वैज्ञानिकों ने एफवीआईपीटी2 जीन को सक्रिय कर स्ट्रॉबेरी का रंग, खुशबू और पोषण गुणवत्ता बढ़ाने में बड़ी सफलता प्राप्त की।
शोध में पाया गया कि जीन परिवर्तन से फल की गुणवत्ता बढ़ी लेकिन पौधे की वृद्धि और आकार पर असर नहीं पड़ा।
स्ट्रॉबेरी में एंथोसायनिन और टरपीनोइड्स की मात्रा बढ़ने से रंग गहरा और सुगंध अधिक आकर्षक हुई।
एफवीआईपीटी2 जीन ने साइटोकिनिन स्तर नियंत्रित कर बिना विकास बाधित किए फल की रासायनिक संरचना में सुधार दिखाया।
अध्ययन ने दिखाया कि सामान्य माने जाने वाले हाउसकीपिंग जीन भी फसल गुणवत्ता सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
चीन के नानजिंग कृषि विश्वविद्यालय और कनेक्टिकट विश्वविद्यालय अमेरिका के वैज्ञानिकों ने स्ट्रॉबेरी पर किए गए एक नए अध्ययन में पौधों की गुणवत्ता सुधारने का एक अनोखा तरीका खोजा है। यह शोध हाल ही में वैज्ञानिक पत्रिका हॉर्टिकल्चर रिसर्च में प्रकाशित हुआ है। इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने एक ऐसे जीन पर काम किया जिसे पहले केवल सामान्य कोशिकीय काम करने वाला “हाउसकीपिंग जीन” माना जाता था। इस जीन का नाम एफवीआईपीटी2 है।
वैज्ञानिकों ने पाया कि यदि इस जीन की गतिविधि बढ़ा दी जाए, तो स्ट्रॉबेरी के फल का रंग, खुशबू और पोषण मूल्य बेहतर हो जाता है, लेकिन पौधे की बढ़त, फल का आकार और मिठास पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता।
पहले साधारण समझा जाता था यह जीन
अब तक वैज्ञानिक मानते थे कि टीआरएनए प्रकार के इस जीन का काम सिर्फ कोशिका के अंदर सामान्य कार्यों को बनाए रखना है। यह पौधों के गुणों जैसे स्वाद, रंग या खुशबू को सीधे प्रभावित नहीं करता। लेकिन इस नए शोध ने इस धारणा को गलत साबित कर दिया है।
एफवीआईपीटी2 जीन पौधे में साइटोकिनिन नामक हार्मोन से जुड़ा होता है, जो पौधों की वृद्धि और विकास में अहम भूमिका निभाता है। सामान्य रूप से ऐसे हार्मोन पौधे के आकार और विकास को बहुत प्रभावित करते हैं। इसलिए वैज्ञानिकों को डर था कि अगर इस जीन में बदलाव किया गया तो पौधे की बढ़त पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। लेकिन परिणाम बिल्कुल अलग निकले।
पौधे की वृद्धि पर कोई असर नहीं
वैज्ञानिकों ने जब इस जीन की मात्रा बढ़ाई तो पाया कि पौधे सामान्य रूप से ही बढ़े। उनकी ऊंचाई, पत्तियों का विकास, फूल आना और फल बनना सब कुछ सामान्य रहा। यहां तक कि फल का वजन, आकार और स्वाद भी पहले जैसा ही रहा। इसका मतलब यह था कि पौधे की बुनियादी वृद्धि पर कोई नुकसान नहीं हुआ।
यह बात इस शोध को खास बनाती है क्योंकि आमतौर पर जब वैज्ञानिक फल की गुणवत्ता सुधारने की कोशिश करते हैं, तो पौधे की वृद्धि प्रभावित हो जाती है।
फल का रंग और खुशबू हुई बेहतर
हालांकि पौधे की वृद्धि में कोई बदलाव नहीं आया, लेकिन फल के अंदर के रासायनिक तत्वों में बड़ा बदलाव देखा गया। स्ट्रॉबेरी में एंथोसायनिन नामक पिगमेंट की मात्रा बढ़ गई, जिससे फल का रंग पहले से ज्यादा गहरा और आकर्षक लाल हो गया। यह पिगमेंट एंटीऑक्सीडेंट गुणों के लिए भी जाना जाता है, जो सेहत के लिए फायदेमंद होता है।
इसके अलावा फ्लेवोनॉइड्स और फिनोलिक यौगिकों की मात्रा भी बढ़ गई। वैज्ञानिकों ने पाया कि फल में मौजूद नौ अलग-अलग एंथोसायनिन प्रकारों की मात्रा में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
सुगंध और स्वाद में भी सुधार
इस शोध का एक और दिलचस्प परिणाम फल की खुशबू से जुड़ा था। स्ट्रॉबेरी में पाए जाने वाले सुगंधित यौगिकों में सुधार हुआ। खासकर लीनालूल नामक यौगिक की मात्रा बढ़ी, जो फूलों जैसी मीठी खुशबू देता है।
इसके विपरीत कुछ ऐसे यौगिक कम हो गए जो रेजिन जैसी तेज और कम पसंदीदा गंध पैदा करते हैं। इससे फल की कुल सुगंध अधिक आकर्षक और प्राकृतिक हो गई।
वैज्ञानिकों के अनुसार, इस बदलाव के पीछे उन जैविक मार्गों की सक्रियता बढ़ना है जो इन सुगंधित यौगिकों का निर्माण और परिवहन करते हैं।
नई दिशा में कृषि अनुसंधान
इस अध्ययन ने यह साबित किया कि पौधों में कुछ ऐसे जीन भी होते हैं जिन्हें पहले बहुत सामान्य माना जाता था, लेकिन वे फल की गुणवत्ता को गहराई से प्रभावित कर सकते हैं। FveIPT2 जैसे जीन को नियंत्रित करके बिना पौधे को नुकसान पहुंचाए बेहतर फल तैयार किए जा सकते हैं।
वैज्ञानिकों का मानना है कि यह खोज भविष्य में अन्य फसलों पर भी लागू हो सकती है, जिससे अधिक स्वादिष्ट, पौष्टिक और आकर्षक फल और सब्जियां विकसित की जा सकती हैं।
यह शोध कृषि विज्ञान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इसमें यह दिखाया गया है कि पौधों की बुनियादी जैविक प्रक्रियाओं को समझकर हम बिना उत्पादन घटाए उनकी गुणवत्ता को बेहतर बना सकते हैं। आने वाले समय में यह तकनीक किसानों और उपभोक्ताओं दोनों के लिए बहुत उपयोगी साबित हो सकती है।