पश्चिमी घाट में कनखजूरे की तीन नई प्रजातियां मिलीं, भारत में इनकी कुल संख्या बढ़कर 23 हो गई।
भारतीय वैज्ञानिकों ने केरल और कर्नाटक से जुड़ी कनखजूरे की तीन नई प्रजातियों की पहचान की।
नई प्रजातियों के नाम कूर्ग, नेय्यार अभयारण्य और उनके शरीर की खास बनावट के आधार पर रखे गए।
वैज्ञानिकों ने सूक्ष्मदर्शी से शरीर के कांटों, पैरों और एंटीना की जांच कर नई प्रजातियों की पहचान की।
नई खोज ने पश्चिमी घाट की समृद्ध जैव विविधता और छोटे जीवों के संरक्षण की जरूरत को फिर उजागर किया।
केरल और कर्नाटक के जंगलों में छिपी जैव विविधता का नया खजाना सामने आया। वैज्ञानिकों की खोज ने एक बार फिर साबित किया कि पश्चिमी घाट की धरती पर आज भी प्रकृति के कई रहस्य उजागर होने बाकी हैं।
भारत के दक्षिणी हिस्से में फैले पश्चिमी घाट से एक दिलचस्प वैज्ञानिक खबर सामने आई है। यहां वैज्ञानिकों ने सेंटीपीड यानी कनखजूरों की तीन नई प्रजातियों की पहचान की है। इन प्रजातियों का नाम राइसिडा क्वाड्रिस्पिनोसा, राइसिडा कूर्गेन्सिस और राइसिडा नेय्यारेन्सिस रखा गया है। इस खोज के साथ भारत में राइसिडा वंश की ज्ञात प्रजातियों की संख्या बढ़कर 23 हो गई है। यह शोध इंटरनेशनल जर्नल ऑफ ट्रॉपिकल इंसेक्ट साइंस नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।
यह खोज केवल तीन नए जीवों की पहचान तक सीमित नहीं है। यह हमें बताती है कि प्रकृति के जिन हिस्सों को हम जानते हुए समझते हैं, वहां भी जीवन के कई अनदेखे रूप मौजूद हैं।
वैज्ञानिकों ने कैसे खोजीं नई प्रजातियां?
यह अध्ययन भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया) के पश्चिमी घाट क्षेत्रीय केंद्र, कोझिकोड और मालाबार क्रिश्चियन कॉलेज के शोधकर्ताओं ने किया। वैज्ञानिकों ने भारतीय प्राणी सर्वेक्षण के राष्ट्रीय प्राणी संग्रह में रखे उन कनखजूरों के नमूनों की जांच की, जिनकी पहचान पहले नहीं हो पाई थी।
शोधकर्ताओं ने सूक्ष्मदर्शी और डिजिटल कैमरों की मदद से इन जीवों के शरीर की बारीक बनावट का अध्ययन किया। उन्होंने पैरों पर मौजूद कांटों, शरीर के खंडों, एंटीना और अन्य संरचनाओं की तुलना पहले से ज्ञात प्रजातियों से की। इसके लिए उन्होंने वैज्ञानिक अभिलेखों और चिलोबेस 2.0 जैसे वैश्विक डेटाबेस का भी सहारा लिया।
लंबे और सावधानीपूर्वक अध्ययन के बाद वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे कि ये नमूने पहले से ज्ञात प्रजातियों से अलग हैं।
नामों में छिपी है खास कहानी
तीनों नई प्रजातियों के नाम उनकी शारीरिक विशेषताओं और भौगोलिक पहचान से जुड़े हैं।
पहली प्रजाति राइसिडा क्वाड्रीस्पिनोसा का नाम उसके पैरों पर मौजूद चार विशेष कांटों के आधार पर रखा गया है। इसके पिछले पैरों के एक हिस्से पर नीचे और किनारे की ओर चार कांटे पाए गए, जो इसकी पहचान की अहम विशेषता हैं।
दूसरी प्रजाति राइसिडा कूर्गेन्सिसका नाम कर्नाटक के कूर्ग क्षेत्र के नाम पर रखा गया है। इस नाम के जरिए उस इलाके की पहचान को वैज्ञानिक दुनिया में जगह मिली है, जहां से इसका नमूना एकत्र किया गया था।
तीसरी प्रजाति राइसिडा नेयारेंसिस का नाम केरल के नेय्यार वन्यजीव अभयारण्य के नाम पर रखा गया है। यह नाम उस प्राकृतिक क्षेत्र की याद दिलाता है, जहां से इस प्रजाति का संबंध सामने आया।
शरीर की बनावट से हुई पहचान
कनखजूरों की नई प्रजातियों की पहचान करना आसान काम नहीं है। देखने में एक जैसे लगने वाले जीवों के शरीर में मौजूद छोटी-छोटी भिन्नताएं ही उन्हें अलग प्रजाति साबित कर सकती हैं।
राइसिडा क्वाड्रीस्पिनोसा के एंटीना में 18 खंड पाए गए। इसके शरीर के कुछ खंडों के किनारों की बनावट और पिछले पैरों पर कांटों की व्यवस्था भी इसे दूसरी प्रजातियों से अलग करती है।
वहीं, राइसिडा कूर्गेन्सिस की पहचान उसकी पीठ पर मौजूद विशेष रेखाओं और शरीर के पिछले हिस्से के पास कांटों की बनावट से हुई। यह प्रजाति राइसिडा इखलामा से कुछ समानताएं रखती है, लेकिन इसकी आंतरिक संरचनाओं में अंतर इसे एक अलग पहचान देता है।
तीसरी प्रजाति राइसिडा नेयारेंसिस के पैरों पर मौजूद छोटे कांटों की संख्या और व्यवस्था खास है। इसके पहले से उन्नीसवें जोड़े तक के पैरों में दो-दो टार्सल स्पर पाए गए। इन सूक्ष्म विशेषताओं ने वैज्ञानिकों को इसकी अलग पहचान स्थापित करने में मदद की।
पश्चिमी घाट के लिए क्यों अहम है यह खोज?
पश्चिमी घाट दुनिया के प्रमुख जैव विविधता क्षेत्रों में गिना जाता है। यहां घने जंगल, नमी से भरपूर वातावरण और विविध प्राकृतिक परिस्थितियां असंख्य जीवों को आश्रय देती हैं। कई प्रजातियां ऐसी हैं, जिनके बारे में विज्ञान को अभी बहुत कम जानकारी है।
कनखजूरे छोटे जरूर हैं, लेकिन प्रकृति के संतुलन में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण है। ये शिकारी जीव छोटे कीड़ों और दूसरे अकशेरुकी जीवों को खाते हैं। इस तरह वे खाद्य शृंखला और मिट्टी के पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा बने रहते हैं।
तीन नई प्रजातियों की पहचान से वैज्ञानिकों को जीवों के विकास, उनके भौगोलिक वितरण और पश्चिमी घाट की जैव विविधता को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलेगी।
प्रकृति के अनदेखे खजाने को बचाने की जरूरत
इस खोज का सबसे बड़ा संदेश यही है कि जंगलों का महत्व केवल बड़े जानवरों, रंग-बिरंगे पक्षियों या दुर्लभ पेड़ों तक सीमित नहीं है। छोटे जीव भी प्राकृतिक व्यवस्था को मजबूत बनाए रखते हैं।
तेजी से बदलते पर्यावरण, जंगलों के घटते क्षेत्र और मानवीय गतिविधियों के बीच ऐसे जीवों के आवासों की रक्षा करना बेहद जरूरी है। वैज्ञानिकों की यह खोज हमें याद दिलाती है कि प्रकृति के कई रहस्य अब भी हमारी नजरों से दूर हैं।
पश्चिमी घाट के जंगलों में मिले ये तीन छोटे जीव आकार में भले ही मामूली हों, लेकिन इनकी खोज ने भारत की जैव विविधता की कहानी में एक नया अध्याय जोड़ दिया है।