कॉफी की पैदावार घटने से बढ़ी कीमतें, जलवायु परिवर्तन मुख्य कारण

दुनिया के 25 कॉफी-उत्पादक देशों पर किए गए एक नए विश्लेषण से पता चला है कि 2021 से 2025 के बीच इन सभी देशों में कॉफी के लिए हानिकारक गर्मी बढ़ी
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो: आईस्टॉक
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो: आईस्टॉक
Published on

कॉफी उगाना अब मुश्किल होता जा रहा है और खरीदना भी महंगा पड़ रहा है। इसकी बड़ी वजह जलवायु परिवर्तन है।

दुनिया के 25 कॉफी-उत्पादक देशों पर किए गए एक नए विश्लेषण से पता चला है कि 2021 से 2025 के बीच इन सभी देशों में कॉफी के लिए हानिकारक गर्मी बढ़ी है, जिससे हाल की फसलों की गुणवत्ता और मात्रा प्रभावित हो सकती है।

विश्लेषण में शामिल 25 देशों और उनके 532 जिलों का वैश्विक कॉफी उत्पादन में लगभग 97 प्रतिशत हिस्सा है। जलवायु अनुसंधान संस्था क्लाइमेट सेंट्रल के अध्ययन के अनुसार, औसतन हर देश में प्रति वर्ष ऐसे 47 अतिरिक्त दिन दर्ज किए गए जब तापमान कॉफी पौधों के लिए नुकसानदेह रहा।

शोधकर्ताओं का कहना है कि जीवाश्म ईंधन से होने वाले उत्सर्जन के बिना इतनी अतिरिक्त गर्मी के दिन पैदा नहीं हो सकते।

शीर्ष पांच कॉफी उत्पादक देश ब्राजील, वियतनाम, कोलंबिया, इथियोपिया और इंडोनेशिया ने जलवायु परिवर्तन के कारण औसतन हर वर्ष नुकसानदेह गर्मी वाले 57 अतिरिक्त दिन झेले। ये देश मिलकर दुनिया की लगभग 75 प्रतिशत कॉफी आपूर्ति करते हैं।

दुनिया का सबसे बड़ा कॉफी उत्पादक देश ब्राजील हर साल औसतन 70 अतिरिक्त ऐसे गर्म दिनों का सामना कर रहा है जो कॉफी के लिए हानिकारक हैं।

सबसे अधिक ऐसे दिन जिन देशों में दर्ज हुए, वे हैं- एल साल्वाडोर (99), निकारागुआ (77) और थाईलैंड (75)। भारत, जो वैश्विक उत्पादन का लगभग 3.5 प्रतिशत हिस्सा रखता है, ने जलवायु परिवर्तन के कारण औसतन 30 अतिरिक्त गर्म दिनों का सामना किया, जिनमें केरल में ऐसे दिनों की संख्या सबसे अधिक रही।

कॉफी दुनिया के सबसे लोकप्रिय पेयों में से एक है, जिसकी हर दिन दो अरब से अधिक कप खपत होती है। हालांकि, हाल के वर्षों में वैश्विक कॉफी कीमतों में काफी उतार-चढ़ाव रहा है, दिसंबर 2024 और फिर फरवरी 2025 में कीमतें रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गईं और इसमें चरम मौसम की बड़ी भूमिका रही है।

क्लाइमेट सेंट्रल ने 2021 से 2025 के वास्तविक तापमान का विश्लेषण किया और उन्हें कार्बन प्रदूषण रहित एक काल्पनिक दुनिया से ‘क्लाइमेट शिफ्ट इंडेक्स’ के माध्यम से तुलना की। इस विश्लेषण में यह गणना की गई कि जलवायु परिवर्तन की वजह से कॉफी उत्पादक प्रमुख देशों में हर साल कितने अतिरिक्त दिन तापमान को कॉफी के लिए हानिकारक 30 डिग्री सेल्सियस की सीमा से ऊपर चला गया।

रिपोर्ट के अनुसार, कॉफी के पौधे एक निश्चित सीमा वाले तापमान और बारिश में ही अच्छी तरह पनपते हैं। जब तापमान इस सीमा से ऊपर जाता है, तो पौधों में हीट स्ट्रेस बढ़ता है, जिससे उत्पादन घट सकता है, बीन्स की गुणवत्ता प्रभावित होती है और पौधे रोगों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं। इन सभी प्रभावों से कॉफी की आपूर्ति और गुणवत्ता दोनों घट सकती हैं और वैश्विक स्तर पर कीमतें बढ़ सकती हैं।

वैश्विक आपूर्ति का लगभग 60–70 प्रतिशत हिस्सा देने वाली अरेबिका किस्म की कॉफी गर्मी के प्रति रोबस्टा किस्म की तुलना में अधिक संवेदनशील पाई गई। शोध से यह भी पता चला कि 25–30 डिग्री सेल्सियस का अपेक्षाकृत ठंडा तापमान भी अरेबिका के लिए आदर्श नहीं है।

रिपोर्ट में बताया गया कि कम होती पैदावार और बढ़ती कीमतों का सबसे ज्यादा असर छोटे किसानों पर पड़ रहा है। छोटे जोत वाले किसान वैश्विक उत्पादकों का लगभग 80 प्रतिशत और कुल आपूर्ति का करीब 60 प्रतिशत हिस्सा हैं, लेकिन 2021 में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए जरूरी वित्तपोषण का उन्हें मात्र 0.36 प्रतिशत ही मिला।

रिपोर्ट के अनुसार, एक हेक्टेयर खेत के लिए अनुकूलन (एडाप्टेशन) की औसत लागत 2.19 डॉलर प्रतिदिन है, जो कई देशों में एक कप कॉफी की कीमत से भी कम है।

पिछले अध्ययनों में चेतावनी दी गई है कि यदि बड़े पैमाने पर अनुकूलन उपाय लागू नहीं किए गए, तो 2050 तक आज की कॉफी उगाने योग्य जमीन का आधा हिस्सा अनुपयुक्त हो सकता है।

Related Stories

No stories found.
Down to Earth- Hindi
hindi.downtoearth.org.in