जलवायु संकट से निपटने के लिए विकासशील देशों को चाहिए 305 अरब डॉलर सालाना, वित्तीय मदद जरूरत से बहुत कम

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की अनुकूलन अंतर रिपोर्ट 2026 के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक जलवायु अनुकूलन वित्त को तीन गुना करने पर वर्ष 2035 तक इसका सालाना प्रवाह बढ़कर 85 से 120 अरब डॉलर हो सकता है
जलवायु संकट से निपटने के लिए विकासशील देशों को चाहिए 305 अरब डॉलर सालाना, वित्तीय मदद जरूरत से बहुत कम
फोटो साभार: आईस्टॉक
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जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के अनुकूल ढलने के लिए विकासशील देशों को हर साल अनुमानित 305 अरब डॉलर की जरूरत है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक अनुकूलन वित्त (इंटरनेशनल पब्लिक एडप्टेशन फाइनेंस) को तीन गुना कर देने के बाद भी वर्ष 2035 तक उनकी जरूरत का केवल 20 से 29 प्रतिशत हिस्सा ही पूरा हो सकेगा। संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट में यह बात सामने आई है।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की अनुकूलन अंतर रिपोर्ट (एडप्टेशन गैप रिपोर्ट) 2026 के अनुसार, महंगाई को ध्यान में रखते हुए अनुकूलन के लिए सालाना वित्तीय जरूरत वर्ष 2035 तक बढ़कर 420 अरब डॉलर हो सकती है। रिपोर्ट का अनुमान है कि अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक अनुकूलन वित्त को तीन गुना करने से वर्ष 2035 तक सालाना वित्तीय प्रवाह बढ़कर 85 से 120 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। इसमें घरेलू सार्वजनिक वित्त से मिलने वाली संभावित राशि भी जोड़ दी जाए तो कुल रकम 154 से 189 अरब डॉलर हो सकती है। इसके बावजूद अनुमानित जरूरत का आधे से अधिक हिस्सा पूरा नहीं हो पाएगा।

लगभग 305 अरब डॉलर की सालाना जरूरत का अनुमान दो अलग-अलग तरीकों से लगाया गया है। राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी) और राष्ट्रीय अनुकूलन योजनाओं (एनएपी) के आकलन के मुताबिक, विकासशील देशों को हर साल 255 से 328 अरब डॉलर की जरूरत होगी। इसका औसत अनुमान 286 अरब डॉलर है।

वहीं, मॉडल आधारित आकलन में यह जरूरत 320 अरब डॉलर आंकी गई है। ये अनुमान मुख्य रूप से सार्वजनिक और सार्वजनिक-निजी गतिविधियों पर आधारित हैं तथा इनमें निजी क्षेत्र की अधिकांश वित्तीय जरूरतें शामिल नहीं हैं। वर्ष 2030 के दशक में जलवायु अनुकूलन के लिए निजी क्षेत्र को सालाना 260 अरब डॉलर की अतिरिक्त जरूरत हो सकती है।

वित्तीय कमी का सबसे गंभीर असर अल्प विकसित देशों (एलडीसी) और छोटे द्वीपीय विकासशील देशों (एसआईडीएस) पर पड़ने की आशंका है। इन दोनों श्रेणियों के देशों को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल ढलने के लिए संयुक्त रूप से हर साल 49 से 51 अरब डॉलर की जरूरत होने का अनुमान है। वहीं, निम्न आय वाले देशों को अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का करीब 4 प्रतिशत हिस्सा जलवायु अनुकूलन पर खर्च करना पड़ सकता है।

अपर्याप्त अंतरराष्ट्रीय और घरेलू वित्त

वर्ष 2024 में विकसित देशों से विकासशील देशों को मिलने वाला अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक जलवायु अनुकूलन वित्त 28.2 अरब डॉलर रहा। इसके अलावा सार्वजनिक वित्त के माध्यम से 3.2 अरब डॉलर का निजी निवेश भी जुटाया गया। इस तरह कुल वित्तीय सहायता 31.4 अरब डॉलर तक पहुंची।

ग्लासगो जलवायु समझौते के तहत वर्ष 2025 तक 2019 के स्तर की तुलना में अनुकूलन वित्त को दोगुना करने का वादा किया गया था, लेकिन इससे वित्तीय जरूरत और उपलब्ध संसाधनों के बीच का अंतर खत्म नहीं हो सका। वर्ष 2020 से 2024 के दौरान विकसित देशों की द्विपक्षीय और बहुपक्षीय संस्थाओं ने औसतन हर साल करीब 29 अरब डॉलर का वित्त आवंटित किया।

विकासशील देशों से दूसरे विकासशील देशों को मिलने वाला वित्त भी बढ़ा है। वर्ष 2019 में यह राशि 3.9 अरब डॉलर थी, जो 2024 में बढ़कर 9.7 अरब डॉलर हो गई। यह केवल जलवायु अनुकूलन के लिए उपलब्ध कुल वित्त का 25 प्रतिशत था।

अनुकूलन वित्त में ऋण की हिस्सेदारी 55 प्रतिशत (12.3 अरब डॉलर) रही। हालांकि, रियायती वित्तीय सहायता का हिस्सा अल्प विकसित देशों (एलडीसी) के लिए 88 प्रतिशत और छोटे द्वीपीय विकासशील देशों (एसआईडीएस) के लिए 78 प्रतिशत था।

घरेलू सार्वजनिक वित्त भी जलवायु अनुकूलन के लिए धन का एक महत्वपूर्ण स्रोत है, लेकिन अलग-अलग देशों में इसकी उपलब्धता और रिपोर्टिंग में काफी असमानता है। जिन 47 देशों ने अपनी जलवायु अनुकूलन संबंधी जरूरतों का सशर्त और बिना शर्त के आधार पर ब्योरा दिया, उनमें औसतन केवल 18 प्रतिशत जरूरत को बिना शर्त वाली श्रेणी में रखा गया। यूएनईपी का अनुमान है कि घरेलू सार्वजनिक अनुकूलन वित्त करीब 50 अरब डॉलर सालाना है। महंगाई को ध्यान में रखते हुए यह राशि 2035 तक बढ़कर 69 अरब डॉलर हो सकती है।

ब्राजील इसका एक उदाहरण है। उसने वर्ष 2016 से 2020 के दौरान जलवायु अनुकूलन के लिए 993 मिलियन डॉलर का सार्वजनिक वित्त आवंटित किया, जिसमें 81 प्रतिशत राशि घरेलू स्रोतों से आई थी।

इसी तरह, बांग्लादेश ने वर्ष 2010 से 2017-18 के बीच अपने जलवायु परिवर्तन ट्रस्ट फंड में कम से कम 400 मिलियन डॉलर जमा किए। इसमें से कम से कम 180 मिलियन डॉलर जलवायु अनुकूलन गतिविधियों पर खर्च किए गए।

अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक वित्त के माध्यम से जुटाया गया निजी निवेश भी बढ़ा है। वर्ष 2019 में यह 1.5 अरब डॉलर था, जो 2024 में बढ़कर 3 अरब डॉलर हो गया। इसके अलावा, निजी क्षेत्र से जलवायु अनुकूलन के लिए मिले 3 अरब डॉलर के अन्य वित्त का भी अलग से आकलन किया गया। हालांकि, यूएनईपी का कहना है कि यह आंकड़ा वास्तविक निवेश से कम हो सकता है।

वित्त का लाभ स्थानीय समुदायों तक पहुंचना जरूरी

रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु अनुकूलन के लिए केवल वित्त की मात्रा बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना जरूरी है कि उपलब्ध धन की गुणवत्ता बेहतर हो और स्थानीय समुदायों तक उसकी पहुंच आसान हो।

13 अलग-अलग कोषों और वित्तीय सुविधाओं के तहत किए गए 111 निवेशों के विश्लेषण में पाया गया कि इनमें से केवल 15 निवेशों का स्पष्ट और मजबूत उद्देश्य जलवायु अनुकूलन था। इनमें सूचकांक आधारित बीमा, बाढ़ और चक्रवात का पूर्वानुमान, सौर ऊर्जा से चलने वाली सिंचाई तथा जल संकट वाले क्षेत्रों में जलापूर्ति जैसी परियोजनाएं शामिल थीं। वहीं, 75 निवेशों में जलवायु अनुकूलन केवल एक सहायक लाभ था, जबकि 21 निवेशों का जलवायु अनुकूलन से कोई सीधा संबंध नहीं था।

स्थानीय समुदायों के लिए जलवायु वित्त हासिल करना अब भी मुश्किल बना हुआ है। वर्ष 2016 से 2023 के बीच अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक अनुकूलन वित्त का करीब 29 प्रतिशत हिस्सा स्थानीय स्तर पर कार्यान्वयन से जुड़ा था, लेकिन केवल 0.17 प्रतिशत वित्त में स्पष्ट रूप से स्थानीय समुदायों या समुदाय आधारित नेतृत्व वाली गतिविधियों का उल्लेख था। इसके अलावा, स्थानीय नेतृत्व वाले जलवायु वित्त की कुल राशि में से करीब 40 प्रतिशत में लैंगिक समानता से जुड़ा कोई विशेष प्रावधान नहीं था।

केन्या का फाइनेंसिंग लोकली लेड क्लाइमेट एक्शन कार्यक्रम स्थानीय स्तर पर जलवायु अनुकूलन की एक मिसाल है। वर्ष 2021 में शुरू किए गए इस कार्यक्रम के तहत 2026 के मध्य तक देश के 45 काउंटियों में 1,775 से अधिक जलवायु निवेश परियोजनाओं को समर्थन दिया गया था। इनमें से 1,237 परियोजनाएं पूरी हो चुकी थीं। इन परियोजनाओं में कृषि, पशुपालन, जल प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण, आपदा जोखिम न्यूनीकरण और ग्रामीण बुनियादी ढांचे से जुड़े काम शामिल थे।

अल्प विकसित देशों के समूह ने मांग की है कि वर्ष 2030 तक जलवायु वित्त का 70 प्रतिशत हिस्सा स्थानीय स्तर तक पहुंचना चाहिए।

हालांकि, जलवायु अनुकूलन की योजनाओं में लैंगिक समानता और सामाजिक समावेशन को अब भी पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा है। लागत का आकलन करने वाले 112 राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी) और राष्ट्रीय अनुकूलन योजनाओं (एनएपी) में से केवल 26 यानी 21 प्रतिशत में लैंगिक समानता और सामाजिक समावेशन के लिए अलग से वित्तीय आवंटन किया गया था। इन आवंटनों का औसत संबंधित देशों की पहचानी गई जलवायु अनुकूलन वित्तीय जरूरतों का महज 3.8 प्रतिशत था।

जलवायु प्रभाव केवल आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं

रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन से होने वाली हानि और क्षति के बढ़ते प्रभावों को भी रेखांकित किया गया है। इसके मुताबिक, वर्ष 2020 से 2025 के बीच जलवायु से जुड़ी 2,339 बड़ी घटनाएं दर्ज की गईं। इनमें से करीब 70 प्रतिशत घटनाएं निम्न और मध्यम आय वाले देशों में हुईं।

इन घटनाओं का असर केवल बुनियादी ढांचे, आजीविका और आर्थिक गतिविधियों को होने वाले नुकसान तक सीमित नहीं है। इनके कारण गैर-आर्थिक क्षति, पारिस्थितिक तंत्र को नुकसान और समुदायों तथा विभिन्न क्षेत्रों पर एक के बाद एक पड़ने वाले व्यापक प्रभाव भी सामने आते हैं।

यूएनईपी का कहना है कि आंकड़ों, परिभाषाओं और नुकसान के मूल्यांकन की पद्धतियों में सीमाओं के कारण फिलहाल जलवायु परिवर्तन से होने वाली कुल हानि और क्षति के लिए आवश्यक वित्त का कोई विश्वसनीय वैश्विक अनुमान उपलब्ध नहीं है।

रिपोर्ट में इन नुकसानों से निपटने के लिए नए, अतिरिक्त, अनुमानित और पर्याप्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराने की जरूरत बताया गया है। इसके साथ ही जलवायु अनुकूलन की योजनाओं और उनके क्रियान्वयन को मजबूत करने पर जोर देती है। रिपोर्ट यह भी स्पष्ट करती है कि कुछ नुकसान ऐसे हैं, जिन्हें केवल जलवायु अनुकूलन के उपायों से रोका नहीं जा सकता। इसलिए ऐसी क्षति से निपटने के लिए अलग वित्तीय व्यवस्था और संसाधनों की जरूरत होगी।