प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक 
स्वच्छता

पश्चिम बंगाल में कचरा प्रबंधन की बदहाल तस्वीर, 1.49 करोड़ टन पुराने कचरे का निपटान बाकी

एनजीटी की सख्ती के बावजूद 1.49 करोड़ टन पुराने कचरे का ढेर कायम है और हर दिन 8,069 टन नया कचरा इसमें जुड़ रहा है।

Susan Chacko, Lalit Maurya

  • पश्चिम बंगाल में ठोस और तरल कचरा प्रबंधन की सुस्त रफ्तार पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने गंभीर चिंता जताई है।

  • अपने आदेश में अधिकरण ने कहा कि राज्य ने कचरा प्रबंधन की कमियों को दूर करने के लिए न पर्याप्त तेजी दिखाई है, न ही समयबद्ध लक्ष्य तय किए हैं। मार्च 2026 तक राज्य में 1.49 करोड़ टन पुराना कचरा निपटान का इंतजार कर रहा था, जबकि हर दिन करीब 8,069 टन नया कचरा इस ढेर में जुड़ रहा है।

  • राज्य के 128 शहरी निकायों में से 88 अब भी मिला-जुला कचरा डंपिंग साइट पर भेज रहे हैं और 114 निकायों में कचरा प्रसंस्करण संयंत्र नहीं हैं।

  • जैविक कचरे के प्रसंस्करण में भी रोज 4,120 टन से अधिक की कमी है। सीवेज प्रबंधन की रिपोर्ट को एनजीटी ने ‘अधूरी’ और ‘अस्पष्ट’ बताते हुए गंगा और चूर्णी नदी में उपचारित तथा बिना उपचार वाला सीवेज छोड़े जाने पर चिंता जताई।

  • अधिकरण ने राज्य को समयबद्ध कार्ययोजना बनाने और अगली अनुपालन रिपोर्ट में जमीन पर हुई प्रगति का स्पष्ट ब्योरा देने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 3 फरवरी 2027 को होगी।

पश्चिम बंगाल में ठोस और तरल कचरे के प्रबंधन की सुस्त कार्यप्रणाली पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने गहरा असंतोष और चिंता व्यक्त की है।

ट्रिब्यूनल का कहना है, "राज्य ने कचरा प्रबंधन की कमियों को दूर करने के लिए न तो पर्याप्त तेजी दिखाई है और न ही समयबद्ध लक्ष्य तय किए हैं।" अदालत ने यह भी पाया कि राज्य, जिला या स्थानीय निकाय स्तर पर इस काम की निगरानी के लिए कोई पारदर्शी समीक्षा तंत्र तक मौजूद नहीं है।

एनजीटी की नाराजगी के बाद भी कचरा प्रबंधन की रफ्तार सुस्त

एनजीटी द्वारा 22 जुलाई 2026 का दिया यह आदेश 5 अगस्त को वेबसाइट पर अपलोड किया गया है।

गौरतलब है कि इससे पहले भी 22 फरवरी 2024, 16 फरवरी 2025 और 2 सितंबर 2025 के अपने आदेशों में एनजीटी पश्चिम बंगाल में ठोस कचरे के प्रसंस्करण में भारी कमी, पुराने कचरे के लगातार बढ़ते ढेर और जलस्रोतों में बड़ी मात्रा में मिल रहे सीवेज पर चिंता जता चुका है।

22 जुलाई, 2026 को हुई सुनवाई में एनजीटी ने पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव की और से दाखिल छह महीने की कम्प्लायंस रिपोर्ट की भी समीक्षा की। इस रिपोर्ट में मार्च 2026 तक राज्य में ठोस और तरल कचरे के प्रबंधन की स्थिति की जानकारी दी गई है।

128 में से 88 निकाय अब भी मिला-जुला कचरा भेज रहे डंपिंग साइट

अधिकरण ने पाया कि राज्य के 128 शहरी स्थानीय निकायों में से 88 अब भी बिना अलग किए गए मिला-जुला कचरा डंपिंग साइट पर भेज रहे हैं, जो ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 के प्रावधानों का सीधा उल्लंघन है। ऐसे में अदालत ने कचरे को स्रोत पर ही अलग करने की प्रक्रिया को तेज करने के निर्देश दिए हैं।

इसी तरह राज्य में जैविक कचरे की स्थिति भी बेहद चिंताजनक है। राज्य में हर दिन 5,641.9 टन गीला जैविक कचरा पैदा हो रहा है, लेकिन 31 निकायों में हर दिन इसकी केवल 1,521.36 टन मात्रा ही कंपोस्टिंग के लिए पहुंच रही है। यानी इसके निपटान में हर दिन अब भी 4,120.55 टन का अंतर है। एनजीटी ने कहा कि यह कचरा रोजाना डंपिंग यार्डों में पड़ा सड़ रहा है।

कोलकाता में भी स्थिति कोई खास बेहतर नहीं। यहां रोज 2,017.4 टन जैविक कचरा पैदा होता है, लेकिन महज 602 टन ही कंपोस्टिंग के लिए लिया जा रहा है।

अधिकरण ने यह भी सवाल उठाया कि इंटरमीडिएट प्रोसेसिंग साइटों पर जब बिना अलग किए गए कचरे की कंपोस्टिंग हो रही है, तो तैयार कंपोस्ट की गुणवत्ता से जुड़ी रिपोर्ट उपलब्ध क्यों नहीं है।

114 निकायों में अब तक नहीं बने वेस्ट प्रोसेसिंग प्लांट

कुल कचरे के प्रसंस्करण की समीक्षा में सामने आया है कि राज्य के 128 में से 114 शहरी निकायों में अभी तक वेस्ट प्रोसेसिंग प्लांट ही नहीं हैं। इनमें से 35 निकाय अभी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करने और टेंडर प्रक्रिया के चरण में हैं।

एनजीटी ने कहा कि इस स्थिति में तय समयसीमा के भीतर काम पूरा होने को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।

पुराने कचरे यानी लीगेसी वेस्ट की स्थिति सबसे गंभीर है। मार्च 2026 तक राज्य में 1,48,77,937.52 टन पुराना कचरा निपटान किए जाने की प्रतीक्षा में था। वहीं वेस्ट प्रोसेसिंग की मौजूदा कमियों के कारण हर दिन करीब 8,069.4 टन कचरा इस पुराने कचरे के ढेर में जुड़ रहा है।

1.49 करोड़ टन पुराने कचरे का पहाड़, रोज जुड़ रहा 8,069 टन नया कचरा

ऐसे में एनजीटी ने निर्देश दिया कि पुराने कचरे का निपटान तय समयसीमा के अनुसार किया जाए और साथ ही हर दिन जुड़ रहे नए कचरे को भी नियंत्रित करने के लिए कदम उठाए जाएं। जिन 14 निकायों में 100 फीसदी पुराने कचरे के निपटान का दावा किया गया है, वहां भी दोबारा जांच की जाए, क्योंकि प्रोसेसिंग की कमियां अब भी नया लीगेसी वेस्ट पैदा कर रही हैं।

सीवेज प्रबंधन की रिपोर्ट अधूरी, नदियों में पहुंच रहा गंदा पानी

तरल कचरे और सीवेज प्रबंधन पर राज्य की रिपोर्ट को भी एनजीटी ने 'अधूरी' और 'अस्पष्ट' बताया है। कोलकाता महानगर विकास प्राधिकरण के तहत आने वाले शहरी निकायों में कई सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) पूरी क्षमता से नहीं चले रहे हैं।

साथ ही, बिछाई गई सीवर लाइनों से कितने घर जुड़े हैं, इसकी भी पर्याप्त जानकारी रिपोर्ट में नहीं दी गई है।

एनजीटी ने यह भी पाया कि ट्रीटेड और अनट्रीटेड सीवेज गंगा और चूर्णी नदी में छोड़ा जा रहा है। गंगा नदी के प्रदूषण से जुड़े एक अन्य मामले में भी ट्रिब्यूनल ने पाया था कि गंगा के किनारे बसे कई जिलों और कस्बों में नालों के जरिए सीवेज सीधे नदी तक पहुंच रहा है।

ऐसे में एनजीटी ने सभी 128 शहरी निकायों में कचरे को एकत्र और अलग करने के साथ-साथ परिवहन, प्रसंस्करण और निपटान की व्यवस्था को ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 के अनुरूप बनाने का निर्देश दिया है। अगली अनुपालन रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट रूप से बताना होगा कि कितने क्षेत्र और कितनी आबादी तक कचरे को अलग करने की व्यवस्था पहुंची है।

इसके साथ ही एनजीटी ने आसनसोल, धूपगिरि, हरिंगहाटा, बदुरिया, हालीसहर, काचरापाड़ा, मध्यग्राम, घाटाल, झाड़ग्राम, पुरुलिया, दालखोला, हावड़ा, मयनागुड़ी और फालकाटा सहित 14 निकायों में कचरा परिवहन की कमियों को दूर करने के लिए उठाए गए कदमों का ब्योरा अगली रिपोर्ट में देने को कहा है।

क्या एनजीटी की सख्ती के बाद बदलेंगे हालात

तरल कचरे के प्रबंधन के लिए प्रत्येक शहरी निकाय में बजट के साथ-साथ समयबद्ध कार्ययोजना तैयार करने का भी निर्देश दिया गया है। नालों, खालों और नहरों के पानी को एसटीपी तक पहुंचाने के लिए उन्हें बीच में रोककर उपचार संयंत्रों की ओर मोड़ने का प्रयास करने के भी बात कही गई है।

एनजीटी ने साफ किया है कि पश्चिम बंगाल में कचरा प्रबंधन की मौजूदा कमियों को अब केवल रिपोर्टों में दर्ज करना पर्याप्त नहीं होगा।

अब चुनौती केवल कचरे के पहाड़ को हटाने की नहीं, बल्कि हर दिन पैदा हो रहे नए कचरे और सीवेज को नदियों तक पहुंचने से रोकने की भी है। एनजीटी के बार-बार निर्देशों के बावजूद अगर हालात जस के तस बने रहते हैं, तो अगली सुनवाई तक पश्चिम बंगाल को यह दिखाना होगा कि कागजों पर बनी योजनाएं जमीन पर कितनी उतरी हैं।

इस मामले में अगली सुनवाई 3 फरवरी 2027 को होगी।