यमुना का प्रदूषण अब सिर्फ गंदे पानी और सतह पर तैरते कचरे तक सीमित नहीं है। दिल्ली विश्वविद्यालय से जुड़े शोधकर्ताओं के अध्ययन में दिल्ली-हरियाणा के यमुना क्षेत्र से पकड़ी गई 220 मछलियों में से हर एक में माइक्रोप्लास्टिक मिला है।
12 प्रजातियों की इन मछलियों में कुल 1,678 प्लास्टिक कण पाए गए, यानी औसतन हर मछली में करीब 7.6 कण मौजूद होने की पुष्टि हुई है।
अध्ययन का सबसे गंभीर संकेत दिल्ली में सामने आया, जहां सूर घाट और सोनिया विहार की मछलियों में हरियाणा के यमुनानगर और करनाल की तुलना में माइक्रोप्लास्टिक का बोझ अधिक था।
सोनिया विहार की तिलापिया में औसतन 21.8 कण प्रति मछली मिले। प्लास्टिक का सबसे ज्यादा जमाव पाचन तंत्र में हुआ, लेकिन गलफड़ों और मांसपेशियों में भी कण मिले हैं। यह चिंता इसलिए बढ़ाता है क्योंकि मांसपेशियां मछली का वह हिस्सा हैं जिसे मनुष्य भोजन के रूप में खाता है।
मछलियों में मिले माइक्रोप्लास्टिक का 77.8 फीसदी हिस्सा प्लास्टिक के महीन रेशों का था, जो सिंथेटिक कपड़ों की धुलाई, सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट के जरिए नदी में पहुंच सकते हैं।
शोधकर्ताओं ने इस प्रदूषण को उच्च पारिस्थितिक खतरे की श्रेणी में रखा है। ऐसे में यमुना की सफाई का मतलब सिर्फ दिखाई देने वाली गंदगी हटाना नहीं, बल्कि नदी में पहुंच रहे अदृश्य प्लास्टिक को रोकना भी है।
यमुना में बहता प्रदूषण अब सिर्फ नदी के पानी तक सीमित नहीं रह गया है। नदी में रहने वाली मछलियों के शरीर में भी प्लास्टिक के बेहद महीन कण जमा हो रहे हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय से जुड़े शोधकर्ताओं के नेतृत्व में की गई एक नई स्टडी ने इस चिंता को और गंभीर बना दिया है।
स्टडी के दौरान शोधकर्ताओं ने दिल्ली-हरियाणा में यमुना से पकड़ी गई 220 मछलियों की जांच की और इस जांच में हर एक मछली में माइक्रोप्लास्टिक्स की मौजूदगी के सबूत मिले हैं। यानी शोधकर्ताओं द्वारा जांची गई एक भी मछली ऐसी नहीं थी, जिसके शरीर में प्लास्टिक के कण न मिले हों, जोकि गंभीर खतरे को दर्शाता है।
अध्ययन के दौरान यमुना के चार स्थानों, हरियाणा में यमुनानगर तथा करनाल और दिल्ली के सूर घाट और सोनिया विहार से 12 अलग-अलग प्रजातियों की मछलियों के नमूने लिए गए। इन मछलियों से माइक्रोप्लास्टिक के कुल 1,678 कण मिले। यानी औसतन हर मछली में प्लास्टिक के करीब 7.6 कण मौजूद थे।
दिल्ली पहुंचते-पहुंचते बढ़ गया प्लास्टिक का बोझ
अध्ययन का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि दिल्ली के सूर घाट और सोनिया विहार में यमुना की मछलियों में माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा हरियाणा के ऊपरी हिस्सों की तुलना में काफी अधिक मिली। ऐसे में शोधकर्ताओं ने दिल्ली के यमुना क्षेत्र को माइक्रोप्लास्टिक के उच्च प्रदूषण वाले क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया है।
इसके पीछे शहर से नदी में बिना उपचार के पहुंचने वाला सीवेज, घरेलू और नगर निकायों से निकलने वाला गंदा पानी, कपड़ा उद्योगों से निकला अपशिष्ट, बारिश के साथ बहकर आने वाला कचरा और खुले में पड़ा प्लास्टिक प्रमुख कारण माने गए हैं। यानी जिस नदी में शहर अपना कचरा छोड़ रहा है, उसी नदी में रहने वाली मछलियां उस कचरे को अपने शरीर में समेट रही हैं।
मछलियों की प्रजातियों के आधार पर जांच में सामने आया है कि सबसे ज्यादा माइक्रोप्लास्टिक सोनिया विहार की तिलापिया में मिला। यहां 20 मछलियों में कुल 436 कण पाए गए, यानी औसतन हर मछली में माइक्रोप्लास्टिक्स के 21.8 कण मौजूद थे।
इसी तरह सूर घाट से लिए गए तिलापिया मछलियों के नमूनों में 264 कण मिले, जबकि सोनिया विहार की रोहू में 205 कण पाए गए। दूसरी ओर, सबसे कम प्रदूषण करनाल से मिली नीडल फिश में दर्ज हुआ, जिसमें 10 मछलियों से माइक्रोप्लास्टिक के कुल 37 कण मिले।
इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल माइक्रोप्लास्टिक्स में प्रकाशित हुए हैं।
पेट से लेकर मांस तक पहुंचा प्लास्टिक
स्टडी में इस बात का भी खुलासा हुआ है कि माइक्रोप्लास्टिक का सबसे ज्यादा जमाव मछलियों के पाचन तंत्र में हुआ था, यहां कुल 751 कण पाए गए। इसके अलावा गलफड़ों में 605 और मांसपेशियों में 322 कण मिले।
विशेषज्ञों के मुताबिक मांसपेशियों में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी खास चिंता पैदा करती है, क्योंकि इसका मतलब है कि प्लास्टिक के बेहद महीन कण केवल मछली के पेट और पाचन तंत्र तक सीमित नहीं हैं, बल्कि शरीर के उन हिस्सों तक भी पहुंच सकते हैं जिन्हें मनुष्य भोजन के रूप में खाता है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, इससे यह संकेत मिलता है कि माइक्रोप्लास्टिक का शरीर में प्रवेश मुख्य रूप से उसे निगलने से होता है और बाद में ये कण दूसरे ऊतकों तक भी पहुंच सकते हैं।
कपड़ों से निकले रेशे भी बन रहे यमुना का हिस्सा
स्टडी में यह भी सामने आया है कि मछलियों में मिले माइक्रोप्लास्टिक में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी फाइबर यानी प्लास्टिक के महीन रेशों की थी। कुल कणों में इनकी हिस्सेदारी 77.8 फीसदी रही। ये रेशे सिंथेटिक कपड़ों की धुलाई, घरेलू नालियों, कपड़ा उद्योगों और सीवेज के जरिए नदी में पहुंच सकते हैं। इसके बाद यही महीन रेशे पानी में तैरते हुए मछलियों के शरीर में दाखिल हो जाते हैं।
इसके बाद टूटे हुए प्लास्टिक के टुकड़े यानी फ्रैगमेंट सबसे अधिक पाए गए। पारदर्शी कणों की हिस्सेदारी 44 फीसदी, नीले कणों की 19.5 फीसदी और काले कणों की 16.3 फीसदी रही।
लैब जांच में मछलियों के नमूनों में माइक्रोप्लास्टिक के 10 अलग-अलग प्रकार के पॉलिमर पाए गए। इनमें पॉलीएथिलीन करीब 24 फीसदी और पॉलीप्रोपिलीन करीब 21 फीसदी था। ये दोनों मिलकर करीब आधे माइक्रोप्लास्टिक कणों के लिए जिम्मेदार थे। गौरतलब है कि पॉलीएथिलीन का इस्तेमाल प्लास्टिक बैग और पैकेजिंग में, जबकि पॉलीप्रोपिलीन का इस्तेमाल खाद्य कंटेनर, डिब्बों, बोतलों, उनके ढक्कनों और दूसरी पैकेजिंग सामग्री में होता है।
मछली क्या खाती है, उससे ज्यादा मायने रखता है वह कहां रहती है
अध्ययन में पाया गया कि शाकाहारी और सर्वाहारी मछलियां आम तौर पर मांसाहारी तथा नदी की तलहटी में रहने वाली मछलियों की तुलना में अधिक माइक्रोप्लास्टिक जमा करती हैं। लेकिन शोध का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह रहा कि मछली क्या खाती है, उससे ज्यादा असर इस बात का है कि वह कहां रहती है।
दिल्ली के अत्यधिक प्रदूषित हिस्से में रहने वाली अलग-अलग प्रजातियों की मछलियों में लगातार अधिक माइक्रोप्लास्टिक पाया गया। इससे साफ है कि नदी में बढ़ता शहरी प्रदूषण जलीय जीवन पर गहरा असर डाल रहा है।
माइक्रोप्लास्टिक के पर्यावरणीय खतरे का आकलन करने वाले अंतराष्ट्रीय स्तर पर मान्य 'पॉलिमर हैजर्ड इंडेक्स' के आधार पर शोधकर्ताओं ने इस प्रदूषण को कैटेगरी-IV, यानी उच्च पारिस्थितिक खतरे वाली श्रेणी में रखा है। देखा जाए तो यह सिर्फ मछलियों के लिए खतरे की घंटी नहीं है। मछलियां नदी के पारिस्थितिकी तंत्र की अहम कड़ी हैं और कई जगहों पर लोगों के भोजन का भी हिस्सा हैं।
ऐसे में नदी में पहुंच रहा प्लास्टिक धीरे-धीरे पानी से मछली और मछली से इंसानी भोजन तक पहुंचने की चिंता पैदा करता है। बता दें कि इससे पहले भी दिल्ली सरकार के आदेश पर किए गए एक अन्य अध्ययन में यमुना के पानी और नदी किनारे की मिट्टी के नमूनों में भी माइक्रोप्लास्टिक्स के कण पाए गए थे।
यमुना को सिर्फ साफ पानी नहीं, प्लास्टिक से भी बचाना होगा
शोधकर्ताओं का अध्ययन में कहना है, यमुना जैसे मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र में माइक्रोप्लास्टिक की नियमित निगरानी जरूरी है। साथ ही सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट के बेहतर उपचार, प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन और नदी में प्लास्टिक पहुंचने के स्रोतों पर रोक लगाने की जरूरत है।
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवॉयरमेंट (सीएसई) की ओर से राजस्थान के नीमली में 27 फरवरी को अनिल अग्रवाल डायलॉग 2025 के एक सत्र में सामने आया कि "अब भी यमुना से जुड़ने वाले करीब 22 बरसाती नालों में वैध और अवैध कॉलोनियों का सीवेज सीधे पहुंच रहा है जो आखिरकार सीधा बिना उपचार के नदी में गिर रहा है।
इतना ही नहीं जिस गंदे पानी का उपचार सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) के द्वारा किया जा रहा है, वह पैसा और संसाधन भी बर्बाद हो रहा है क्योंकि उपचार किए गए पानी को भी सीवेज वाले बरसाती नालों में डाल दिया जाता है।"
यमुना को बचाने की कवायद सिर्फ नदी के किनारे जमा कचरा को हटाने तक सीमित नहीं रह सकती। नदी के पानी में दिखाई न देने वाला यह महीन प्लास्टिक अब मछलियों के शरीर तक पहुंच चुका है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि यमुना कितनी गंदी दिखती है, बल्कि यह भी है कि उसके भीतर का प्रदूषण हमारे भोजन और जीवन में कितनी दूर तक पहुंच रहा है।