चेतन सिंह सोलंकी, वैज्ञानिक व सामाजिक उद्यमी
फोटो सौजन्य: ऊर्जा स्वराज फाउंडेशन

गांधी के रास्ते पर प्रोफेसर की अनोखी यात्रा: जलवायु परिवर्तन के खिलाफ जनजागरण

पिछले 5 वर्षों से चेतन सिंह सोलंकी एक अनूठी यात्रा पर हैं। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान बॉम्बे के पूर्व प्रोफेसर सोलंकी सौर पैनलों से सुसज्जित एक बस में रहते हैं और उसी से देश भर की यात्रा कर रहे हैं। दाक्षीआणी पलीचा के साथ साक्षात्कार में सोलंकी अपनी इस यात्रा के मकसद को साझा करते हैं, जिसे उन्होंने “ऊर्जा स्वराज यात्रा” का नाम दिया है
Published on
Q

अपनी यात्रा और इसे शुरू करने का विचार आपके मन में कैसे आया?

A

सौर ऊर्जा के एक प्रोफेसर के रूप में मैं ऊर्जा के वैश्विक खेल को समझने लगा था और साथ ही यह भी कि इसमें सुधार की कितनी सख्त जरूरत है। मैंने शुरुआत खुद से यह सवाल पूछकर की कि महात्मा गांधी ने जलवायु परिवर्तन का सामना कैसे किया होता। इसका जवाब स्पष्ट था-वह सीधे जनता के पास गए होते। उस अहसास ने मुझे अपने जीवन के कम से कम 10 साल सार्वजनिक जुड़ाव के लिए समर्पित करने के लिए प्रेरित किया। यह ध्यान देने की बात है कि जलवायु परिवर्तन का मुकाबला टुकड़ों में नहीं किया जा सकता और न ही इसे त्योहारों या सप्ताहांतों के लिए रोका जा सकता है इसलिए मैंने 11 वर्षों तक घर वापस न लौटने का संकल्प लिया। पांच साल पहले लिए गए उस फैसले ने मेरी इस यात्रा की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य लोगों को जलवायु संकट और अक्षय ऊर्जा की ओर बढ़ने की तात्कालिकता के प्रति जागरूक करना है।

तब से मैं एक बस में रह रहा हूं। हालांकि इसका इंजन डीजल से चलता है, लेकिन इसकी छत पर लगे सौर पैनल इतनी बिजली पैदा करते हैं कि एक पंखा, कूलर एवं लाइटें चल सकें और लैपटॉप व मोबाइल फोन चार्ज हो सकें। लोग यह देखने के लिए बस में आते हैं कि मैं कैसे रहता हू। लेकिन मैं इसे एक मॉडल/आदर्श के रूप में अपनाने की सलाह नहीं देता। मैंने इसे मजबूरी में चुना, क्योंकि मैंने अपना घर छोड़ दिया था लेकिन फिर भी मुझे ठीक से खाने और सोने की जरूरत थी। बस को बनाने और उसमें यात्रा करने में काफी ऊर्जा खर्च होती है।

Q

आप ऊर्जा की खपत में कटौती करने पर जोर देते हैं। इसका आधार क्या है?

A

दुनिया की लगभग 80-85 प्रतिशत ऊर्जा आपूर्ति कोयले, कच्चे तेल और गैस से आती है, जिसे मैं “डार्क एनर्जी” कहता हूं। ऊर्जा का प्रत्येक उपयोगकर्ता कार्बन उत्सर्जक है, इसलिए जलवायु परिवर्तन के लिए हर व्यक्ति जिम्मेदार है। अतः इसका समाधान केवल बेहतर तकनीक या सौर ऊर्जा के विस्तार में नहीं है। इसकी शुरुआत एक साधारण सी सोच के साथ होती है, एक सीमित ग्रह पर खपत भी सीमित होनी चाहिए। यही कारण है कि “एनर्जी स्वराज यात्रा” के रूप में शुरू हुआ यह आंदोलन अब “फाइनाइट अर्थ मूवमेंट” बन गया है। जब खपत में कमी होगी तो कार्बन उत्सर्जन में भी गिरावट आएगी।

Q

आप इस संदेश को जनता तक कैसे पहुंचाते हैं?

A

मैंने पाया है कि अधिकांश लोग जलवायु परिवर्तन के कारणों और इसके समाधान के तरीकों को लेकर भ्रमित हैं। मैंने इस संदेश को सरल बनाने का बीड़ा उठाया है। मेरे द्वारा चलाए जाने वाले कार्यक्रमों में से एक “उपभोग साक्षरता” है। इसमें लोगों को यह सिखाया जाता है कि किसी भी उत्पाद के उपयोग से पहले और बाद में क्या होता है, इसका परीक्षण करके कैसे उपभोग किया जाए। यहां तक कि दांत साफ करने जैसी सामान्य क्रिया भी वस्तुओं की एक श्रृंखला पर निर्भर करती है, जो सभी औद्योगिक रूप से निर्मित होती हैं और ऊर्जा की खपत करती हैं व कार्बन उत्सर्जन करती हैं। एक बार जब लोग इसे समझ जाते हैं तो वे अपने उपभोग के प्रति सतर्क हो जाते हैं।

एक अन्य कार्यक्रम “ऊर्जा साक्षरता” पर है, जो यह समझने पर केंद्रित है कि ऊर्जा की प्रत्येक इकाई पर्यावरण को कैसे नुकसान पहुंचाती है। हम “मास्टर एजुकेटर्स” (मुख्य प्रशिक्षकों) को भी प्रशिक्षित कर रहे हैं और संगीत के माध्यम से लोगों तक पहुंचने के लिए एक “क्लाइमेट एल्बम” तैयार कर रहे हैं। हमारा लक्ष्य अगले तीन वर्षों में एक अरब लोगों को जलवायु कार्रवाई से जोड़ना है।

Down to Earth- Hindi
hindi.downtoearth.org.in