जलवायु परिवर्तन की वजह से धरती पर लंबे हो रहे हैं दिन: अध्ययन

अध्ययन के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन के कारण पृथ्वी की घूर्णन गति धीमी हो रही है, जिससे दिन की लंबाई बढ़ रही है, भविष्य में और प्रभाव पड़ेगा।
जलवायु परिवर्तन का असर: 21वीं सदी में बर्फ पिघलने और समुद्र स्तर बढ़ने से पृथ्वी धीरे-धीरे घूम रही है।
जलवायु परिवर्तन का असर: 21वीं सदी में बर्फ पिघलने और समुद्र स्तर बढ़ने से पृथ्वी धीरे-धीरे घूम रही है।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • दिन की लंबाई बदलती रहती है: पृथ्वी की घूर्णन गति पर चंद्रमा, ग्लेशियरों के पिघलने और अंदरूनी प्रक्रियाओं का असर होता है।

  • जलवायु परिवर्तन का असर: 21वीं सदी में बर्फ पिघलने और समुद्र स्तर बढ़ने से पृथ्वी धीरे-धीरे घूम रही है।

  • आज का रिकॉर्ड: 2000–2020 में दिन की लंबाई बढ़ने की दर 1.33 मिलीसेकंड प्रति सदी, पिछले 3.6 मिलियन वर्षों में सबसे तेज।

  • पुरातात्विक अध्ययन: फोरामिनिफेरा जीवों के रासायनिक नमूनों और डीप लर्निंग मॉडल से पुराने समुद्र स्तर और दिन लंबाई का पता चला।

  • भविष्य और महत्व: दिन लंबाई में वृद्धि मिलीसेकंड्स की है, लेकिन सैटेलाइट, जीपीएस और अंतरिक्ष नेविगेशन पर गंभीर प्रभाव डाल सकती है।

हम अक्सर सोचते हैं कि पृथ्वी पर एक दिन हमेशा 24 घंटे का होता है। लेकिन वैज्ञानिकों ने हाल ही में पाया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण दिन की लंबाई धीरे-धीरे बढ़ रही है। इसका मतलब है कि पृथ्वी की घूर्णन गति धीमी हो रही है।

दिन की लंबाई क्यों बदलती है?

एक दिन की लंबाई हमेशा एक जैसी नहीं होती। पृथ्वी के घूमने की गति पर कई चीजें असर डालती हैं, जिसमें चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण - चंद्रमा की खिंचाव शक्ति पृथ्वी को धीरे-धीरे धीमा करती है। धरती पर द्रव्यमान का स्थान परिवर्तन - ग्लेशियर की बर्फ, समुद्र और वायुमंडल के पानी का वितरण बदलता है। पृथ्वी के अंदर की प्रक्रिया - पृथ्वी की परतों के अंदर होने वाली हलचल, भूकंप आदि भी घूर्णन पर असर डालते हैं। इन कारणों से दिन की लंबाई में मिलीसेकंड्स का फर्क आता है।

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जलवायु परिवर्तन और पृथ्वी का धीमा घूमना

21वीं सदी में जलवायु परिवर्तन ने दिन की लंबाई बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई है। मुख्य कारणों में ग्लेशियर का पिघलना, समुद्र का बढ़ना और पानी का वितरण बदलना आदि शामिल हैं। यह अध्ययन जर्नल ऑफ जियोफिजिकल रिसर्च में प्रकाशित किया गया है

जब बर्फ पिघलकर समुद्र में जाती है, तो पृथ्वी पर द्रव्यमान का केंद्र बदल जाता है। इससे पृथ्वी की गति धीमी हो जाती है, ठीक वैसे ही जैसे एक फिगर स्केटर अपने हाथ फैलाकर धीरे घूमता है।

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आज की स्थिति

वैज्ञानिकों के अनुसार, 2000 से 2020 तक दिन की लंबाई बढ़ने की दर 1.33 मिलीसेकंड प्रति सदी रही। यह छोटा अंतर आम जीवन में दिखाई नहीं देता, लेकिन वैज्ञानिकों के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है।

पुरानी परिस्थितियों का अध्ययन

वैज्ञानिकों ने यह जानने के लिए कि क्या कभी पहले भी दिन की लंबाई इतनी जल्दी बढ़ी है, पिछले 36 लाख वर्षों का अध्ययन किया।

बेंटिक फोरामिनिफेरा: ये समुद्र के छोटे जीव हैं, जिनकी रासायनिक संरचना से पुराने समुद्र के स्तर और जलवायु के बारे में जानकारी मिलती है।

डीप लर्निंग और फिजिक्स-आधारित मॉडल: इससे वैज्ञानिक पुराने डेटा की अनिश्चितताओं के बावजूद सही अनुमान लगा सकते हैं।

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शोध के प्रमुख निष्कर्ष

इस अध्ययन से पता चला कि आज की बढ़ती दिन की लंबाई पिछले 36 लाख वर्षों में सबसे तेज है। केवल लगभग 20 लाख साल पहले इसका स्तर कुछ हद तक मिल सकता है।

क्वाटरनेरी काल (26 लाख साल से) के दौरान बड़े ग्लेशियर पिघले, लेकिन उनका असर आज जैसी तेजी से दिन की लंबाई बढ़ाने वाला नहीं था।

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यह क्यों महत्वपूर्ण है?

हालांकि दिन की लंबाई में अंतर मिलीसेकंड्स का है, लेकिन इसका प्रभाव बहुत जगह महसूस होता है -

इन सभी क्षेत्रों में पृथ्वी की सही घूर्णन गति का ज्ञान बहुत जरूरी है।

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इस अध्ययन से स्पष्ट है कि मानवजनित जलवायु परिवर्तन पृथ्वी की घूर्णन गति को प्रभावित कर रहा है और दिन की लंबाई बढ़ा रहा है। यह सिर्फ तापमान बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि पृथ्वी की मूलभूत भौतिक प्रक्रियाओं में बदलाव ला रहा है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर जलवायु परिवर्तन जारी रहा, तो 21वीं सदी के अंत तक दिन की लंबाई में और भी अधिक बढ़ोतरी हो सकती है और यह चंद्रमा के प्रभाव से भी अधिक असर डाल सकती है।

इसलिए, यह न केवल हमारे पर्यावरण के लिए चेतावनी है, बल्कि भविष्य में तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्रों में तैयारियों की जरूरत भी दिखाता है।

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