

हिमालयी राज्य उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण से लगभग 40 किमी और ऐतिहासिक शहर अल्मोड़ा से लगभग 80 किलोमीटर की दूरी पर स्थित तड़ागताल के बारे में कहा जाता है कि साल में लगभग छह माह नैनीताल की नैनी झील से भी खूबसूरत दिखता है। सर्दियों में पानी सूख जाता है तो एक खूबसूरत लैंडस्कैप भी ऐसा दिखता है कि यहां से गुजरते लोग इसे निहारने लगते हैं। बहुत से स्थानीय किसान यहां खेती भी करते हैं, क्योंकि छोटे-छोटे सीढ़ीदार खेतों वाले उत्तराखंड के पहाड़ों पर ऐसी समतल भूमि बहुत कम देखने को मिलती है।
लगभग 50.49 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला तड़ागताल आकार में नैनी झील से भी बड़ा है। यह उत्तराखंड के उन 192 चिन्हित वेटलैंड्स (आर्द्रभूमि) में से एक है, जिसे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ( इसरो) के स्पेस एप्लीकेशंस सेंटर ने उपग्रह तस्वीरों के आधार पर वेटलैंड एटलस में शामिल किया है। इसरो ने देशभर में दो लाख से अधिक वेटलैंड्स चिन्हित किए हैं। वर्ष 2017 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद इन वेटलैंड्स के जमीनी सत्यापन और सीमांकन की प्रक्रिया चल रही है और सभी राज्यों को इसकी रिपोर्ट अदालत में दाखिल करनी है। इसी क्रम में उत्तराखंड में भी वेटलैंड्स की पहचान और संरक्षण की प्रक्रिया जारी है। 155 वेटलैंड्स का जमीनी सत्यापन किया जा चुका है, जिसमें ये तय किया जा रहा है कि सेटेलाइट से दिखने वाले वेटलैंड्स वास्तव में धरातल पर वेटलैंड्स हैं या नहीं।
वेटलैंड्स के सत्यापन की इस प्रक्रिया ने तड़ागताल के आसपास बसे गांव के ग्रामीणों को चिंता में डाल दिया। इनमें वे लोग भी शामिल हैं जो यहां खेती करते हैं। दरअसल स्थानीय लोग तड़ागताल को कृत्रिम झील बनाना चाहते हैं और वर्ष 2014 से राज्य सरकार से इसकी मांग कर रहे हैं। इसके लिए तड़ागताल सुधार समिति बनाई है। समिति के अध्यक्ष बीएस बिष्ट कहते हैं, “हम चाहते हैं कि तड़ागताल को कृत्रिम झील का रूप दिया जाए। इस ताल का एक बड़ा हिस्सा नौ ग्राम सभाओं के किसानों के नाम पर विभिन्न भूमि उपयोग के लिए पंजीकृत है। यहां सबसे अधिक गेहूं लगभग 3500 क्विंटल, सरसों 30 क्विंटल, बाजरा 40 क्विंटल समेत दालें व अन्य उपज होती है। लगभग 15 हजार की आबादी आजीविका के लिए इसी उपज पर निर्भर है। यहां छह महीने खेती करने वाले ग्रामीणों की मांग है कि उन्हें उचित मुआवजा दे दिया जाए, बदले में वे अपनी जमीन छोड़ देंगे।” बिष्ट का दावा है कि यदि यहां बारहमासी झील बना दी जाए तो राज्य के लिए पर्यटन का एक बड़ा केंद्र विकसित हो जाएगा। यह झील नैनी झील से बेहतर रमणीक स्थल साबित हो सकती है। नौगांव बैडिया, धनान, गोलखाल, न्यौनी, सोडियापानी और रिंगोनिया जैसे समीपवर्ती गांव तड़ागताल से लगभग 1 किमी दूर हैं। नौगांव बैडिया के नवनिर्वाचित प्रधान जसवंत बताते हैं कि सभी ग्राम पंचायतों ने सरकार को लिखकर दिया है कि वे झील बनाने के पक्ष में हैं, क्योंकि झील बनने के बाद न केवल उनके क्षेत्र में विकास होगा, बल्कि पर्यटन की वजह से उनकी आर्थिकी भी मजबूत होगी।
धनान गांव के पूर्व प्रधान रणजीत सिंह मेहरा कहते हैं, “तड़ागताल का तकरीबन एक तिहाई हिस्सा नाप भूमि है जिस पर खेती होती है। तकरीबन 50 प्रतिशत हिस्सा दलदली आर्द्रभूमि है। जिसमें दो स्थानीय गदेरे मलीगाड़ और मिसेरिया जलस्रोत का पानी सालभर आता रहता है। और तकरीबन 25 प्रतिशत हिस्सा बंजर पड़ा रहता है।” वह बताते हैं कि चूंकि मॉनसून के समय ताल में पानी भर जाता है और ताल 10-15 मीटर से भी अधिक गहरा हो जाता है, इसलिए वहां धान की खेती संभव नहीं है। गेहूं ही मुख्य फसल है।
तड़ागताल के वेटलैंड घोषित होने की आशंका से डरे स्थानीय लोगों का दबाव असर लाने लगा है। लोगों की मांग पर जिला प्रशासन ने तड़ागताल की स्थिति का अध्ययन कराने के लिए वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान को जिम्मेदारी सौंपी है। संस्थान ने फरवरी 2026 की अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट में बताया कि यहां झील बनने के आसार बेहद कम हैं। अल्मोड़ा में सिंचाई विभाग के अधीक्षण अभियंता जावेद अनवर डाउन टू अर्थ को ये जानकारी देते हैं, “तड़ागताल फॉल्ट जोन में आता है और वहां सीपेज की समस्या है। वाडिया संस्थान ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट में बताया है कि ताल के नीचे ठोस चट्टानें नहीं मिल रही, इसीलिए बरसात का पानी दो-तीन दिन में रिसकर बह जाता है।” वह बताते हैं कि इस पर वाडिया संस्थान अभी कुछ और सर्वेक्षण करेगा और इसके बाद अंतिम रिपोर्ट सौंपी जाएगी। तभी झील निर्माण को लेकर निश्चित तौर पर कुछ कहा जा सकता है।
दरअसल कुमाऊं हिमालय के चौखुटिया क्षेत्र के पूर्व में स्थित तड़ागताल एक साधारण ताल भर नहीं है। यह उन दुर्लभ पर्वतीय जलस्थलों में से है जो मौसम के साथ अपना रूप बदलते रहते हैं। इसके तल में जमा मिट्टी और अवसाद (सेडिमेंटस) की परतों में इस क्षेत्र के हजारों वर्षों की जलवायु, वनस्पति और मानवीय हस्तक्षेप के संकेत दर्ज हैं। स्थानीय लोग इसे पांडवकालीन मानते हैं। भू-वैज्ञानिकों के अनुसार इस ताल का निर्माण संभवतः एक बड़े भूस्खलन के कारण हुआ, जिसने बहते पानी को रोक दिया और समय के साथ ताल का रूप ले लिया। उत्तराखंड सिंचाई विभाग के एक सर्वे में भी रामगंगा घाटी को भू-वैज्ञानिक दृष्टि से सक्रिय क्षेत्र बताया गया है, जहां धरातलीय हलचल के कारण जमीन में दरारें, खिसकाव और भूस्खलन की घटनाएं होती रहती हैं। यह इलाका नॉर्थ अल्मोड़ा थ्रस्ट के प्रभाव वाले क्षेत्र में आता है, जो कुमाऊं हिमालय का एक प्रमुख टेक्टोनिक ढांचा है। भू-वैज्ञानिकों के अनुसार नॉर्थ अल्मोड़ा थ्रस्ट और इससे जुड़े फॉल्ट सिस्टम समय-समय पर पुनः सक्रिय होते रहते हैं, जिससे रामगंगा घाटी में भू-आकृतिक बदलाव और भूस्खलन जैसी घटनाएं होती रहती हैं। माना जाता है कि इसी तरह की एक बड़ी भूस्खलन घटना ने तड़ाग स्ट्रीम का प्रवाह रोक दिया और तड़ागताल का निर्माण हुआ।
ऐतिहासिक तड़ागताल समय के साथ मिट्टी और अवसाद से पटता जा रहा है और अल्मोड़ा जिला प्रशासन ने अपने हालिया जमीनी सत्यापन में इसे वेटलैंड भी नहीं माना है। तड़ागताल, जिसके नाम में ही ताल शब्द शामिल है, अल्मोड़ा जिला प्रशासन के लिए ये तय करना आसान नहीं रहा। कैसे? डाउन टू अर्थ को मिले अगस्त 2025 के उत्तराखंड राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण के एक पत्र के मुताबिक अल्मोड़ा के तड़ागताल व भालू डैम को ग्राउंड ट्रूथिंग में मान लिया गया और दोनों वेटलैंड्स के बाउंड्री डिमार्केशन का कार्य जल्द पूरा करने को कहा गया, लेकिन इसके बाद भी कई पत्राचार हुए और नवीनतम जानकारी में ग्राउंड ट्रूथिंग यानी जमीनी सत्यापन में तड़ागताल व भालू डैम को वेटलैंड नहीं माना गया।
राज्य पर्यावरण संरक्षण एवं जलवायु परिवर्तन निदेशालय में वैज्ञानिक व विशेषज्ञ वर्तिका नेगी इस बारे में जानकारी देती हैं। वह बताती हैं, दिसंबर-2025 को भेजे हालिया पत्र में अल्मोड़ा के जिलाधिकारी ने बताया है कि फील्ड वेरिफिकेशन और ग्राउंड ट्रूथिंग की प्रक्रिया में जल विज्ञान और भूमि उपयोग पैटर्न की समीक्षा की गई। जांच में पाया गया कि ये क्षेत्र मुख्य रूप से मौसमी जल संचयन वाले क्षेत्र के रूप में कार्य करते हैं। मॉनसून के दौरान वर्षा और प्राकृतिक जल निकासी के कारण यहां पानी भर जाता है, लेकिन मॉनसून खत्म होने के बाद पानी कम हो जाता है। स्थानीय समुदाय परंपरागत रूप से इन क्षेत्रों में पानी घटने के बाद खेती करते रहे हैं, विशेष रूप से धान की खेती। फील्ड वेरिफिकेशन में पाया गया कि लगभग 54.163 हेक्टेयर भूमि वर्षा ऋतु के दौरान जलभराव से प्रभावित होती है, लेकिन बाद में ग्रामीण इन पर खेती करते हैं।
वर्तिका कहती हैं, “वेटलैंड (संरक्षण एवं प्रबंधन) नियम, 2017 के अनुसार कुछ श्रेणियां, जैसे नदी की धाराएं, धान के खेत, पेयजल या सिंचाई के लिए बनाए गए मानव निर्मित जलाशय, तथा वे क्षेत्र जो पहले से अन्य विशेष कानूनों के तहत संचालित हैं, वेटलैंड की अधिसूचना के दायरे में शामिल नहीं किए जाते। चूंकि तड़ागताल व भालू डैम मुख्य रूप से मौसमी जलभराव वाले कृषि क्षेत्र के रूप में कार्य करते हैं और इनमें वेटलैंड के रूप में अधिसूचना के लिए आवश्यक पारिस्थितिक विशेषताएं नहीं पाई गईं, इसलिए ये नियमों के तहत अपवर्जित श्रेणियों में आते हैं।” अल्मोड़ा में वेटलैंड सत्यापन की जिला स्तरीय तकनीकी समिति के सचिव और प्रभागीय वन अधिकारी दीपक सिंह भी यही बात कहते हैं। उन्होंने बताया, “जिला स्तरीय समिति ने अपनी पड़ताल में तड़ागताल वेटलैंड की परिभाषा में फिट नहीं पाया। ये लोगों की निजी भूमि है और यहां धान की खेती होती है। सिर्फ कुछ महीनों के लिए ही इसमें पानी भरा रहता है।”
जिला प्रशासन के पत्राचार में विशेष रूप से धान की खेती की बात कही गई है जबकि मॉनसून में गहरी झील बन जाने वाले ताल में खेती संभव ही नहीं है। धनान गांव के पूर्व प्रधान रणजीत सिंह बता चुके हैं कि बरसात में गहरी झील का रूप लेने के कारण यहां धान नहीं उगाया जाता। बिष्ट भी कहते हैं कि गर्मियों में केवल एक फसल ली जाती है, जिसमें गेहूं प्रमुख है। दरअसल, ताल का 50 प्रतिशत से भी अधिक हिस्सा दो गदेरों के पानी के चलते सालभर आर्द्र भूमि के तौर पर महत्वपूर्ण कार्बन सिंक का काम करता है और खेती सिर्फ एक तिहाई हिस्से पर होती है। फिर इसे झील बनाने की जिद क्यों?
हिमालयी पारिस्थितिकी पर काम करने वाले पर्यावरणविद् ई. थियोफिलस, जो उत्तराखंड स्पेस एप्लीकेशन सेंटर के साथ उच्च हिमालयी क्षेत्र की झीलों की मैपिंग से जुड़े रहे हैं, तड़ागताल को निश्चित तौर पर वेटलैंड मानते हैं। वह कहते हैं, “तड़ागताल मूल रूप से एक दलदली क्षेत्र है, जो बरसात के समय मार्शी यानी आर्द्र परिस्थिति में बदल जाता है और उसमें पानी का प्रवाह भी बना रहता है। ऐसी आर्द्रभूमियों का संरक्षण इसलिए जरूरी है क्योंकि जब वे दलदली अवस्था में होती हैं, तब उनका पारिस्थितिक महत्व बहुत अधिक होता है। यह क्षेत्र पानी को सोखता भी है और धीरे-धीरे उसे आगे प्रवाहित भी करता है। यानी एक तरह से स्पंज की तरह काम करता है। इसके कारण यहां की जैव-विविधता भी बेहद अनोखी और समृद्ध होती है। वेटलैंड संरक्षण की प्रक्रिया में ऐसी आर्द्रभूमियों को बचाना जरूरी है, भले ही वे पारंपरिक अर्थों में झील या तालाब न हों। ऐसे में इसके जल प्रवेश और जल निकास के प्राकृतिक रास्तों को बंद करके इसे कृत्रिम झील में बदलना उचित नहीं होगा।”
ई. थियोफिलस इसे “म्यूजियम ऑफ लाइफ” की तरह देखते हैं। वह कहते हैं, “ऐसी आर्द्रभूमियों में बहुत सूक्ष्म स्तर पर जीवन के कई रूप दिखाई देते हैं और धरती पर जीवन की शुरुआती प्रक्रियाओं को समझने का अवसर मिलता है।"
“वेटलैंड्स ऑफ उत्तराखंड” के अनुसार तड़ागताल और इसके आसपास कई जलीय और वन्य पक्षियों की मौजूदगी दर्ज की गई है। इनमें बतख प्रजातियां, बगुले, जलमुर्गी और अन्य आर्द्रभूमि पर निर्भर पक्षी शामिल हैं। इनमें नॉर्दर्न पिनटेल, एशियाई ओपनबिल सारस, काला सारस, तालाब बगुला, कॉमन पोचर्ड, लिटिल एग्रेट, यूरेशियन कूट, जलमुर्गी और छोटा पनडुब्बी पक्षी/लिटिल ग्रीब शामिल हैं। उत्तराखंड वन विभाग, अल्मोड़ा प्रभाग की कार्य-योजना 2001–2011 में दर्ज सूचना के मुताबिक तड़ागताल में प्रवासी पक्षियों की उपस्थिति बढ़ी है। विशेष रूप से काला सारस के 10 से 12 जोड़े हर वर्ष इस ताल पर आते देखे गए हैं।
जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं पर अंतरसरकारी विज्ञान-नीति मंच (आईपीबीईएस) की 20 मई 2019 को प्रकाशित वैश्विक आकलन रिपोर्ट “टाइम फॉर एक्शन, नॉट डेस्पेयर” के अनुसार आर्द्रभूमियां बड़ी संख्या में प्रजातियों का आवास होने के साथ-साथ प्राकृतिक जल स्रोत, विशाल कार्बन भंडार और जलवायु संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसके बावजूद दुनिया भर में आर्द्रभूमियां वनों की तुलना में लगभग तीन गुना तेजी से नष्ट हो रही हैं, जिससे उन पर निर्भर प्रजातियों में तेज गिरावट दर्ज की जा रही है।
भूविज्ञानी प्रोफेसर जेएस रावत उत्तराखंड स्टेट काउंसिल फॉर साइंस एंड टेक्नोलॉजी के सलाहकार हैं, साथ ही कोसी नदी के पुनरुद्धार से जुड़ी परियोजना का भूगर्भीय खाका तैयार कर चुके हैं। वह तड़ागताल को उसकी सैंकड़ों साल पुरानी स्थिति में लाने के प्राकृतिक तरीके की बात करते हैं। डाउन टू अर्थ को वह बताते हैं, “अल्मोड़ा के धारपानीधार स्प्रिंग सेंचुरी से निकलने वाली 11 बारामासी नदियां बीते छह दशकों में अल्पकालिक नदियों में तब्दील हो गईं। यानी ये बरसाती नदी भी नहीं रहींं बल्कि बरसात के मौसम में कुछ दिनों या कुछ घंटों के लिए इनमें पानी रहता है। इसी वाटरशेड से निकलने वाली तीन नदियां, छतरिया गेवाड, कल्याणीगाड और तोतापागर का पानी तड़ागताल को मिलता था, जिससे कभी उसमें सालभर पानी रहा करता था। जलवायु परिवर्तन, बारिश के पैटर्न में बदलाव, वनों के कटने जैसी वजहों से इस स्प्रिंग सेंचुरी का भूजल लगातार गिर रहा है। जिससे ये नदियां सूख गईं। फिर तड़ागताल सूख गया।”
प्रोफेसर रावत कहते हैं कि तड़ागताल को प्राकृतिक तौर पर फिर पुनर्जीवित किया जा सकता है यदि इसे पानी देने वाली तीनों नदियों का पानी लौटाएं। इसके लिए धार पानीधार स्प्रिंग सेंचुरी के रिचार्ज जोन में वर्षा जल संचय के लिए लगातार कार्य करना होगा। तड़ागताल को बचाने का यही तरीका है। फिर पानी का रिसाव होने पर भी इसमें इतना पानी बना होगा कि ताल का अस्तित्व बना रहे।