कोल्ली पहाड़ियों में फर्न की नई प्रजाति मिली, वैज्ञानिकों ने इसे टेरिस मधुसूदनानी नाम दिया, संरक्षण की जरूरत बढ़ी। फोटो साभार: नॉर्डिक जर्नल ऑफ बॉटनी
वन्य जीव एवं जैव विविधता

तमिलनाडु की कोल्ली पहाड़ियों में मिली फर्न की नई प्रजाति, लेकिन क्यों खतरे में है इसका अस्तित्व?

तमिलनाडु की कोल्ली पहाड़ियों में मिली दुर्लभ फर्न की नई प्रजाति, वैज्ञानिकों ने नाम दिया टेरिस मधुसूदनानी, संरक्षण की तत्काल जरूरत

Dayanidhi

  • कोल्ली पहाड़ियों में फर्न की नई प्रजाति मिली, वैज्ञानिकों ने इसे टेरिस मधुसूदनानी नाम दिया, संरक्षण की जरूरत बढ़ी।

  • केरल के वैज्ञानिकों ने तमिलनाडु में दुर्लभ फर्न खोजा, डीएनए जांच और माइक्रोस्कोप से नई प्रजाति की पुष्टि हुई।

  • नई फर्न प्रजाति केवल दो छोटे क्षेत्रों में मिली, कुल आठ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र इसका प्राकृतिक आवास बताया गया है।

  • सड़क निर्माण, पेड़ों की कटाई और खेती से फर्न का आवास खतरे में, वैज्ञानिकों ने तत्काल संरक्षण की मांग उठाई।

  • नई प्रजाति का नाम वनस्पति वैज्ञानिक पी. वी. मधुसूदनन के सम्मान में रखा गया, उनके योगदान को वैज्ञानिकों ने सराहा।

तमिलनाडु की कोल्ली पहाड़ियों में भारतीय वनस्पति वैज्ञानिकों ने फर्न की एक दुर्लभ नई प्रजाति खोजी है। इसका नाम 'टेरिस मधुसूदनानी' रखा गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह पौधा बेहद सीमित क्षेत्र में पाया जाता है और इसके प्राकृतिक आवास पर मानव गतिविधियों का दबाव बढ़ रहा है।

पुलियानसोलाई जंगल के पास हुई खोज

यह महत्वपूर्ण खोज दक्षिण भारत में फर्न की प्रजातियों के वैज्ञानिक अध्ययन के दौरान हुई। केरल के गवर्नमेंट विक्टोरिया कॉलेज और श्री व्यास एनएसएस कॉलेज से जुड़े शोधकर्ताओं की टीम ने तमिलनाडु के पूर्वी घाट क्षेत्र में कई वैज्ञानिक अभियान चलाए।

इसी दौरान टीम को कोल्ली पहाड़ियों के पुलियानसोलाई शोल वन क्षेत्र के आसपास फर्न की एक ऐसी आबादी दिखाई दी, जो पहले दर्ज की गई प्रजातियों से अलग लग रही थी। पहली नजर में यह पौधा टेरिस परिवार की कुछ दूसरी प्रजातियों जैसा दिखाई देता था, लेकिन इसके कई शारीरिक गुण अलग थे।

वैज्ञानिकों ने पौधों के नमूने एकत्र किए और उनका प्रयोगशाला में विस्तार से अध्ययन किया। जांच के बाद यह पुष्टि हुई कि यह एक नई प्रजाति है। यह शोध नॉर्डिक जर्नल ऑफ बॉटनी नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।

आधुनिक तकनीक से हुई पहचान

नई प्रजाति की पहचान केवल पौधे के बाहरी रूप को देखकर नहीं की गई। शोधकर्ताओं ने कई वैज्ञानिक तरीकों का इस्तेमाल किया। इसमें पौधे की पत्तियों और दूसरे हिस्सों की पारंपरिक माप के साथ-साथ स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप की मदद ली गई।

माइक्रोस्कोप से इसके बीजाणुओं यानी स्पोर का बारीकी से अध्ययन किया गया। इसके अलावा वैज्ञानिकों ने डीएनए की जांच भी की। डीएनए अध्ययन से यह पता लगाने में मदद मिली कि यह नई प्रजाति फर्न की दूसरी प्रजातियों से किस तरह जुड़ी हुई है। इन सभी जांचों के परिणामों ने इस बात को मजबूत किया कि यह फर्न पहले से ज्ञात प्रजातियों से अलग है।

चमकदार पत्तियां और खास बनावट

टेरिस मधुसूदनानी की पहचान इसकी कुछ खास विशेषताओं से होती है। इसकी पत्तियां कड़ी और चमड़े जैसी होती हैं। इनका रंग गहरा हरा और सतह चमकदार दिखाई देती है।

इस फर्न की एक खास पहचान इसकी निचली पत्तियों के हिस्से में दिखाई देने वाली प्रमुख लोब है। इसकी पत्ती पर छोटे-छोटे भाग एक विशेष तरीके से व्यवस्थित होते हैं। वैज्ञानिक भाषा में इसे पिन्ना-पिन्न्यूल संरचना कहा जाता है।

इसके बीजाणुओं की बनावट भी इसे दूसरी संबंधित प्रजातियों से अलग करती है। इनमें एक संकरी और लहरदार किनारों वाली पट्टी पाई गई, जिसे वैज्ञानिक भाषा में ‘सिंगुलम’ कहा जाता है। संबंधित फर्न प्रजातियों में यह पट्टी अधिक चौड़ी और सामान्य रूप से चिकनी होती है।

वैज्ञानिक के सम्मान में रखा नाम

नई प्रजाति का नाम टेरिस मधुसूदनानी रखा गया है। इसका नाम प्रोफेसर डॉ. पी. वी. मधुसूदनन के सम्मान में रखा गया है। वे कालीकट विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग के पूर्व प्रमुख रहे हैं।

शोधकर्ताओं के अनुसार, प्रोफेसर मधुसूदनन ने भारत में फर्न के अध्ययन और शोध में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने कई युवा वैज्ञानिकों को वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। इसलिए नई प्रजाति का नाम उनके योगदान को सम्मान देने का एक तरीका है।

केवल छोटे क्षेत्र में मौजूद है पौधा

नई प्रजाति की खोज खुशी की खबर है, लेकिन इसके साथ चिंता भी जुड़ी हुई है। वैज्ञानिकों के अनुसार अभी तक यह फर्न केवल दो छोटे स्थानों पर पाया गया है। इन दोनों क्षेत्रों का कुल क्षेत्रफल करीब आठ वर्ग किलोमीटर बताया गया है।

सबसे बड़ी चिंता यह है कि ये क्षेत्र आधिकारिक रूप से संरक्षित नहीं हैं। यहां सड़क निर्माण, पेड़ों की कटाई और जंगल की जमीन को खेती में बदलने जैसी गतिविधियां इसके प्राकृतिक आवास को नुकसान पहुंचा सकती हैं।

इसी कारण इस नई प्रजाति को गंभीर रूप से संकटग्रस्त यानी ‘क्रिटिकली एंडेंजर्ड’ श्रेणी में रखा गया है।

तुरंत संरक्षण की जरूरत

वैज्ञानिकों का कहना है कि नई प्रजाति को बचाने के लिए जल्द कदम उठाने की जरूरत है। इसके प्राकृतिक आवास की सुरक्षा, जंगलों में मानवजनित गतिविधियों पर नियंत्रण और पौधे की आबादी की नियमित निगरानी जरूरी है।

कोल्ली पहाड़ियों की यह खोज बताती है कि भारत के जंगलों में आज भी कई ऐसी वनस्पतियां मौजूद हो सकती हैं, जिनके बारे में विज्ञान को पूरी जानकारी नहीं है। टेरिस मधुसूदनानी का संरक्षण केवल एक दुर्लभ फर्न को बचाना नहीं है, बल्कि देश की जैव विविधता और प्राकृतिक विरासत को सुरक्षित रखना भी है।