लुधियाना के बुड्ढा दरिया में अवैध निर्माण को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। आवेदकों ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में दायर जवाब में आरोप लगाया है कि संयुक्त समिति की रिपोर्ट में गलत और अधूरी जानकारी देकर दरिया के तल और बफर जोन में जारी निर्माण को छिपाने की कोशिश की गई।
तस्वीरों के जरिए बहते पानी के बीच बन रही आरसीसी दीवारों और घटती दरिया चौड़ाई के सबूत भी पेश किए गए हैं।
आवेदकों ने कहा है कि किसी प्राकृतिक जलस्रोत के किनारे ऊंची आरसीसी दीवारें बनाने से वहां पौधों और जंगली वनस्पतियों के लिए जगह खत्म हो जाती है। यही वनस्पतियां पानी में मौजूद गंदगी को सोखने, प्राकृतिक फिल्ट्रेशन और भूजल को रिचार्ज करने में अहम भूमिका निभाती हैं।
इसके अलावा दरिया के तल, किनारों और बफर जोन में कंक्रीट का निर्माण अदालत के निर्देशों का भी उल्लंघन है।
लुधियाना के बुड्ढा दरिया में हो रहे निर्माण को लेकर विवाद गहरा गया है। आवेदकों की ओर से दायर जवाबी हलफनामे में संयुक्त समिति की रिपोर्ट पर गंभीर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया गया है कि इसमें गलत और अधूरी जानकारी दी गई है, ताकि दरिया के तल और उसके बफर जोन में हो रहे अवैध निर्माण को बचाया जा सके।
यह बात 27 फरवरी 2026 को आवेदकों (पब्लिक एक्शन कमेटी) द्वारा नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के समक्ष दायर जवाब में कही गई है। इसमें 9 जनवरी 2026 को पेश की गई संयुक्त समिति की रिपोर्ट को भ्रामक बताया गया है।
आवेदकों ने 27 फरवरी 2026 को खींची गई आठ तस्वीरें भी प्रस्तुत की हैं। इन तस्वीरों में बुद्धा दरिया के तल और बफर जोन में जारी अवैध निर्माण गतिविधियां और कुछ स्थानों पर दरिया की मौजूदा चौड़ाई साफ दिखाई दे रही है। इनमें से दो तस्वीरों में बहते पानी के बीच ही आरसीसी रिटेनिंग वॉल का निर्माण होता नजर आ रहा है।
संयुक्त समिति की रिपोर्ट पर उठे सवाल
आवेदकों का कहना है कि संयुक्त समिति ने जांच के दौरान न तो बुड्ढा दरिया के राजस्व नक्शे का जिक्र किया है और न ही मौके पर की गई वास्तविक माप की जानकारी दी है।
इतना ही नहीं, प्राकृतिक जलस्रोत के बफर जोन पर भी कोई टिप्पणी नहीं की गई। इसके बजाय समिति ने लुधियाना म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन के उस दावे को दोहरा दिया, जिसमें कहा गया था कि आरसीसी दीवार से पानी का ओवरफ्लो नहीं बढ़ेगा, बल्कि उसे नियंत्रित करने में मदद मिलेगी।
आवेदकों ने इस दावे को गलत बताते हुए कहा है कि किसी प्राकृतिक जलस्रोत के किनारे ऊंची आरसीसी दीवारें बनाने से वहां पौधों और जंगली वनस्पतियों के लिए जगह खत्म हो जाती है। यही वनस्पतियां पानी में मौजूद गंदगी को सोखने, प्राकृतिक फिल्ट्रेशन और भूजल को रिचार्ज करने में अहम भूमिका निभाती हैं। इसके अलावा दरिया के तल, किनारों और बफर जोन में कंक्रीट का निर्माण अदालत के निर्देशों का भी उल्लंघन है।
जवाबी हलफनामे में यह भी कहा गया है कि संयुक्त समिति ने यह कहकर गंभीर गलती की है कि बुड्ढा दरिया के भीतर कोई निर्माण नहीं हुआ और इसके तल की चौड़ाई में कमी नहीं आई है। जबकि हकीकत यह है कि नगर निगम द्वारा दरिया के तल और बफर जोन में आरसीसी की दीवारें और सड़कें बनाई जा रही हैं।
मास्टर प्लान लागू करने में नाकाम नगर निगम
आवेदकों का आरोप है कि म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन मास्टर प्लान के प्रावधानों को लागू करने में भी विफल रही है। इसके कारण बुड्ढा दरिया के किनारे आवासीय क्षेत्रों में अवैध व्यावसायिक और औद्योगिक इमारतों की भरमार हो गई है।
इन पर कार्रवाई करने के बजाय ऐसी गैर-कानूनी गतिविधियों को आसान बनाने और रेगुलर करने के लिए नगर निगम दरिया और उसके बफर जोन को नुकसान पहुंचाकर अवैध निर्माणों को बढ़ावा दे रहा है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ओल्ड जीटी रोड ब्रिज से बजवा नगर ब्रिज तक के इलाके में लगातार मिट्टी डालकर दरिया की चौड़ाई कम की जा रही है, ताकि वहां सड़कें, दुकानें, औद्योगिक इमारतें, धार्मिक ढांचे और जानवरों के शेड बनाए जा सकें। इस पूरी प्रक्रिया पर नगर निगम की ओर से कोई कार्रवाई नहीं की गई है।
अपनी रिपोर्ट में आवेदकों ने यह भी बताया कि बुड्ढा दरिया एक प्राकृतिक जलधारा है और इस पर 18 अक्टूबर 2018 को पंजाब के टाउन एंड कंट्री प्लानिंग, हाउसिंग एंड अर्बन डेवलपमेंट विभाग द्वारा जारी अधिसूचना लागू होती है। इसके तहत ऐसे जलस्रोतों के दोनों किनारों पर कम से कम 5 मीटर चौड़ा ग्रीन बेल्ट रखना अनिवार्य है, ताकि पारिस्थितिक संतुलन बना रहे, भूजल रिचार्ज हो सके और अतिक्रमण को रोका जा सके।
खल रही जल संसाधन विभाग की चुप्पी
लेकिन आरोप है कि लुधियाना म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन ने इन अनिवार्य नियमों का खुलेआम उल्लंघन करते हुए न तो ग्रीन बेल्ट छोड़ी और न ही निर्माण कार्य रोका। इसके बजाय बुड्ढा दरिया के अंदर और किनारों पर कंस्ट्रक्शन का काम किया है।
आवेदकों ने यह भी कहा कि हैरानी की बात यह है कि जल संसाधन विभाग भी इन गतिविधियों पर चुप्पी साधे हुए है। इससे न केवल सरकारी अधिसूचना का मकसद कमजोर पड़ रहा है, बल्कि प्राकृतिक जल निकासी तंत्र को भी अपूरणीय नुकसान पहुंच रहा है।