्या है
पर्माफ्रॉस्ट वह मिट्टी होती है जो कई वर्षों तक जमी रहती है। यह मुख्य रूप से आर्कटिक क्षेत्रों में पाई जाती है। इस मिट्टी के अंदर बहुत बड़ी मात्रा में कार्बन और अन्य गैसें फंसी रहती हैं। जब यह मिट्टी जमी रहती है, तब ये गैसें बाहर नहीं निकल पातीं। इसलिए पर्माफ्रॉस्ट को जलवायु परिवर्तन के खिलाफ एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच माना जाता है।
शोध में क्या पाया गया
वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में पर्माफ्रॉस्ट के नमूनों पर अध्ययन किया। उन्होंने तापमान को माइनस 18 डिग्री सेल्सियस से बढ़ाकर पांच डिग्री सेल्सियस तक किया और देखा कि गैसें कैसे बाहर निकलती हैं। इस दौरान उन्होंने पाया कि जैसे ही तापमान बढ़ता है, मिट्टी की संरचना बदलने लगती है। खासकर माइनस 5 डिग्री से 1 डिग्री के बीच मिट्टी की पारगम्यता में बहुत बड़ा बदलाव आता है।
इसका मतलब यह है कि इस तापमान सीमा में पर्माफ्रॉस्ट बहुत तेजी से गैसों को बाहर निकलने देता है। यह बदलाव 25 से 100 गुना तक हो सकता है, जो कि बहुत अधिक है।
कार्बन का बड़ा भंडार
वैज्ञानिकों के अनुसार, पूरी दुनिया के पर्माफ्रॉस्ट में लगभग 1,700 अरब टन कार्बन मौजूद है। यह मात्रा वातावरण में मौजूद कार्बन से लगभग तीन गुना अधिक है। यदि यह सारा कार्बन बाहर निकलने लगे, तो यह जलवायु परिवर्तन को बहुत तेजी से बढ़ा सकता है।
जलवायु परिवर्तन पर प्रभाव
जब पर्माफ्रॉस्ट पिघलता है, तो उसमें से कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन जैसी गैसें निकलती हैं। ये दोनों ही गैसें ग्रीनहाउस गैसें हैं, जो पृथ्वी की गर्मी को बढ़ाती हैं। इससे एक खतरनाक चक्र बन जाता है। पहले तापमान बढ़ता है, फिर पर्माफ्रॉस्ट पिघलता है, फिर गैसें निकलती हैं, और फिर तापमान और बढ़ जाता है।
इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक “पॉजिटिव फीडबैक” कहते हैं। इसका मतलब है कि एक बार यह प्रक्रिया शुरू हो जाए, तो यह अपने आप और तेजी से बढ़ती जाती है।
आर्कटिक क्षेत्र में खतरा
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 2050 तक आर्कटिक क्षेत्र में लगभग 42 प्रतिशत पर्माफ्रॉस्ट समाप्त हो सकता है। इसके अलावा यह भी पाया गया है कि आर्कटिक क्षेत्र दुनिया के बाकी हिस्सों की तुलना में चार गुना तेजी से गर्म हो रहा है। यह स्थिति बहुत चिंता का विषय है क्योंकि इससे गैसों का उत्सर्जन और बढ़ सकता है।
स्वास्थ्य पर प्रभाव
इस शोध में एक और महत्वपूर्ण बात सामने आई है। पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने से रेडॉन गैस भी बाहर आ सकती है। यह एक रेडियोधर्मी गैस है और इसे कैंसर से जोड़ा जाता है। यदि यह गैस अधिक मात्रा में बाहर निकलती है, तो यह आर्कटिक क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए खतरा बन सकती है।
यह शोध हमें यह समझने में मदद करता है कि पर्माफ्रॉस्ट का पिघलना केवल एक प्राकृतिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह जलवायु परिवर्तन को और भी गंभीर बना सकता है। यह एक चेतावनी है कि यदि हम समय रहते कदम नहीं उठाते, तो स्थिति और खराब हो सकती है।
इसलिए यह जरूरी है कि हम ग्लोबल वार्मिंग को कम करने के प्रयासों को और मजबूत करें। पर्माफ्रॉस्ट को बचाना सीधे तौर पर हमारे भविष्य को सुरक्षित करने से जुड़ा हुआ है।