प्रतीकात्मक तस्वीर 
जल

हिंगोनिया बांध: कागजों में आद्रभूमि, जमीन पर अतिक्रमण; एनजीटी ने मांगा जमीन और कब्जे का पूरा हिसाब

जयपुर के हिंगोनिया बांध की जमीन पर अतिक्रमण के मामले में एनजीटी ने सख्त रूप अपनाया हुआ है और अगली सुनवाई में जल संसाधन विभाग व जेडीए के अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया है।

Susan Chacko, Lalit Maurya

  • जयपुर के हिंगोनिया बांध से लेकर प्रयागराज की यमुना तक, जलस्रोतों और उनके प्राकृतिक क्षेत्र को बचाने की लड़ाई अब जमीन पर उतरती दिखाई दे रही है।

  • हिंगोनिया बांध मामले में एनजीटी ने राजस्थान सरकार से जलाशय का कुल क्षेत्रफल, नक्शा, राजस्व रिकॉर्ड, कैचमेंट और फुल टैंक लेवल क्षेत्र का पूरा ब्योरा मांगा है। सुनवाई के दौरान एनजीटी को बताया गया कि हिंगोनिया जलाशय को अब आर्द्रभूमि यानी वेटलैंड के रूप में दर्ज किया गया है। इ

  • जिला प्रशासन की रिपोर्ट में निजी लोगों द्वारा जल निकाय की जमीन पर अतिक्रमण की पुष्टि के बाद अधिकरण ने जल संसाधन विभाग और जेडीए के संबंधित अधिकारियों को अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने का निर्देश दिया है।

  • वहीं, प्रयागराज में यमुना के बाढ़ क्षेत्र के सीमांकन का काम पूरा हो चुका है और अब उसकी जमीन पर कंक्रीट के पिलर लगाकर प्राकृतिक सीमा को स्थायी रूप से चिन्हित किया जा रहा है।

  • मानसून के दौरान जलभराव से काम प्रभावित हुआ, लेकिन इसे 30 नवंबर तक पूरा करने का लक्ष्य है।

  • दोनों मामलों में एनजीटी का रुख साफ है—जलाशयों और नदियों की जमीन सिर्फ कागजों में सुरक्षित नहीं, बल्कि जमीन पर भी उनकी सीमाएं और प्राकृतिक क्षेत्र सुरक्षित होने चाहिए। क्योंकि इन क्षेत्रों पर कब्जा सिर्फ जमीन पर कब्जा नहीं, बल्कि पानी, पर्यावरण और शहरों के भविष्य पर भी खतरा है।

जयपुर का हिंगोनिया बांध, जो कभी पानी और आसपास के प्राकृतिक तंत्र के लिए अहम था, अब अतिक्रमण के सवालों से घिर गया है।

बांध की जमीन पर अतिक्रमण के आरोपों को गंभीरता से लेते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की सेंट्रल बेंच ने राजस्थान सरकार से जलाशय और उसके आसपास की जमीन की स्थिति स्पष्ट करने को कहा है।

2 सितंबर 2026 को इस मामले में हुई सुनवाई के दौरान एनजीटी को बताया गया कि हिंगोनिया जलाशय को अब आर्द्रभूमि यानी वेटलैंड के रूप में दर्ज किया गया है। इसके बाद अधिकरण ने जल संसाधन विभाग, राजस्थान और जयपुर विकास प्राधिकरण (जेडीए) को जलाशय से जुड़ी पूरी जानकारी स्पष्ट रूप से पेश करने का निर्देश दिया।

एनजीटी ने कहा कि जलाशय का कुल क्षेत्रफल, नक्शा, राजस्व रिकॉर्ड, कैचमेंट क्षेत्र और फुल टैंक लेवल (एफटीएल) क्षेत्र स्पष्ट रूप से रिकॉर्ड पर रखा जाए। यानी बांध की जमीन आखिर कितनी है, उसका पानी कहां तक फैलता है और उसके आसपास का कैचमेंट कितना क्षेत्र घेरता है, इन सभी सवालों का जवाब अब अधिकारियों को देना होगा।

अगली सुनवाई में अधिकारी खुद होंगे मौजूद

मामले की गंभीरता को देखते हुए एनजीटी ने जल संसाधन विभाग और जेडीए के ऐसे अधिकारियों को अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने का निर्देश दिया है, जिन्हें इस मामले की पर्याप्त जानकारी हो और जिनके पास संबंधित रिकॉर्ड उपलब्ध हों।

मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर 2026 को होगी। अधिकारियों को उस दिन जलाशय की वास्तविक स्थिति और अतिक्रमण से जुड़े तथ्यों पर अधिकरण के सामने स्थिति स्पष्ट करनी होगी। 

निजी लोगों द्वारा अतिक्रमण की भी हुई पुष्टि

यह मामला हिंगोनिया बांध की उस जमीन से जुड़ा है, जिसे राजस्थान सरकार ने पहले अधिग्रहित किया था और बाद में वहां बांध का निर्माण किया गया। इस मामले में सबसे चिंताजनक पहलू जयपुर जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) की वह रिपोर्ट है, जिसने इस बात पर मुहर लगा दी है कि जल निकाय की जमीन पर निजी लोगों ने अवैध कब्जे कर रखे हैं।

हैरान करने वाली बात यह है कि जिस जमीन को बचाने की जिम्मेदारी प्रशासन की थी, वह कागजों में जयपुर विकास प्राधिकरण  के अधिकार क्षेत्र में होने के बावजूद अतिक्रमणकारियों के हवाले पड़ी रही।

हिंगोनिया बांध की जमीन पर अतिक्रमण का यह सवाल सिर्फ सरकारी रिकॉर्ड या जमीन की सीमा का मामला नहीं है। जलाशय और वेटलैंड किसी शहर के लिए सिर्फ पानी का ठिकाना नहीं होते, बल्कि वे बारिश के पानी को संभालने, भूजल को रिचार्ज करने और स्थानीय पारिस्थितिकी को जीवित रखने में भी अहम भूमिका निभाते हैं। ऐसे प्राकृतिक क्षेत्र पर अतिक्रमण का असर आखिरकार शहर और उसके लोगों पर ही पड़ता है।

अब एनजीटी के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि हिंगोनिया बांध की वास्तविक सीमा क्या है, उसकी कितनी जमीन सुरक्षित है और उस पर हुए अतिक्रमण को हटाने के लिए अब तक क्या कार्रवाई की गई है। 29 सितंबर की सुनवाई में इन सवालों पर तस्वीर और साफ होने की उम्मीद है।

उत्तर प्रदेश: यमुना के डूब क्षेत्र को बचाने की कवायद तेज, प्रयागराज में तय हुई नदी की प्राकृतिक सीमा

यमुना के अस्तित्व, उसके प्रवाह और तटीय इलाकों की सुरक्षा को लेकर बड़ा कदम आगे बढ़ाया गया है। प्रयागराज में नदी के बाढ़ क्षेत्र को अतिक्रमण और अनियोजित निर्माण से बचाने की दिशा में काम आगे बढ़ा है।

एक सितंबर, 2026 को इस मामले की सुनवाई के दौरान विभाग की ओर से नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) को बताया गया कि प्रयागराज में यमुना के बाढ़ क्षेत्र के सीमांकन का काम पूरा हो चुका है। अब जमीन पर इसकी पहचान कायम करने के लिए कंक्रीट के पिलर लगाने लगाने का काम जारी है, जिसे 30 नवंबर, 2026 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।

ऐसे में एनजीटी ने उत्तर प्रदेश के सिंचाई एवं जल संसाधन विभाग और बाढ़ कार्य खंड, प्रयागराज को बाढ़ क्षेत्र के सीमांकन की प्रगति पर अगली रिपोर्ट 11 दिसंबर, 2026 तक दाखिल करने का निर्देश दिया है।

यमुना के अस्तित्व और तटीय इलाकों की सुरक्षा की ओर बड़ा कदम

रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई और अगस्त में मानसून के दौरान यमुना के जलग्रहण क्षेत्र में हुई भारी बारिश से नदी का बहाव अचानक बढ़ गया। इसके चलते प्रयागराज में नदी के निचले इलाकों और किनारे के कई हिस्सों में जलभराव हो गया। पानी भरने से इन क्षेत्रों तक पहुंचना मुश्किल हुआ और स्तंभ लगाने के काम में अस्थाई बाधा आई।

हालांकि, विभाग का कहना है कि अब स्तंभों की ढलाई का काम तेजी से चल रहा है और 30 नवंबर तक इन्हें जमीन पर लगाने का काम पूरा कर लिया जाएगा।

गौरतलब है यमुना का बाढ़ क्षेत्र केवल नदी के किनारे की जमीन नहीं, बल्कि नदी के फैलाव और अतिरिक्त पानी को संभालने वाला उसका प्राकृतिक क्षेत्र है। ऐसे इलाकों का स्पष्ट सीमांकन इसलिए महत्वपूर्ण है, ताकि बाढ़ के प्राकृतिक रास्तों पर अतिक्रमण और निर्माण को रोका जा सके और नदी को सांस लेने की जगह मिल सके।