7,338 लोगों पर हुए अध्ययन में पाया गया कि आसान भाषा में बताई गई पर्यावरणीय समस्याएं लोगों को ज्यादा चिंतित करती हैं।
पेड़-पौधों और जानवरों के विलुप्त होने से 84 फीसदी लोग चिंतित हुए, जबकि जैव विविधता के नुकसान से 52 फीसदी।
केवल 34 फीसदी लोग जैव विविधता के नुकसान शब्द से परिचित थे, जबकि विलुप्त होने की बात 82 फीसदी लोग समझते थे।
पर्यावरणीय संदेशों में संकट शब्द जोड़ने से चिंता हमेशा नहीं बढ़ती, बल्कि सरल और परिचित शब्द ज्यादा असरदार साबित हो सकते हैं।
आसान भाषा में समझाने पर जैव विविधता के नुकसान को लेकर चिंता 52 फीसदी से बढ़कर 83 फीसदी हो गई।
प्रकृति खतरे में है, यह बात हम अक्सर सुनते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि प्रकृति को बचाने की अपील में इस्तेमाल किए गए शब्द भी लोगों की चिंता को कम या ज्यादा कर सकते हैं? वैज्ञानिकों के एक नए अध्ययन में इसका दिलचस्प जवाब मिला है। लोगों को ‘जैव विविधता का नुकसान’ कहने के बजाय ‘पेड़-पौधों और जानवरों का विलुप्त होना’ बताया जाए, तो वे समस्या को ज्यादा आसानी से समझते हैं और अधिक चिंता जताते हैं।
अमेरिका में किए गए इस अध्ययन में 7,338 वयस्कों ने हिस्सा लिया। शोधकर्ताओं ने जानना चाहा कि प्रकृति के घटते वैभव को बताने वाले अलग-अलग शब्द लोगों की समझ, चिंता और संरक्षण से जुड़ी नीतियों के प्रति उनके समर्थन पर क्या असर डालते हैं। यह अध्ययन 'एनपीजे बायोडायवर्सिटी' पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।
82 फीसदी लोग समझते हैं ‘विलुप्त होना’
अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि शब्दों का चुनाव मामूली बात नहीं है। जब लोगों को केवल शब्द बताए गए, तो 82 फीसदी प्रतिभागियों ने कहा कि वे ‘पेड़-पौधों और जानवरों का विलुप्त होना’ वाक्यांश से परिचित हैं। इसके मुकाबले केवल 34 फीसदी लोग ‘जैव विविधता का नुकसान’ शब्द से परिचित थे।
चिंता के मामले में भी यही अंतर दिखा। पेड़-पौधों और जानवरों के विलुप्त होने की बात सुनकर 84 फीसदी लोगों ने चिंता जताई, जबकि जैव विविधता के नुकसान के बारे में ऐसा कहने वालों का आंकड़ा 52 फीसदी था।
यानी, एक ही पर्यावरणीय समस्या को बताने के लिए इस्तेमाल किए गए शब्द लोगों की प्रतिक्रिया में बड़ा अंतर पैदा कर सकते हैं।
आखिर ‘जैव विविधता’ में ऐसा क्या है?
जैव विविधता का मतलब है धरती पर मौजूद जीव-जंतुओं, पेड़-पौधों और दूसरे जीवों की विविधता। इसमें केवल किसी प्रजाति का पूरी तरह खत्म होना शामिल नहीं है। किसी प्रजाति की संख्या में गिरावट आना और जीवों के भीतर आनुवंशिक विविधता कम होना भी इसके दायरे में आता है।
वैज्ञानिकों के लिए यह शब्द बहुत उपयोगी है, लेकिन आम लोगों के लिए इसका अर्थ समझना आसान नहीं होता। इसके उलट, किसी जानवर या पौधे के हमेशा के लिए धरती से गायब हो जाने की कल्पना तुरंत समझ में आ जाती है।
शोधकर्ताओं का मानना है कि विलुप्त होने जैसे परिचित शब्दों से लोगों को समस्या की गंभीरता समझने में मदद मिल सकती है।
हर बात में ‘संकट’ जोड़ना जरूरी नहीं
पर्यावरण से जुड़ी खबरों और अभियानों में अक्सर ‘संकट’ शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। मकसद होता है कि लोग खतरे को गंभीरता से लें। लेकिन इस अध्ययन में केवल ‘संकट’ जोड़ देने से चिंता बढ़ने का कोई स्पष्ट फायदा नहीं दिखा।
‘जैव विविधता का संकट’ सुनने वाले लोगों की प्रतिक्रिया लगभग वैसी ही थी, जैसी ‘जैव विविधता का नुकसान’ सुनने वालों की। वहीं, ‘विलुप्ति संकट’ शब्द से परिचित लोगों की संख्या 47 फीसदी थी और 56 फीसदी ने चिंता जताई। इसके मुकाबले बिना ‘संकट’ वाले विलुप्त होने के वाक्यांश के आंकड़े क्रमशः 82 और 84 फीसदी थे।
इससे पता चलता है कि किसी संदेश को प्रभावशाली बनाने के लिए उसे डरावना बनाना ही जरूरी नहीं। कभी-कभी साफ और सीधी भाषा ज्यादा असरदार होती है।
आसान जानकारी से बढ़ी चिंता
शोधकर्ताओं ने कुछ प्रतिभागियों को शब्दों के साथ एक छोटी-सी व्याख्या भी दी। इसमें बताया गया कि धरती पर जीवन की विविधता घट रही है, कई प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं और इंसान भोजन, हवा तथा पानी के लिए प्रकृति पर निर्भर हैं।
इसके बाद ‘जैव विविधता का नुकसान’ शब्द सुनने वालों में चिंता जताने वालों का आंकड़ा 52 फीसदी से बढ़कर 83 फीसदी हो गया। इसी तरह, सरल व्याख्या के साथ ‘प्रकृति का नुकसान’ सुनने वाले 90 फीसदी लोगों ने चिंता जताई।
इसका अर्थ है कि मुश्किल शब्दों को पूरी तरह हटाना ही एकमात्र रास्ता नहीं है। उनके साथ आसान भाषा में उनका मतलब समझाना भी कारगर हो सकता है।
चिंता बढ़ी, लेकिन क्या लोग कुछ करेंगे?
अध्ययन की एक अहम बात यह भी है कि शब्दों के कारण चिंता में अंतर आया, लेकिन जमीन और पानी की रक्षा से जुड़ी नीतियों के समर्थन में बहुत कम अंतर दिखा। अलग-अलग शब्द सुनने वाले 84 से 95 फीसदी लोगों ने ऐसी नीतियों का समर्थन किया।
हालांकि अध्ययन यह नहीं बताता कि सही शब्द चुनने से लोग वास्तव में पेड़ लगाने, दान देने या वन्यजीवों की रक्षा के लिए आगे आएंगे या नहीं।
यह शोध अमेरिका के अंग्रेजी बोलने वाले वयस्कों पर किया गया था। इसलिए इसके नतीजों को भारत समेत दूसरे देशों पर सीधे लागू करने से पहले वहां के लोगों पर भी अध्ययन करना जरूरी है।
प्रकृति बचाने की शुरुआत सही संवाद से
`दक्षिण अमेरिका के जंगलों से लेकर भारत के जंगलों, नदियों और खेतों तक, प्रकृति का महत्व लोगों के जीवन से जुड़ा है। लेकिन उसकी रक्षा के लिए जरूरी है कि खतरे की बात हर व्यक्ति तक समझ में आने वाली भाषा में पहुंचे।
यह अध्ययन एक सीधा संदेश देता है: पर्यावरण की बात करते समय भारी-भरकम शब्दों से ज्यादा जरूरी है कि लोग समझें कि खो क्या रहा है और उसका उनके जीवन से क्या संबंध है। आखिरकार, जब बात प्रकृति को बचाने की हो, तो संदेश जितना साफ होगा, उसे समझना उतना ही आसान होगा।